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स्टिंग ऑपरेशन में रिश्वत लेते देखे गए त्रिपुरा विश्वविद्यालय के कुलपति ने दिया इस्तीफ़ा

त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के कुलपति विजयकुमार लक्ष्मीकांतराव धारुरकर इससे पहले पिछले महीने तब विवादों में घिर गए थे जब कैंपस में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एबीवीपी का झंडा फहराया था और कहा था कि एबीवीपी एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन है और यह किसी भी पार्टी से संबंधित नहीं है.

 त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के कुलपति विजयकुमार धारुरकर (फोटो साभारः फेसबुक)


त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के कुलपति विजयकुमार धारुरकर (फोटो साभारः फेसबुक)

अगरतला: त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विजयकुमार लक्ष्मीकांतराव धारूरकर ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. सूत्रों ने यह जानकारी दी.

एक दिन पहले एक स्थानीय टीवी चैनल ने अपने स्टिंग ऑपरेशन में उन्हें कोलकाता के एक ठेकेदार से इस्तीफा लेते हुए दिखाया था.

समाचार चैनल ‘वनगार्ड’ के प्रबंध निदेशक और मालिक सेबक भट्टाचार्य ने बताया कि हम साबित कर सकते हैं कि उन्होंने एक प्रिंटिंग फर्म के प्रतिनिधि और ठेकेदार सुरेन्द्र सेथिया से 5,80,000 रुपये लिए.

उन्होंने दावा किया कि कुलपति फर्म को दिए गए प्रिंटिंग के काम की कुल कीमत का 10 प्रतिशत रिश्वत के रूप में मांग रहे थे. फुटेज से स्पष्ट है कि वह लगातार 10 प्रतिशत हिस्सा रिश्वत के रूप में ले रहे थे. यह स्टिंग ऑपरेशन कल प्रसारित हुआ था.

भट्टाचार्य का कहना है कि उनके पास और दस्तावेज हैं और वह उन्हें भी प्रसारित करेंगे.

वीडियो सामने आने के बाद धारूरकर ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि वीडियो क्लिप को इस तरह से एडिट किया गया है कि जैसे मैं घूस ले रहा हूं.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सरकार धारूरकर को उनके पद पर बनाए रखने की इच्छुक नहीं है और यही कारण है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने खुद शनिवार को उनकी इस्तीफा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास भेज दिया.

जुलाई 2018 में त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्ति होने वाले धारूरकर का अभी चार साल का कार्यकाल बचा था.

अपने इस्तीफे में धारुरकर ने हर दिन विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए मीडिया के एक वर्ग को दोषी ठहराया है. उन्होंने दावा किया कि वह एक ऐसे व्यक्ति से परेशान थे जिसके खिलाफ उन्होंने भ्रष्टाचार के लिए कार्रवाई की थी.

धारूरकर ने कहा, ‘विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार प्रभारी शानित देबरॉय इस पूरे (स्टिंग वीडियो) प्रकरण के पीछे हैं. मैंने उन्हें डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त किया था और उन्हें रजिस्ट्रार के पद के लिए आवेदन करने की अनुमति नहीं दी थी क्योंकि उनके पास मास्टर्स डिग्री नहीं थी. उन्होंने पटना से प्रबंधन में फर्जी डिप्लोमा किया था.

उन्होंने कहा, ‘इसके बाद देबरॉय अदालत चले गए थे, लेकिन हाल ही में हमने त्रिपुरा हाईकोर्ट में मामला जीता. वह पहले ही सेवानिवृत्त हो गया था और अपने अखबार ‘आजकर फ़रियाद’ और मेरे खिलाफ अन्य स्थानीय मीडिया घरानों का उपयोग कर रहा था. 10 करोड़ रुपये के ई-बुक घोटाले की जांच शुरू करने का मेरा फैसला भी मेरे खिलाफ गया.’

उन्होंने कहा, ‘लोकसभा चुनाव से दो महीने पहले (वीडियो) रिकॉर्डिंग की गई थी. मनगढ़ंत वीडियो 5 सितंबर को प्रसारित किया गया. आज, उन्होंने एक और क्लिप चलाया. यह भगवान महावीर चेयर लॉन्च करने की हमारी योजना से संबंधित है.’

उन्होंने कहा, ‘कोलकाता का कोई व्यक्ति 30 लाख रुपये का चंदा लेना चाहता था और उसी के बारे में मुझसे संपर्क किया. उस वीडियो को संपादित किया गया था और उन्होंने ऐसा दिखाया था जैसे मैं रिश्वत ले रहा हूं. पुराने वीडियो में वैध तरीके से ठेकेदार को नकद देता हुआ दिखाया गया है.’

वहीं देबरॉय ने कहा, ‘मैं पहले ही विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुका हूं. जबकि हाईकोर्ट के मामले का उनके इस्तीफे से कोई लेना-देना नहीं है. मैं एक समाचार पत्र चलाता हूं, जो किसी भी तरह से स्टिंग वीडियो प्रसारित करने वाले न्यूज वेनगार्ड (न्यूज चैनल) से जुड़ा नहीं है.’

हालांकि, ऐसा नहीं है कि सरकार केवल कथित स्टिंग वीडियो के कारण ही धारुकार से नाखुश है. उनकी नियुक्ति के कुछ ही महीनों के अंदर ही एचआरडी मंत्रालय को वित्तीय अनियमितताओं और धारूरकर द्वारा नियुक्त किए गए अतिथि शिक्षकों के खिलाफ शिकायतें मिलीं. इस साल अप्रैल में सरकार ने शिकायतों पर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से रिपोर्ट भी मांगी थी.

वहीं, पिछले महीने धारूरकर ने परिसर में एक कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का झंडा फहराया था. अपने इस कदम का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था कि एबीवीपी एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है और किसी भी पार्टी से संबंधित नहीं है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)