भारत

प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में गिरावट, खेती में पानी की खपत कम हो: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि कृषि क्षेत्र में पानी की खपत कम करने की ज़रूरत है. अत्यधिक सिंचाई से पानी और बिजली दोनों की बर्बादी होती है और उर्वरकों की क्षमता भी कम हो जाती है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: देश में प्रति व्यक्ति वार्षिक पानी उपलब्धता वर्ष 2025 तक घटकर 1,465 घन मीटर रह जाने का अनुमान है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के एक शीर्ष अधिकारी ने यह जानकारी देते हुए पानी की खपत कम करने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ाने और फसलों के विविधीकरण पर जोर दिया.

आईसीएआर ने यह भी घोषणा की कि वह भारत के लिए फसल योजना के संबंध में सुझाव देने के मकसद से एक तंत्र विकसित करने की ओर ध्यान दे रहा है, जिसके तहत किसानों को यह सुझाव दिया जाएगा कि किस क्षेत्र में किस फसल को उगाया जाए.

कृषि क्षेत्र में जल प्रबंधन के बारे में मीडिया को जानकारी देते हुए बीते पांच सितंबर को एक कार्यक्रम के दौरान आईसीएआर के महानिदेशक टी. महापात्र ने बताया कि प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता वर्ष 1951 में 5,177 घन मीटर थी जो वर्ष 2014 में घटकर 1,508 क्यूबिक मीटर रह गई है.

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता वर्ष 2025 तक 1,465 घन मीटर और वर्ष 2050 तक 1,235 घन मीटर तक घटने जाने का अनुमान है. यदि यह और घटकर 1,000-1,100 क्यूबिक मीटर के आसपास रह जाती है तो भारत को जल संकट वाला देश घोषित किया जा सकता है.’

महापात्र ने आशंका जाहिर की कि ऐसी स्थिति में पानी को लेकर राज्यों के भीतर और अलग-अलग राज्यों के बीच लड़ाई बढ़ सकती है.

उन्होंने कहा कि कुल बुवाई रकबे की कुल 14 करोड़ हेक्टेयर भूमि में से केवल 48.8 प्रतिशत रकबे को ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है और बाकी बारिश पर निर्भर है. उन्होंने कहा कि कुल छह करोड़ 83 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र में से लगभग 60 प्रतिशत भूजल से सिंचित होते है.

महापात्र ने कहा, ‘कृषि क्षेत्र में पानी की खपत को कम करने की आवश्यकता है. हम कम पानी में भी अधिक उत्पादन कर सकते हैं. प्रधानमंत्री ने प्रति बूंद और अधिक फसल का आह्वान किया है.’

महापात्र ने कहा कि इससे किसी जिले में कितने रकबे में कौन सी फसल उगाई जाए, इस बारे में सिफारिश करने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि इस तरह की फसल योजना को लेकर सामने आने में लगभग एक वर्ष लगेगा.

उन्होंने कहा कि आईसीएआर के दो निकाय- नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च तथा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ फार्मिंग सिस्टम रिसर्च, मोदीपुरम, मेरठ- इस फसल योजना प्रणाली पर काम कर रहे हैं.

पानी की कमी को एक गंभीर मुद्दा बताते हुए महापात्र ने कहा कि आईसीएआर ने एक जुलाई से 15 अक्टूबर तक अपने खेतों में पानी के सही उपयोग के बारे में किसानों को शिक्षित करने के लिए एक अभियान शुरू किया है.

उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से पहले ही 10 लाख किसान तक पहुंच बनाई गई है और अन्य 5 लाख किसानों तक पहुंचने की योजना है.

उन्होंने कहा कि 90 लाख हेक्टेयर के वर्तमान स्तर से सूक्ष्म सिंचाई के तहत खेती के रकबे को दोगुना करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि इसे हासिल करने के लिए, किसानों को आगे आना होगा.

महापात्र ने कहा कि अत्यधिक सिंचाई से पानी और बिजली दोनों की बर्बादी होती है और इससे उर्वरकों की क्षमता भी कम हो जाती है.

फसल विविधीकरण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, ‘फसलों में बदलाव की आवश्यकता है. यदि कम पानी है, तो उन फसलों की खेती की जानी चाहिए जो कम पानी सोखते हैं.’

उन्होंने कम पानी खपत वाले तिलहन, मोटे अनाज और दालों की खेती की वकालत की.

पानी आपूर्ति के लिए मीटर लगाने के बारे में पूछे जाने पर महापात्र ने कहा कि यह निश्चित रूप से निरोधक के रूप में काम करेगा और खपत को भी कम करेगा. लेकिन साथ ही उन्होंने यह कहा कि इस बारे में सरकार को तय करना है.