राजनीति

मोदी और शाह विपक्ष ही नहीं, भाजपा को भी तबाह कर रहे हैं

एक समय था जब भाजपा कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा देश की एकमात्र कैडर आधारित पार्टी हुआ करती थी, जिसकी अपनी एक चमक थी.

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(फोटो क्रेडिट: बीजेपी)

अमित शाह और नरेंद्र मोदी की सर्वशक्तिशाली जोड़ी सत्ता में तीन साल और ‘विपक्ष मुक्त भारत’ के सपने का उत्सव मना रही है. बेशक, ‘विपक्ष मुक्त भारत’ लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक कल की चेतावनी है, मगर जिस पार्टी को उन्होंने दरअसल सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया वह खुद भाजपा है.

एक समय था जब भाजपा कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा देश की एकमात्र कैडर आधारित पार्टी हुआ करती थी, जिसकी अपनी एक चमक थी.

यह एक ऐसी पार्टी थी जिसमें असहमतियों के लिए जगह थी और नेताओ को पनपने का मौका दिया जाता था. प्रमुखता हासिल करने के लिए उनमें आपसी प्रतिस्पर्धा भी होती थी. लेकिन, शाह और मोदी की भाजपा दो व्यक्तियों की पार्टी बन कर रह गई है.

यह जोड़ी डंडे के जोर पर राज करती है. आज की भाजपा अपने कल की फीकी और पिलपिली छाया बन कर रह गई है.

मोदी कैबिनेट खिलौने के सिपाहियों की सेना जैसी लगती है. किसी भी मंत्री के पास कोई वास्तविक शक्ति या वीटो का अधिकार नहीं है. और अगर आप उन्हें ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ के सिद्धांत के बारे में पूछें, तो उनके चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान तैर जाएगी.

भारत ने ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर कैबिनेट प्रणाली से ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ का विचार लिया है, जिसके मुताबिक प्रधानमंत्री कैबिनेट में बराबरी के लोगों के बीच प्रथम होता है.

मोदी कैबिनेट में एक महत्वपूर्ण मंत्रालय की शोभा बढ़ा रहे मंत्री, जिनके पास कोई वास्तविक शक्ति नहीं है, का कहना है, ‘ये फर्स्ट अमंग इक्वल्स क्या चीज है? हम कैबिनेट की बैठक में एक शब्द भी नहीं बोलते. सारी चीजें मोदी जी और पीएमओ के सर्वशक्तिमान अधिकारी पहले से तय करके आते हैं. हम तो बिना ज़ुबान वाली रबड़ की मुहरें हैं. मोदी जी विचार-विमर्श पसंद नहीं है. बहस की बात तो छोड़ दीजिए. आपको क्या लगता है कि मनोहर पर्रिकर गोवा और दूसरे वरिष्ठ मंत्री उत्तर प्रदेश जाने के लिए इतने बेताब क्यों थे? केंद्र के मुलम्मा लगे पिंजरे का क़ैदी बन कर रहने से एक राज्य का मुख्यमंत्री बन कर रहना कहीं बेहतर है. भाजपा में पहले 1 से 100 तक सिर्फ मोदी हैं और उनके बाद सिर्फ अमित शाह. दूसरा कोई नहीं.’

यह किसी एक मंत्री के मन की भड़ास हो सकती है, लेकिन उनके कहे में सच्चाई का अंश आपको तब नजर आएगा, जब आप इस ओर ध्यान देंगे कि मार्च में पर्रिकर के गोवा जाने के बाद से अब तक भारत को एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं मिल सका है और मोदी के विश्वासपात्र अरुण जेटली फिर रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

कश्मीर में जारी गंभीर हिंसा तथा अशांति और 1 मई को पाकिस्तान द्वारा नियंत्रण रेखा पार कर दो भारतीय जवानों की हत्या और उनका सिर धड़ से अलग करने की घटना के बावजूद रक्षा मंत्रालय को अनाथ छोड़ दिया गया है.

भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक मोदी अभी भी एक फुलटाइम रक्षा मंत्री नियुक्त करने के बारे में उधेड़बुन में हैं और ऐसा करने का कोई दबाव भी महसूस नहीं कर रहे हैं.

पीएमओ में फैसला लेने की प्रक्रिया पूरी तरह एक व्यक्ति में सिमट कर रह गई है और यह भी नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ‘ भड़कीले प्रदर्शनों’ तक सीमित हो गया है.

पीएमओ के फैसलों की एक कसौटी राजनीतिक फायदा है. दूसरी कसौटी यह है कि हुक्म बजानेवाला मीडिया उस फैसले की मार्केटिंग ‘मास्टर स्ट्रोक’ के तौर पर कर सकता है या नहीं!

यही कारण है कि सरकार इस सवाल का सीधा जबाव देने से इनकार करती रही है कि आखिर नोटबंदी का फैसला किसने लिया? यह फैसला ‘स्वायत्त’ भारतीय रिज़र्व बैंक का था या पीएमओ का?

कई आरटीआई अर्ज़ियां लगाने के बावजूद सरकार ने इसका अब तक जवाब नहीं दिया है.

कुल मिलाकर मोदी ने कैबिनेट के सामूहिक फैसला लेने और उसकी सम्मिलित जिम्मेदारी लेने की परिपाटी की तिलांजलि दे दी है.

हाल ही में आरएसएस के शक्तिशाली प्रचारक और भाजपा और संघ के बीच की कड़ी राम माधव, जो बिना किसी सरकारी पद के जम्मू-कश्मीर पर आखिरी फैसला लेने का अधिकार रखते हैं, ने कहा, ‘मोदी भारत को राष्ट्रपति प्रणाली की ओर लेकर जा रहे हैं.’

यही कारण है कि राजनाथ सिंह से उन मामलों में भी कभी सलाह-मशविरा नहीं किया जाता है, जो उनके मंत्रालय के अधीन आते हैं.

कुछ यही हाल सुषमा स्वराज का भी है, जो कहने के लिए देश की विदेश मंत्री हैं, मगर असल में ट्विटर की मदर टेरेसा की भूमिका निभाती हैं और दुनियाभर में मुसीबत में फंसे भारतीयों की मदद करती हैं.

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(फोटो क्रेडिट: पीएमओ)

इस बात के लिए उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए, लेकिन विदेश मंत्री के जिम्मे आने वाला यही एकमात्र काम नहीं है. विदेश नीति को मोदी और उनके बेहद शक्तिशाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, 70 वर्ष से ज्यादा उम्र के भूतपूर्व जासूस अजित डोवाल, के हवाले छोड़ दिया गया है, जिनके पास विदेश मामलों का कोई पूर्व अनुभव नहीं है.

कैबिनेट को अपना रबर स्टांप बनाने से पहले, मोदी ने भाजपा पर अपना पूर्ण वर्चस्व सुनिश्चित कर लिया था. उन्होंने अपने से वरिष्ठ नेताओं, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को, जो भाजपा के दूसरे और तीसरे अध्यक्ष थे, मार्गदर्शक मंडल नाम से बनाए गए नए ओल्ड एज होम मे भेज दिया.

यह भी एक रिकॉर्ड ही है कि इस मंडल ने जिसमें यशवंत सिन्हा भी हैं, आज तक एक भी बैठक नहीं की है, जबकि इसके गठन के वक्त यह कहा गया था कि यह मंडल मोदी को ‘दिशा’ दिखाएगा.

मोदी सरकार के पहले दिन ही किया गया यह फैसला एक तरह से भाजपा नेताओं को चेतावनी थी. इसके बाद मध्य प्रदेश में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चैहान और सुषमा स्वराज जैसे नेता, जो पहले मोदी के विरोध खड़े थे, मोदी के सामने नतमस्तक हो गए.

आज के इस रक्तहीन भाजपा की तुलना उस दौर की भाजपा की कीजिए जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. सरकार में वाजपेयी की स्थिति निर्विवाद थी, लेकिन वे डंडे के बल पर असहमतियों का गला नहीं घोंटते थे.

उनके सरकार के मंत्री सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे से असहमति प्रकट करते थे और अपना कद बढ़ाने के लिए आपस में भिड़ते रहते थे. मंत्रियों के तौर पर कई चेहरे जाने-पहचाने थे.

अब अमित शाह म्युनिसिपल चुनाव लड़ने के लिए भी मोदी की छवि का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसा कि उन्होंने हाल ही में दिल्ली में सफलतापूर्वक किया.

इससे पहले दिल्ली में डॉ. हर्षवर्धन जैसे योग्य नेताओं के रहते हुए भाजपा ने राजनीतिक रूप से पिद्दी किरण बेदी को पार्टी की तरफ से दिल्ली के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया.

हर्षवर्धन को अचानक स्वास्थ्य मंत्री के पद से भी हटा दिया गया, जिसका कारण आज तक किसी को नहीं पता चल सका है.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

(फाइल फोटो: पीटीआई)

शाह ने भाजपा को नए सिरे से मोदी की शक्ल में ढाल दिया है. उनके साथ किसी और नेता को केद्र में आने की इजाज़त नहीं है. चमकने का अधिकार सिर्फ शाह के साहेब को है. (शाह मोदी को साहेब संबोधन से पुकारते हैं)

आज मोदी ने भाजपा को बौना बना दिया है. वे सिकुड़ी हुई पार्टी के उपर किसी किसी दैत्याकार प्रतिमा की तरह छा गए हैं. यह आश्चर्यजनक है कि किसी जमाने में कैडर आधारित पार्टी रही भाजपा, इतनी आसानी से शाह के सामने झुक गई. हर चुनाव लड़ने के लिए वे गुजरात से अपनी विश्वसनीय टीम लेकर आते हैं. स्थानीय कार्यकर्ता हाशिए पर डाल दिये जाते हैं.

सीट आवंटन से लेकर टिकट बंटवारे तक का सारा फैसला शाह के जिम्मे छोड़ दिया गया है. वे राज्य के किसी नेता से सलाह-मशविरा करने की जगह अपने ‘सर्वेक्षणों’ और जानकारियों के आधार पर फैसले लेते हैं.

मोदी ने शाह को आजाद दिमाग वाले किसी भी व्यक्ति के पर कतर देने की पूरी छूट दे रखी है. इस मामले मे वरुण गांधी का उदाहरण लिया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश के इस 36 वर्षीय के नाम के आखिरी शब्द के कारण मोदी और शाह उन्हें नापसंद करते हैं. खासकर इसलिए भी उन्होंने गांधी परिवार पर निशाना साधने से साफ-साफ इनकार कर दिया है.

उन्हें जिस निर्मम तरीके से ठिकाने लगाया गया, वह पार्टी के लिए एक उदाहरण है. गांधी में बदलाव नहीं आया है. मामला शायद इतना ही है कि अपने पुराने रूप में भाजपा ने उनके लिए जगह बनाई मगर मोदी और शाह ऐसा कोई समझौता करने को तैयार नहीं.

आज मोदी एकमात्र चुनावी मुद्दा हैं. एक बार सत्ता मिल जाने पर किसी गुमनाम प्रचारक को मुख्यमंत्री बना दिया जाता है, जैसे मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया गया. बिना जनाधार वाले ऐसे नेता, मोदी और शाह को रास आते हैं.

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(फोटो क्रेडिट: बीजेपी)

संघ भी इस बात से खुश है कि उनके ‘विश्वासपात्र कार्यकर्ताओं’ को इनाम मिल रहा है और वे आरएसएस के दिखाए रास्ते पर चलेंगे. ऐसे में यह कोई संयोग नहीं है कि खट्टर और देवेंद्र फड़णवीस के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद हरियाणा और महाराष्ट्र ने बेहद दमनकारी गोरक्षा कानून पारित कर दिया.

मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान ‘गुड गवर्नेंस (सुशासन)’ का मुद्दा जमकर उठाया था. अब मोदी और शाह इसकी चर्चा गलती से भी नहीं करते हैं. 2019 का एजेंडा तय किया जा चुका है.

इसमें एक बार फिर हाल में हुए उत्तर प्रदेश चुनाव को दोहराया जाएगा, जब भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. यूपी के मुख्यमंत्री के तौर पर आदित्यनाथ का चयन इस रणनीति का हिस्सा है. उन्हें अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी मे बड़ी जीत दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

एक वरिष्ठ भाजपा नेता दुख प्रकट करते हुए कहते हैं, ‘जब तक मोदी और शाह चुनाव जीतते रहेंगे, पार्टी और संघ में उनसे सवाल नहीं पूछा जाएगा. लेकिन कभी-कभी मैं पुरानी भाजपा की कमी महसूस करता हूं, जिसमें नेता कैडर से आते थे और असहमतियों के लिए जगह थी. मुझे आज भी याद है, जब संसद में विपक्ष अटल जी से किसी मुद्दे पर न झुकने को कह रहा था, जब उन्होंने कहा था, ‘मत भूलिए, अटल तो हूं, बिहारी भी हूं’.

(स्वाति चतुर्वेदी पत्रकार हैं और उन्होंने ‘आई एम अ ट्राॅल: इनसाइड द सेक्रेट वर्ल्ड ऑफ द बीजेपीज डिजिटल आर्मी’ किताब लिखी है.)

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  • shailendra chaubey

    आपका लेख से मई पूरी तरह सहमत हूँ, सिवाय इसके की कम्युनिस्ट पार्टियों में नेताओ को पनपने का मौका दिया जाता है. मैंने देखा है की कम्युनिस्ट पार्टियों में कैडर तो है पर शीर्ष पर कुछ ही नेता लम्बे समय से बने हुए हैं. इन्ही वजहों से पार्टी जमीनी स्तर पर कमजोर हुई हैं.