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बनारस को धार्मिक कट्टरता से बचाता संकट मोचन संगीत समारोह

विशेष: ‘संकट मोचन संगीत समारोह और गंगा में एकरूपता है. जैसे गंगा सभी के लिए हैं, वैसे ही संकट मोचन का मंच भी सभी के लिए है.’

संकट मोचन संगीत समारोह में मंचासीन प्रख्यात गायिका गिरिजा देवी. (फोटो: सिद्धांत मोहन)

संकट मोचन संगीत समारोह में मंचासीन प्रख्यात गायिका गिरिजा देवी. (फोटो: सिद्धांत मोहन)

साल 1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी. इमरजेंसी कुछ वक़्त पहले ही ख़त्म हुई थी, जिसका ख़ामियाज़ा कांग्रेस ने 1977 के चुनावों में हारकर भुगता था. उनके और उनके परिवार की कमलापति त्रिपाठी और बनारस से क़रीबी के चलते इंदिरा गांधी अक्सर ही बनारस आती रहती थीं. इसी साल संकट मोचन संगीत समारोह में इंदिरा गांधी अचानक आ गई थीं. चूंकि वे प्रधानमंत्री थीं नहीं, तो लाव-लश्कर भी उतना मौजूद नहीं था.

साल 1980. चुनाव हुए और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी. इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बन गईं. इस बार फिर से वे संकट मोचन संगीत समारोह बिना किसी सूचना के पहुंच गईं. अमूमन मंच के बगल की कुर्सियों पर- जो बस यूं ही लगी रहती हैं- दो-चार सम्माननीय लोग बिठाए जाते हैं लेकिन तत्कालीन महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र को यह समझ नहीं आया कि इंदिरा गांधी को किस स्थान से सम्मानित किया जाए. लिहाजा, महंत जी ने इंदिरा गांधी को मंच पर ही बिठा दिया. उस समय मंच पर कंकना बनर्जी का गायन चल रहा था. दर्शकों के लिए कंकना बनर्जी का स्वर और उनकी साधना शायद ज़्यादा ज़रूरी रहे हों, तभी इंदिरा गांधी के मंच पर बैठने के बाद भी कोई दर्शक अपनी जगह से न खड़ा हुआ, न हिला और कंकना बनर्जी ने अपना गायन पूरा किया.

पिछले साल यानी 2016 के संकट मोचन संगीत समारोह में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आने का न्यौता दिया गया. अटकलें तेज़ हो गईं कि नरेंद्र मोदी आ सकते हैं. एसपीजी और प्रशासनिक अमले ने मंदिर का दौरा किया और पाया कि नरेंद्र मोदी संकट मोचन संगीत समारोह में नहीं आ सकते हैं.

इसके साथ ही बनारस में यह मज़ाक आम हो गया कि ‘मोदी मंदिर में नहीं आ सकते तो क्या मस्जिद में जाएंगे?’ यह मज़ाक बस एक घटना की वजह से नहीं था. 2015 में हुई बनारस की रामलीला के प्रसिद्ध भरत मिलाप में भी मोदी को आने का न्यौता दिया गया था. ख़बर भी कुछ अख़बारों में छप गई, लेकिन सांस भी नहीं सुनाई दी कि मोदी आने वाले हैं. इन छिटपुट अध्यायों को मिला दें तो पता चलता है कि बनारस का हरेक धर्म निरपेक्ष मंच– जो भले ही नितांत सांस्कृतिक क्यों न हो– एक बड़े राजनीतिक संवाद को संबोधित करता है.

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संकट मोचन संगीत समारोह में प्रस्तुति देते कलाकार. (फोटो: सिद्धांत मोहन)

ग़ुलाम अली पिछले दो समारोहों में आ चुके हैं. इस साल नहीं आए. जब वे 2015 में पहली बार अचानक आ गए तो जनता पागल हो गई. ग़ुलाम अली ने ख़याल से लेकर ‘चुपके-चुपके’ तक का समूचा गायन जनता की मांग पर किया. बनारस घराने के गायक पं. छन्नूलाल मिश्र- जो लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के प्रस्तावक थे– ने कहा कि ग़ुलाम अली के आने से समारोह की गरिमा कम हुई है. विवाद और छन्नूलाल मिश्र, दोनों ही की हद का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि बनारस की अड़ी से लेकर साहित्यकारों ने एक सधे सुर से छन्नूलाल मिश्र का घोर प्रतिवाद किया और छन्नूलाल मिश्र की आपत्ति गुम हो गयी.

हालांकि इस पूरे मसले में छन्नूलाल मिश्र ही अकेले विरोधी नहीं रहे हैं. अगले साल 2016 के संगीत समारोह में ग़ुलाम अली के आने के पहले शहर में बजरंग दल और शिव सेना की ओर से पोस्टर लगाए गए कि मंदिर परिसर में ‘किसी पाकिस्तानी’ को घुसने नहीं दिया जाएगा. पुतले भी फूंके गए और विरोध को चमकाने के लगभग सभी प्रबंध कर लिए गए लेकिन ग़ुलाम अली इस बार घोषित रूप से मंदिर प्रांगण में पहुंचे और लगभग डेढ़ घंटे लगातार गाते रहे.

संकट मोचन संगीत समारोह के दरम्यान ही ग़ुलाम अली का मैंने साक्षात्कार किया था. पूरे विरोध और गहमागहमी के बीच में ग़ुलाम अली ने वही कहा जो संकट मोचन में आने वाला हर कलाकार कहता है. ग़ुलाम अली साहब ने कहा, ‘हमारा सियासत से कोई लेना-देना नहीं है. हमें बुलाया गया था, हम आ गए. हम कलाकार हैं, प्यार करेंगे तो भी गाएंगे और गाली देंगे तो भी. और यहां तो हनुमान जी ने हमें बुलाया था.’

इस साल से गिनें तो 94 सालों पहले संकटमोचन के महंत अमरनाथ मिश्र ने मंदिर के प्रांगण में इस आयोजन को शुरू किया था. धीरे-धीरे यह आयोजन अपनी गति से आगे बढ़ता गया लेकिन कुछ समय बाद जब अमरनाथ मिश्र के बेटे वीरभद्र मिश्र महंत बने, तो जसराज, केलुचरण महापात्र, सुनंदा पटनायक और कंकना बनर्जी ने वीरभद्र मिश्र के साथ अपनी दोस्ती बढ़ाई और आयोजन को एक मुक़म्मल ऊंचाई मिली.

एक लम्बे वक़्त तक इस आयोजन में मुस्लिम और महिला कलाकारों का आना-जाना नहीं था. लेकिन वीरभद्र मिश्र ने पहले इसे महिलाओं के लिए फिर 2007 में मुस्लिम कलाकारों के लिए खोल दिया. अब समारोह की ज़िम्मेदारी बीते चार सालों से सम्हाल रहे विश्वंभर नाथ मिश्र ने इस आयोजन को शास्त्रीय, जैज़, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के लिए भी खोल दिया है.

संकट मोचन संगीत समारोह के दौरान संगीत का आनंद लेते श्रोता. (फोटो: सिद्धांत मोहन)

संकट मोचन संगीत समारोह के दौरान संगीत का आनंद लेते श्रोता. (फोटो: सिद्धांत मोहन)

यदि संसदीय राजनीति के संदर्भ में बात करें तो हाल फ़िलहाल के वर्षों में बनारस में धार्मिक कट्टरता तेज़ी से बढ़ी है. इसे ऐसे देखें कि हालिया उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी मदनपुरा, सोनारपुरा जैसे मुस्लिमबहुल मोहल्लों से होकर रोड-शो के लिए गए, जहां से गुजरना शायद उनके लिए ज़्यादा ‘ख़तरनाक’ था. उस दिन की कवरेज में भीड़ में शामिल एक-दो मोदी समर्थकों से बात करने पर सुनाई पड़ा, ‘मोदी जी, इन सालों को औकात दिखा दिए हैं. उनके सीने से चढ़कर चले आए.’ ऐसे परिप्रेक्ष्य में देखें तो हिंदू समाज को मोदी के बाद योगी का भी भरोसा मिल गया.

लेकिन संकट मोचन संगीत समारोह का प्रारूप संगीत और संस्कृति की पूरी अवधारणा को धार्मिक होने से बचाता है. गंगा के पुनरुद्धार के लिए लगे हुए संकट मोचन महंत पं. विश्वम्भर नाथ मिश्र कहते हैं, ‘संगीत समारोह और गंगा में एकरूपता है. जैसे गंगा सभी के लिए हैं, वैसे ही संकट मोचन का मंच भी सभी के लिए है. ये सभी के लिए जीवन के अविकल और निर्विवाद आधार हैं.’

लेकिन समारोह में हो रहे राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर समारोह से जुड़े लोग उतने ही शांत हैं, जितना शांत समारोह का चलन रहा है. कोई राजनीतिक हस्तक्षेपों में कोई रुचि नहीं रखता, न ही उसे कोई बेवजह तरजीह देना चाहता है. बात करने पर रुख़ आलोचनात्मक नहीं होता है, बल्कि गंगा-जमुनी संस्कृति को बढ़ाने की बात करने वाला होता है.

बीते 22 सालों से संगीत समारोह का संचालन कर रहे 81 वर्षीय पं. हरिराम द्विवेदी कहते हैं, ‘हमने तो वो समय भी देखा है जब पहली बार बिस्मिल्लाह ख़ान साहब किसी मुस्लिम कलाकार के रूप में मंदिर में आए और यह सिलसिला चल निकला. मंदिर के अंदर कुछ नहीं है, कोई प्रतिरोध नहीं, न कोई ग़ुस्सा. सभी को संगीत से मतलब है.’

यानी समारोह की नज़र से देखें तो मंदिर के अंदर का माहौल एक सम्पूर्ण बनारस है. कई तरह के लोग हैं जो बनारस को समेटकर एक प्रांगण के भीतर ले आए हैं. मंदिर के बाहर जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनसे मंदिर के अंदर ज़रा भी परिवर्तन नहीं है. और मंदिर के भीतर का जो माहौल है, वह पता नहीं क्यों मंदिर के बाहर से धीरे-धीरे ग़ायब हो रहा है.

इस बार के अध्याय में बहुत सालों बाद 88 की उम्र में गिरिजा देवी मंदिर में गाने आईं. उन्हें देर तक बैठने में तकलीफ़ थी, लेकिन उस तकलीफ़ के साथ शुरुआती कुछ देर में उन्होंने जो बातें कहीं, उनसे इस समारोह से निकल रहे संदेश की महत्ता स्पष्ट होती है. गिरिजा देवी ने कलाकार के तौर पर अपनी शिकायतों को बताते हुए कहा कि हर तरह के संगीत की अपनी ज़रूरत है और उसके अपने श्रोता हैं. सभी को बराबर सुनना चाहिए और समय देना चाहिए. भजन सुनते हैं तो ग़ज़ल भी सुनना चाहिए.

समारोह के आख़िरी दिन आईं गिरजा देवी का ऐसा कहना तब साफ़ होता है जब अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन तीन-चार भजनों के बाद ग़ज़ल सुना देते हैं, जब दरगाह अजमेर शरीफ़ के कव्वाल हमसर हयात निज़ामी आते हैं और मंदिर सूफ़ी दरगाह जैसा गूंजने लगता है और जब उस्ताद राशिद ख़ान आते हैं और लोग उनसे फ़रमाइश करने लगे हैं कि ‘आओगे जब तुम साजना’ सुनाइए.

पिछले तीन-चार सालों से मंदिर में सबसे अधिक भीड़ उन्हीं कार्यक्रमों में हुई है, जहां किसी न किसी रूप में मुस्लिम कलाकार शामिल रहे हैं. इससे किसी दुर्योजना का भ्रम निकाला जा सकता है, लेकिन यह तथ्यात्मक सच्चाई है. इस बार समारोह में बगल में बैठे एक शख़्स ने कहा, ‘अच्छा है कि ग़ुलाम अली नहीं आए, वरना हमको तो खड़े होने की भी जगह नहीं मिलती.’

तुलसीदास ने कहा है– मांग के खइबो मसीद में सोइबो, लेइबो को एक न देइबो को दो. (मांग के खा लेंगे और मस्जिद में सो लेंगे, न किसी से कुछ लेना है और न किसी को कुछ देना ही)

इसे उद्धृत करते हुए महंत विश्वंभर नाथ मिश्र कहते हैं, ‘मुग़ल काल में रहने वाला हिंदी का इतना बड़ा कवि यह कह गया है, तो हमारी क्या मजाल कि हम उस समरूपता के साथ खिलवाड़ करें या किसी और को भी करने दें.’

संकट मोचन का संगीत समारोह अपने घर से निकल अब थोड़ा बाहर आ गया है. महंत विश्वंभर नाथ मिश्र कहते हैं, ‘आप एक सुर ‘सा’ लगाते हैं तो वह यहां से लेकर पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व अमरीका तक एक ही रहता है. जो बड़ा होगा, वह इस सुर को समझेगा. क्योंकि इतिहास में जितने भी बड़े नाम हुए हैं, सभी ने समाज को जोड़ने की बात की है. और जितने भी लोग वैचारिक रूप से दरिद्र हैं, उन्हें आप देख ही रहे हैं कि वे क्या कर रहे हैं?’