भारत

आतंकवाद के आरोप में जेल में बिताए 16 साल, अब अदालत ने निर्दोष क़रार दिया

साबरमती एक्सप्रेस धमाका मामले में अदालत ने 16 साल से जेल में बंद एएमयू के पूर्व शोधार्थी गुलज़ार अहमद वानी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है.

साबरमती एक्सप्रेस के जले हुए कोच के सामने खड़े पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

साबरमती एक्सप्रेस के जले हुए कोच के सामने खड़े पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

साल 2000 में हुए साबरमती एक्सप्रेस धमाके के मामले में उत्तर प्रदेश की एक अदालत की ओर से शनिवार को सुनाए गए फ़ैसले के बाद इस मामले में आरोपी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के पूर्व शोधार्थी गुलज़ार अहमद वानी 16 साल बाद जेल से रिहा होंगे. अदालत ने उन्हें साबरमती एक्सप्रेस धमाके की साज़िश रचने के आरोप से बरी कर दिया है. इस धमाके में नौ लोग मारे गए थे.

वानी के वकील एमएस ख़ान ने फोन पर बताया कि बाराबंकी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एमए ख़ान ने हिज़्बुल मुज़ाहिदीन के संदिग्ध सदस्य 43 साल के वानी और सह-आरोपी मोबिन को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया.

साल 2001 में कथित तौर पर विस्फोटकों और आपत्तिजनक सामग्रियों के साथ दिल्ली पुलिस की ओर से गिरफ़्तार किए गए वानी श्रीनगर के पीपरकारी इलाके के रहने वाले हैं और लखनऊ की एक जेल में बंद हैं.

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कानपुर के पास यह धमाका उस वक़्त हुआ था जब साबरमती एक्सप्रेस मुजफ़्फ़रपुर से अहमदाबाद जा रही थी. इस घटना में नौ लोग मारे गए थे और कई अन्य जख़्मी हो गए थे.

वकील ने बताया, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एमए ख़ान की अदालत ने दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष उनके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों को साबित नहीं कर पाया.

हत्या, हत्या की कोशिश, आपराधिक साज़िश, युद्ध छेड़ने, हथियार इकट्ठा करने और देश के ख़िलाफ़ अपराध के लिए साज़िश रचने के कथित अपराधों के लिए आईपीसी के तहत बाराबंकी के जीआरपी पुलिस थाने में उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक मामला दर्ज किया था.

भारतीय रेलवे क़ानून और विस्फोटक पदार्थ क़ानून के तहत भी उनके ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए थे. वकील ने बताया कि वानी के ख़िलाफ़ 10 अन्य मामले भी दर्ज किए गए थे. 11 मामलों में से 10 में वानी को आरोपमुक्त या बरी किया जा चुका है.

हालांकि, दिल्ली में एक धमाके को अंजाम देने के लिए विस्फोटक रखने के जुर्म में वानी को दोषी क़रार दिया गया था और 10 साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी. बहरहाल, दिल्ली उच्च न्यायालय ने वानी की सज़ा पर रोक लगा रखी है.

अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने वानी के मामले को इतना लंबा खिंचने को शर्मनाक बताया था. जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले पर टिप्पणी की थी कि अगर साबरमती एक्सप्रेस धमकाके के मामले में 31 अक्टूबर तक अहम गवाहों के बयान दर्ज नहीं हुए तो एक नवंबर को आरोपी को जमानत दे दी जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट ने इसे बेहद दुखद मानकर आश्चर्य व्यक्त करते हुए टिप्पणी की थी कि ‘वानी को 11 मामलों में से 10 में बरी कर दिया गया है. परेशानी यह है कि आप लोग उसे जेल में तो रखना चाहते हैं लेकिन साक्ष्य जुटाने और जल्द ट्रायल पूरा करने में आपकी कोई दिलचस्पी नहीं होती. यह शर्मनाक है.’

उच्चतम न्यायालय ने इस साल अप्रैल में वानी को जमानत दे दी थी और कहा था कि वह 16 साल से ज़्यादा समय तक सलाखों के पीछे रहे हैं और 11 में से नौ मामलों में बरी किए जा चुके हैं. न्यायालय ने कहा था कि निचली अदालत की ओर से तय की गई शर्तों पर वानी को एक नवंबर से जमानत पर रिहा किया जाएगा, भले ही सुनवाई पूरी हुई हो या न हुई हो.

30 जुलाई 2001 को जब वानी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था, उस वक्त वह एएमयू से अरबी में पीएचडी कर रहे थे. दिल्ली में विस्फोटकों की कथित बरामदगी के सिलसिले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनउ पीठ ने 26 अगस्त को वानी को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था, ऐसे लोगों की रिहाई से समाज के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

वानी ने उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय के समक्ष चुनौती दी थी. उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल निचली अदालत को निर्देश दिया था कि वह छह महीने में मामले के गवाहों से तेज़ी से ज़िरह करे.

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने 14 अगस्त 2000 को साबरमती एक्सप्रेस में धमाके को अंजाम देने के लिए मई 2000 में एएमयू के हबीब हॉल में साजिश रची थी. उनके ख़िलाफ़ जुलाई 2001 में आरोप तय किए गए थे.

बचाव पक्ष के वकील खान ने दलील दी थी कि ठोस साक्ष्यों के अभाव के कारण आरोपी बरी होने का हक़दार है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)