राजनीति

अनुच्छेद 370: क्या असल में भाजपा जम्मू कश्मीर के दलितों के अधिकारों के लिए फिक्रमंद है

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाने की बहस के दौरान भाजपा के कई नेताओं ने दलितों को राज्य में आरक्षण का पूरा लाभ मिलने का ज़िक्र किया. यह भी कहा गया कि डॉ. आंबेडकर भी ऐसा चाहते थे. लेकिन क्या वास्तव में 370 हटने के पहले राज्य में दलितों की स्थिति ख़राब थी?

Srinagar: Security personnel stands guard at a blocked road on the 33rd day of strike and restrictions imposed after the abrogration of Article of 370 and bifurcation of state, in Srinagar, Friday, Sept. 6, 2019. (PTI Photo) (PTI9_6_2019_000063A)

फोटो: पीटीआई

संसद में जब अनुच्छेद 370 और 35 ए ख़त्म करने का बिल पास हो रहा था तो सरकार को सबसे ज्यादा चिंता दलित हित की दिखी. बिल पेश करते समय और बारी-बारी से जो भी अन्य वक्ता भाजपा की ओर बोले, सबसे पहले उनकी फिक्र दिखी कि इन अनुच्छेदों के हटने से दलितों को आरक्षण का पूरा लाभ मिलेगा.

हालांकि 2014 से उनका खुद का इतिहास आरक्षण के संरक्षण और इसे लागू करने को लेकर क्या रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है. दूसरी बार जब सरकार में आए तो दनादन ऐलान किया कि ज्यादातर सरकारी कंपनियों को बेचना है ताकि रहा-सहा भी आरक्षण समाप्त हो जाये.

यहां तक प्रचार किया गया कि वहां के वाल्मीकि समाज का केवल मैला साफ करने के लिए कानून बना है, यह साबित भी करने की कोशिश किया गया कि मुस्लिम बाहुल्य राज्य होने की वजह से दलितों के साथ भेदभाव हुआ.

डॉ. बीआर आंबेडकर अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे इसका भी जोर-शोर से प्रचार-प्रसार किया गया. ऐसे में जांच-पड़ताल की जरूरत है कि क्या वास्तव में अनुच्छेद 370 के पहले दलितों की स्थिति ख़राब थी.

इतिहास बताता है कि डोगरा रियासत ने कभी लगभग 556 वाल्मीकि परिवार को बसाया था. गोरखा भी बाहर से आए थे. जो भी बाहर से आए वे सब अपने ही पेशे तक सीमित कर दिए गये थे.

बड़ी संख्या में लोग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से भी आए. उन सभी को जम्मू कश्मीर की नागरिकता नहीं मिली और अब अनुच्छेद 35 ए हटने के बाद, सबको नागरिकता स्वाभाविक रूप से मिल गयी है.

अब तक इन सभी को सरकारी नौकरियां नहीं मिलती थी क्योंकि नागरिकता ही नहीं थी. वाल्मीकि समुदाय को एक छूट जरूर दी गयी थी कि वे नगर निगम में सफाई के काम में नौकरी कर सकते हैं. कश्मीर में दलित हैं ही नही, जम्मू क्षेत्र में जरूर इनकी आबादी 8% है.

अनुसूचित जाति/जनजाति परिसंघ के जम्मू कश्मीर के अध्यक्ष आरके कल्सोत्रा ने विरोध जताया कि दलितों के कंधे पर भाजपा बंदूक न चलाये. उनका कहना है कि जो भी अत्याचार होता है वो सवर्ण हिंदू करते हैं न कि मुस्लिम.

उन्होंने एक दृष्टांत का जिक्र किया कि पूर्व में सांसद रहे श्री जुगल किशोर ने अपने कोष से सवर्णों को अलग से शमशान बनाने के लिए राशि अनुमोदित की, जो जगह बिश्नाह के नाम से जानी जाती है. जब इसका विरोध हुआ तब जा करके रोक लगी. अभी भी जम्मू में अलग-अलग शमशान घाट हैं .

अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटा तो दिया लेकिन पिछड़ों और दलितों को फायदा क्या हुआ यह जानना जरूरी है. अभी तक पिछड़ों का आरक्षण वहां 2% लागू था जबकि 27 % होना चाहिए. अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा आयोग स्थापित किया जायेगा कि नहीं इस पर अभी तक सरकार का कोई रुख साफ नहीं हुआ.

अब और संविधान के 106 अनुच्छेद लागू होने हैं जिसमें यह साफ नहीं है कि 81वां, 82वां, 85वां संवैधानिक संशोधन क्या इसमें शामिल है.

यह संवैधानिक संशोधन आरक्षण से संबंधित हैं. जम्मू कश्मीर में 2004 में आरक्षण कानून और एसआरओ 144 पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए बना था लेकिन हाईकोर्ट ने इसको खारिज कर दिया था, अब इसका क्या होगा कुछ स्पष्ट नही है.

जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जनजाति को 10%, अनुसूचित जाति को 8%, पिछड़ा वर्ग को 2%, क्षेत्रीय पिछड़ा वर्ग को 20%, गरीब सवर्णों को 10%, पहाड़ियों को 3%, लाइन आफ कंट्रोल वालों को 3% और सीमा पर रहने वालों को 3%- कुल 59% आरक्षण बनता है. अब केंद्र सरकार के आरक्षण के मापदंड लागू होंगे तो क्या स्थिति होगी, यह तो आने वाला समय बताएगा.

आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी को वहां के दलितों की बड़ी चिंता है लेकिन जब इन्हें मौका मिला था तो क्या किया?

2001 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ में सरकार बनाई, पीडीपी के साथ भी चार साल की सरकार रही है. क्या भाजपा के विधायकों ने विधानसभा में दलितों और पिछड़ों से संबंधित इन सवालों को उठाया?

अप्रैल 2015 में जम्मू कश्मीर सरकार की कैबिनेट ने फैसला लिया कि बिना आरक्षण सरकारी नौकरी में भर्ती की जायेगी. परिसंघ सहित तमाम संगठनों ने जब आंदोलन किया तब जाकर आरक्षण कोटे को भी आधार माना. ध्यान रहे कि उस समय भाजपा और पीडीपी की सरकार थी.

अगर उन्होंने इससे पहले ऐसे कोई मुद्दे उठाये होते तो माना जाता कि उनके इरादे नेक हैं वरना मुस्लिम-हिंदू का कार्ड खेलने के अलावा इसमें और क्या है?

जब अनुच्छेद 370 का विवाद बढ़ा तब कुछ सच्चाई उभर के सामने आई वरना तो लोग सोचते थे कि जम्मू कश्मीर में भुखमरी और गरीबी ज्यादा है. अब जाकर पता लगा कि कई मानकों में यह राज्य न केवल विकास का पर्याय बना दिए गए गुजरात से बल्कि तमाम अन्य प्रदेशों से भी आगे है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता शेख अब्दुल्ला और बख्शी गुलाम जब मुख्यमंत्री थे, तब भूमि सुधार कानून सख्ती से लागू किया, जिससे जमींदारी टूटी और सबके पास जोतने के लिए जमीन मुहैया हो सकी.

यह कानून सख्ती से इसलिए लागू हो सका कि अनुच्छेद 370 की वजह से जमींदार अदालत का सहारा नहीं ले पाए वरना दसियों साल तक मामले लटके रहते हैं.

कई राज्यों में भूमि सुधार कानून इसलिए सफल नहीं हो पाया कि अदालतों में मामले दशकों से लंबित रहे. दलितों को भी इसका फायदा मिला.

यही कारण है कि वहां पर अन्य राज्यों से स्थिति बेहतर है. अन्य राज्यों जैसे जम्मू कश्मीर में दलितों के साथ बलात्कार, उत्पीड़न और हिंसा जैसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलती हैं.

अगर अभी तक दलितों का भला नहीं हुआ है तो यह अवसर अच्छा है, कुछ करके दिखाएं. जहां तक डॉ. आंबेडकर का मत अनुच्छेद 370 के बारे में है, तो इस तरह से उनकी सैकड़ों मांगे नहीं पूरी की जा सकीं.

डॉ. आंबेडकर जाति खत्म करना चाहते थे तो क्या हो पाई? जमीन के राष्ट्रीयकरण की बात कही थी, वह भी न हो पाया. समय और परिस्थितियां बदल गए हैं, पुरानी बातों को उद्धृत करने से समस्याओं को सुलझाने के बजाय उलझाने में ही लगे रहेंगे.

डॉ. आंबेडकर ने यह भी कहा था कि जम्मू कश्मीर को तीन भागों में विभाजित कर दिया जाए. लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाए और कश्मीर के लोगों को यह स्वतंत्रता दी जाए कि वह भारत के साथ रहना चाहते हैं या स्वायत्तता चाहते हैं.

आधे-अधूरे तथ्य उद्धृत करके किसी महान पुरुष को गलत नहीं पेश करना चाहिए, जैसा कि मायावती और भाजपा ने किया है.

(लेखक पूर्व सांसद और कांग्रेस के सदस्य हैं.)