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मतदान के लिए प्रोत्साहित करने वाले कश्मीरी वकील विरोध प्रदर्शन के डर से हिरासत में

कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष नजीर अहमद रोंगा को जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म करने से एक दिन पहले 4 अगस्त को पीएसए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. आरोप है कि वे इस निर्णय को लेकर लोगों को प्रभावित कर सकते थे.

नजीर अहमद रोंगा. (फोटो: फेसबुक)

नजीर अहमद रोंगा. (फोटो: फेसबुक)

श्रीनगर: जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा हटाने के बाद कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (केएचसीबीए) के एक पूर्व अध्यक्ष को जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था.

उनको हिरासत में लिए जाने के कई अन्य कारणों में से एक कारण यह था कि उनमें चुनाव के बहिष्कार के दौरान भी लोगों को वोट देने के लिए तैयार की क्षमता थी. द वायर  द्वारा प्राप्त किए गए दस्तावेजों से यह पता चला है.

बता दें कि, जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा हटाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने किसी बड़े विरोध प्रदर्शन के डर से राज्य के राजनेताओं, कारोबारियों, वकीलों और कश्मीरी युवाओं को गिरफ्तार करने का बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है.

गिरफ्तार किए जाने वाले लोगों में केएचसीबीए के पूर्व अध्यक्ष नजीर अहमद रोंगा भी शामिल हैं. एसोसिएशन के सदस्य एक वकील के अनुसार, ‘रोंगा को 4 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था. इस गिरफ्तारी के एक दिन बाद ही केंद्र सरकार ने 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करते हुए अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म कर दिया था.’

रोंगा पर उसी विवादित पीएसए के तहत मामला दर्ज किया गया है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को बिना सुनवाई के छह महीने जेल में रखा जा सकता है.

द वायर  द्वारा हासिल किए गए पीएसए के दस्तावेजों के तहत रोंगा के खिलाफ यह आरोप भी लगाया गया है कि उनके अंदर चुनाव के बहिष्कार के दौरान भी लोगों को मतदान करने के लिए इकट्ठा करने की क्षमता है.

दस्तावेज में लिखा है, ‘इस तथ्य से आपकी क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि आप अपने मतदाताओं को मतदान बहिष्कार के दौरान भारी संख्या में बाहर आने और मतदान करने के लिए मना पाए हैं.’

अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर वकील ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, यहां तक की कश्मीर में आजकल लोगों को वोट करने और लोकतंत्र में शामिल होने के लिए उत्साहित करना अपराध हो गया है.

कश्मीर में बड़ी संख्या में हुई गिरफ्तारी ने वकीलों में भी डर पैदा कर दिया है. बहुत ही मुश्किल से बार का कोई सदस्य अदालत में जा पा रहा है और जो जा पा रहे हैं वे भी वकीलों की गिरफ्तारी पर नहीं बोल पा रहे हैं.

हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का मुख्य कार्यालय बिल्कुल सुनसान पड़ा हुआ है. घाटी के हालात पर चर्चा करते हुए वहां पर मौजूद युवा वकीलों के एक समूह ने कहा कि कश्मीर में उनके कुल कितने साथी गिरफ्तार हुए उनकी पूरी संख्या के बारे में उन्हें नहीं पता है.

हालांकि, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि रोंगा को 4 अगस्त को पीएसए के तहत गिरफ्तार किया गया और हिरासत में रखा गया है.

बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष पर 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को हटाने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का विरोध करने का भी आरोप लगा है. दस्तावेज में लिखा है, इस संबंध में आपने कई प्रदर्शनों का नेतृत्व किया और श्रीनगर जिले में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा की.

सरकार ने यह भी आरोप लगाया है कि रोंगा का संबंध हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मिरवाइज उमर फारूक के साथ है. सरकार ने कहा कि वे उन आपराधिक मामलों को भी देख रहे थे जो कि अलगाववादियों के खिलाफ अदालत में लंबित थे.

पीएसए दस्तावेज के अनुसार, आपने 2008, 2010 और 2016 के दौरान बड़े पैमाने पर कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा करने के उद्देश्य से विभिन्न सेमिनारों, रैलियों और विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया था.

वकील ने कहा, बार एसोसिएशन के मौजूदा अध्यक्ष मियां अब्दुल कयूम पर भी पीएसए के तहत मामला दर्ज किया गया है. बाद में उन्हें आगरा की जेल में भेज दिया गया. हमारे पास केवल कुछ ही ऐसे वकीलों के रिकॉर्ड हैं जिन पर पीएसए के तहत मामले दर्ज किए गए हैं.

बर्खास्तगी के डर से अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक अन्य वकील ने कहा कि मौजूदा बार अध्यक्ष बीमारी की हालत में थे. वे किडनी की बीमारी और डायबीटीज के मरीज हैं. इसके साथ ही वे हाइपरटेंशन से भी पीड़ित. उनकी बेटी को भी आगरा में उनसे मिलने की अनुमति नहीं है.

वकीलों के एक ग्रुप के अनुसार, कयूम और रोंगा पर कोई नए आरोप नहीं लगाए गए हैं. उन्हें उनके विचारों के लिए गिरफ्तार किया गया है.

श्रीनगर में निचली अदालत के एक वकील ने कहा कि उनके कई साथियों पर पीएसए के तहत मामला दर्ज किया गया है. संचार माध्यमों पर से पाबंदी हटने के बाद ही यह स्थिति साफ हो पाएगी.

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