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हाशिमपुरा नरसंहार की कहानी, तत्कालीन पुलिस अधिकारी की ज़ुबानी

‘चारों तरफ़ ख़ून के धब्बे बिखरे पड़े थे. नहर की पटरी, झाड़ियों और पानी के अंदर ताज़ा जख़्मों वाले शव पड़े थे. वीबी सिंह और उसके साथियों की समझ में सिर्फ़ इतना आया कि वहां पड़े शवों और रास्ते में दिखे पीएसी की ट्रक में कोई संबंध ज़रूर है.’

हाशिमपुरा, 1987. फोटो: प्रवीण जैन

हाशिमपुरा, 1987. फोटो: प्रवीण जैन

(आज ही के दिन यानी 22/23 मई, 1987 की रात मुरादनगर और दिल्ली से सटे मकनपुर में लोगों को पीएसी ट्रक में भर कर लाया गया और गोली मार कर नदी में फेंक दिया गया. विभूति नारायण राय उस समय ग़ाज़ियाबाद के एसपी थे. उनके ब्लॉग से लिए गए इस लेख में उन्होंने बताया है कि हाशिमपुरा के लोगों के साथ उस दिन क्या हुआ था.)

जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो ज़िंदगी भर आपका पीछा नहीं छोडते. एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलते हैं और कई बार तो क़र्ज़ की तरह आपके सर पर सवार रहते हैं. हाशिमपुरा भी मेरे लिए कुछ ऐसा ही अनुभव है. 22/23 मई, 1987 की आधी रात दिल्ली ग़ाज़ियाबाद सीमा पर मकनपुर गांव से गुज़रने वाली नहर की पटरी और किनारे उगे सरकंडों के बीच टॉर्च की कमज़ोर रोशनी में ख़ून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना- सब कुछ मेरे स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है.

उस रात दस-साढ़े दस बजे हापुड़ से वापस लौटा था. साथ ज़िला मजिस्ट्रेट नसीम ज़ैदी थे, जिन्हें उनके बंगले पर उतारता हुआ मैं पुलिस अधीक्षक निवास पर पहुंचा. निवास के गेट पर जैसे ही कार की हेडलाइट्स पड़ी, मुझे घबराया हुआ और उड़ी रंगत वाला चेहरा लिए सब इंसपेक्टर वीबी सिंह दिखाई दिया, जो उस समय लिंक रोड थाने का इंचार्ज था. मेरा अनुभव बता रहा था कि उसके इलाक़े में कुछ गंभीर घटा है. मैंने ड्राइवर को कार रोकने का इशारा किया और नीचे उतर गया.

वीबी सिंह इतना घबराया हुआ था कि उसके लिए सुसंगत तरीक़े से कुछ भी बता पाना संभव नहीं लग रहा था. हकलाते हुए और असंबद्ध टुकड़ों में उसने जो कुछ मुझे बताया वह स्तब्ध कर देने के लिए काफ़ी था. मेरी समझ में आ गया कि उसके थाना क्षेत्र में कहीं नहर के किनारे पीएसी ने कुछ मुसलमानों को मार दिया है. क्यों मारा? कितने लोगों को मारा? कहां से लाकर मारा? स्पष्ट नहीं था.

कई बार उसे अपने तथ्यों को दुहराने के लिए कह कर मैंने पूरे घटनाक्रम को टुकड़े-टुकड़े जोड़ते हुए एक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की. जो चित्र बना उसके अनुसार वीबी सिंह थाने में अपने कार्यालय में बैठा हुआ था कि लगभग 9 बजे उसे मकनपुर की तरफ़ से फायरिंग की आवाज़ सुनाई दी. उसे और थाने में मौजूद दूसरे पुलिसकर्मियों को लगा कि गांव में डकैती पड़ रही है.

आज तो मकनपुर गांव का नाम सिर्फ़ रेवेन्यू रिकॉर्ड्स में है. आज गगनचुंबी आवासीय इमारतों, मॉल और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों वाले मकनपुर में 1987 में दूर-दूर तक बंज़र ज़मीन पसरी हुई थी. इसी बंज़र ज़मीन के बीच की एक चक रोड पर वीबी सिंह की मोटर सायकिल दौड़ी. उसके पीछे थाने का एक दारोगा और एक अन्य सिपाही बैठे थे.

वे चक रोड पर सौ गज़ भी नहीं पहुंचे थे कि सामने से तेज़ रफ़्तार से एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया. अगर उन्होंने समय रहते हुए अपनी मोटर सायकिल चक रोड से नीचे न उतार दी होती तो ट्रक उन्हें कुचल देता. अपना संतुलन संभालते-संभालते जितना कुछ उन्होंने देखा उसके अनुसार ट्रक पीले रंग का था और उस पर पीछे 41 लिखा हुआ था, पिछली सीटों पर खाकी कपड़े पहने कुछ लोग बैठे हुए दिखे.

किसी पुलिसकर्मी के लिए यह समझना मुश्किल नहीं था कि पीएसी की 41वीं बटालियन का ट्रक कुछ पीएसी कर्मियों को लेकर गुज़रा था. पर इससे गुत्थी और उलझ गई. इस समय मकनपुर गांव में पीएसी का ट्रक क्यों आ रहा था? गोलियों की आवाज़ के पीछे क्या रहस्य था? वीबी सिंह ने मोटर सायकिल वापस चक रोड पर डाली और गांव की तरफ बढा.

मुश्किल से एक किलोमीटर दूर जो नज़ारा उसने और उसके साथियों ने देखा, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. मकनपुर गांव की आबादी से पहले चक रोड एक नहर को काटती थी. नहर आगे जाकर दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर जाती थी. जहां चक रोड और नहर एक दूसरे को काटते थे वहां पुलिया थी. पुलिया पर पहुंचते-पहुंचते वीबी सिंह के मोटर सायकिल की हेडलाइट जब नहर के किनारे उस सरकंडे की झाड़ियों पर पड़ी तो उन्हें गोलियों की आवाज़ का रहस्य समझ में आया.

चारों तरफ़ ख़ून के धब्बे बिखरे पड़े थे. नहर की पटरी, झाड़ियों और पानी के अंदर ताज़ा जख़्मों वाले शव पड़े थे. वीबी सिंह और उसके साथियों ने घटनास्थल का मुलाहिजा कर अंदाज़ लगाने की कोशिश की कि वहां क्या हुआ होगा? उनकी समझ में सिर्फ़ इतना आया कि वहां पड़े शवों और रास्ते में दिखे पीएसी की ट्रक में कोई संबंध ज़रूर है.

साथ के सिपाही को घटनास्थल पर निगरानी के लिए छोड़ते हुए वीबी सिंह अपने साथी दारोगा के साथ वापस मुख्य सड़क की तरफ़ लौटा. थाने से थोड़ी दूर ग़ाज़ियाबाद-दिल्ली मार्ग पर पीएसी की 41वीं बटालियन का मुख्यालय था. दोनों सीधे वहीं पहुंचे. बटालियन का मुख्य द्वार बंद था. काफ़ी देर बहस करने के बावजूद भी संतरी ने उन्हें अंदर जाने की इजाज़त नहीं दी.

इसके बाद वीबी सिंह ने जिला मुख्यालय आकर मुझे बताने का फ़ैसला किया. जितना कुछ आगे टुकड़ों टुकड़ों में बयान किए गए वृतांत से मैं समझ सका, उससे स्पष्ट हो ही गया था कि जो घटा है वह बहुत ही भयानक है और दूसरे दिन ग़ाज़ियाबाद जल सकता था. पिछले कई हफ़्तों से बगल के ज़िले मेरठ में सांप्रादायिक दंगे चल रहे थे और उसकी लपटें ग़ाज़ियाबाद पहुंच रही थीं.

मैंने सबसे पहले ज़िला मजिस्ट्रेट नसीम ज़ैदी को फोन किया. वे सोने ही जा रहे थे. उन्हें जगने के लिए कह कर मैंने ज़िला मुख्यालय पर मौजूद अपने एडिशनल एसपी, कुछ डिप्टी एसपी और मजिस्ट्रेटों को जगाया और तैयार होने के लिए कहा. अगले चालीस-पैंतालीस मिनटों में सात-आठ वाहनों में लदे-फंदे हम मकनपुर गांव की तरफ़ लपके.

नहर की पुलिया से थोड़ा पहले हमारी गाडियां खड़ीं हो गईं. नहर के दूसरी तरफ़ थोड़ी दूर पर ही मकनपुर गांव की आबादी थी लेकिन तब तक कोई गांव वाला वहां नहीं पहुंचा था. लगता था कि दहशत ने उन्हें घरों में दुबकने को मज़बूर कर दिया था. थाना लिंक रोड के कुछ पुलिसकर्मी ज़रूर वहां पहुंच गए थे.

उनकी टार्चों की रोशनी के कमज़ोर वृत्त नहर के किनारे उगी घनी झाड़ियों पर पड़ रहे थे पर उनसे साफ़ देख पाना मुश्किल था. मैंने गाड़ियों के ड्राइवरों से नहर की तरफ़ रुख करके अपने हेडलाइट्स ऑन करने के लिए कहा. लगभग सौ गज चौड़ा इलाक़ा प्रकाश से नहा उठा. उस रोशनी में मैंने जो कुछ देखा, वह वही दु:स्वप्न था जिसका ज़िक्र मैंने शुरू में किया है.

हाशिमपुरा, 1987. फोटो: प्रवीण जैन

हाशिमपुरा, 1987. फोटो: प्रवीण जैन

गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनियां झाड़ियों से टकरा कर टूट-टूट जा रहीं थीं इसलिए टार्चोंं का भी इस्तेमाल करना पड़ रहा था. झाड़ियों और नहरों के किनारे ख़ून के थक्के अभी पूरी तरह से जमे नहीं थे, उनमें से ख़ून रिस रहा था. पटरी पर बेतरतीबी से शव पड़े थे- कुछ पूरे झाड़ियों में फंसे तो कुछ आधे तिहाई पानी में डूबे. शवों की गिनती करने या निकालने से ज़्यादा ज़रूरी मुझे इस बात की पड़ताल करना लगा कि उनमें से कोई जीवित तो नहीं है!

सबने अलग-अलग दिशाओं में टार्चों की रोशनियां फेंक-फेंक कर अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि कोई जीवित है या नहीं. बीच-बीच में हम हांक भी लगाते रहे कि यदि कोई जीवित हो तो उत्तर दे. हम दुश्मन नहीं दोस्त हैं. उसे अस्पताल ले जाएंगे. पर कोई जवाब नहीं मिला. निराश होकर हममें से कुछ पुलिया पर बैठ गए. मैंने और ज़िलाधिकारी ने तय किया कि समय खोने से कोई लाभ नहीं है.

हमें दूसरे दिन की रणनीति बनानी थी इसलिए जूनियर अधिकारियों से शवों को निकालने और ज़रूरी लिखा-पढ़ी करने के लिए कह कर हम लिंक रोड थाने के लिए मुड़े ही थे कि नहर की तरफ़ से खांसने की आवाज़ सुनाई दी. सभी ठिठक कर रुक गए. मैं वापस नहर की तरफ लपका. फिर मौन छा गया. स्पष्ट था कि कोई जीवित था लेकिन उसे यक़ीन नहीं था कि जो लोग उसे तलाश रहे हैं, वे मित्र हैं.

हमने फिर आवाज़ें लगानी शुरू कीं, टार्च की रोशनी अलग-अलग शरीरों पर डालीं और अंत में हरकत करते हुए एक शरीर पर हमारी नज़रें टिक गईं. कोई दोनों हाथों से झाड़ियां पकड़े आधा शरीर नहर में डुबोये इस तरह पड़ा था कि बिना ध्यान से देखे यह अन्दाज़ लगाना मुश्किल था कि वह जीवित है या मृत! दहशत से बुरी तरह वह कांप रहा था और काफ़ी देर तक आश्वस्त करने के बाद यह विश्वास कर पाया कि हम उसे मारने नहीं, बचाने वालें हैं, जो व्यक्ति अगले कुछ घंटे हमे इस लोमहर्षक घटना की जानकारी देने वाला था, उसका नाम बाबूदीन था.

गोली उसे छूते हुए निकल गई थी. भय से वह निश्चेष्ट होकर वह झाड़ियों में गिरा तो भाग दौड़ में उसके हत्यारों को यह जांचने का मौक़ा नहीं मिला कि वह जीवित है या मर गया. दम साधे वह आधा झाड़ियों और आधा पानी में पड़ा रहा और इस तरह मौत के मुंह से वापस लौट आया. उसे कोई ख़ास चोट नहीं आयी थी और नहर से चलकर वह गाड़ियों तक आया. बीच में पुलिया पर बैठकर थोडी देर सुस्ताया भी.

लगभग 21 वर्षों बाद जब हाशिमपुर पर एक क़िताब लिखने के लिए सामग्री इकट्ठी करते समय मेरी उससे मुलाक़ात हुई, जहां पीएसी उसे उठा कर ले गई थी तो उसे याद था कि पुलिया पर बैठे उसे किसी सिपाही से मांग कर बीड़ी दी थी. बाबूदीन ने जो बताया, उसके अनुसार उस दिन अपरान्ह तलाशियों के दौरान पीएसी के एक ट्रक पर बैठाकर चालीस पचास लोगों को ले जाया गया तो उन्होंने समझा कि उन्हें गिरफ़्तार कर किसी थाने या जेल ले जाया जा रहा है.

मकनपुर पहुंचने के लगभग पौन घंटा पहले एक नहर पर ट्रक को मुख्य सड़क से उतारकर नहर की पटरी पर कुछ दूर ले जाकर रोक दिया गया. पीएसी के जवान कूद कर नीचे उतर गए और उन्होंने ट्रक पर सवार लोगों को नीचे उतरने का आदेश दिया. अभी आधे लोग ही उतरे थे कि पीएसी वालों ने उनपर फायर करना शुरू कर दिया. गोलियां चलते ही ऊपर वाले गाड़ी में ही दुबक गए. बाबूदीन भी उनमें से एक था. बाहर उतरे लोगों का क्या हुआ वह सिर्फ़ अनुमान ही लगा सकता था.

शायद फायरिंग की आवाज़ आसपास के गांवों में पहुंची, जिसके कारण आसपास से शोर सुनाई देने लगा और पीएसी वाले वापस ट्रक में चढ़ गए. ट्रक तेज़ी से बैक हुआ और वापस ग़ाज़ियाबाद की तरफ़ भागा. यहां वह मकनपुर वाली नहर पर आया और एक बार फिर सबसे उतरने के लिए कहा गया. इस बार डर कर ऊपर दुबके लोगों ने उतरने से इनकार कर दिया तो उन्हें खींच-खींच कर नीचे घसीटा गया.

जो नीचे आ गए उन्हें पहले की तरह गोली मारकर नहर में फेंक दिया गया और जो डर कर ऊपर दुबके रहे उन्हें ऊपर ही गोली मारकर नीचे धकेला गया. बाबूदीन जब यह विवरण बता रहा था तो हमने पहले घटनास्थल का अंदाज़ लगाने की कोशिश की. किसी ने सुझाव दिया कि पहला घटनास्थल मेरठ से ग़ाज़ियाबाद आते समय रास्ते में मुरादनगर थाने में पड़ने वाली नहर हो सकती है.

मैंने लिंक रोड थाने के वायरलेस सेट से मुरादनगर थाने को कॉल किया तो स्पष्ट हुआ कि हमारा सोचना सही था. कुछ देर पहले ही मुरादनगर थाने को भी ऐसी ही स्थिति से गुज़रना पड़ा था. वहां भी कई मृत शव नहर में पड़े मिले थे और कुछ लोग जीवित थाने लाए गए थे.

इसके बाद की कथा एक लंबा और यातनादायक प्रतीक्षा का वृतांत है, जिसमें भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्ते, पुलिस का ग़ैर-पेशेवराना रवैया और घिसट-घिसट कर चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रणाली जैसे मुद्दे जुड़े हुए हैं. मैंने 22 मई, 1987 को जो मुक़दमे ग़ाज़ियाबाद के थाना लिंक रोड और मुरादनगर पर दर्ज कराए थे वे पिछले 21 वर्षों से विभिन्न बाधाओं से टकराते हुए अभी भी अदालत में चल रहे हैं और अपनी तार्किक परिणति की प्रतीक्षा कर रहें हैं.