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इस माहौल में क्या मेजर गोगोई को सम्मानित किया जाना ज़रूरी था?

मेजर गोगोई को पुरस्कृत कर सेना ने एक झटके में कश्मीर घाटी के सभी वासियों को संदेश दे डाला है कि सेना तुम्हारी दोस्त नहीं है.

(फोटो साभार: एएनआई)

(फोटो साभार: एएनआई)

बीते दिनों एक ख़बर आती है कि मेजर लीतुल गोगोई को थल सेनाध्यक्ष ने पुरस्कृत किया है वो भी कश्मीर घाटी में आतंकवाद का डटकर मुक़ाबला करने के लिए. आख़िर क्या किया मेजर गोगोई ने?

उन्होंने एक कश्मीरी युवक को सेना की जीप के आगे जानवरों की तरह बांधकर नौ गांवों में घुमाया, आख़िर क्यों?

मेजर और उनकी 12 सैनिकों की टुकड़ी मतदान के दौरान पोलिंग बूथ की सुरक्षा कर रही थी. मतदान के बाद वहां से निकलते वक़्त स्थानीय लोगों की भीड़ जमा हो गई जो कि पत्थरबाज़ी करने पर आमादा थी.

तब मेजर गोगोई ने वोट डालकर आए फ़ारूक़ अहमद डार को रस्सियों से बांधा और सेना की जीप से सामने बांधकर बैठा दिया कि अब कोई पत्थर फेंककर देखे. इसके बाद मेजर गोगोई और उसके साथी उस बूथ से सुरक्षित निकल गए.

लेकिन एक आम कश्मीरी के साथ ऐसा बर्ताव बहुतों को बर्दाश्त नहीं हुआ और देखते ही देखते यह वीडियो वायरल हो गया. मामले के तूल पकड़ते ही सेना ने कोर्ट आॅफ इंक्वायरी बैठा दी.

उधर, महबूबा मुफ़्ती सरकार पर भी दबाव पड़ा तो एफआईआर दर्ज कर ली गई और पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी.

इससे पहले कि सेना की कोर्ट आॅफ इंक्वायरी की रिपोर्ट आती सेना ने घोषणा कर दी कि मेजर लीतुल गोगोई को सेनाध्यक्ष ने एक प्रशस्ति पत्र Chief’s Commendation देकर सम्मानित किया है.

अब जब सेनाध्यक्ष ही शाबाशी दे रहे हैं तो सेना की जांच कैसे क्लीन चिट नहीं देगी? लेकिन क्या रिपोर्ट आने से पहले सेनाध्यक्ष का यह क़दम सही है? आप ख़ुद ही फ़ैसला कर सकते हैं!

वैसे सभी दक्षिणपंथी मेजर गोगोई को बड़ा हीरो बनाने पर तुले हुए हैं. वोट डालकर आए निहत्थे इंसान को ढाल बनाकर जानवर की तरह जीप पर बांधकर नौ गांवों में घुमाना बहादुरी का नहीं कायरना काम है.

यह भारतीय सेना के इतिहास में सबसे दुखद घटनाओं में से एक है. भारतीय सेना का इतिहास गौरवशाली रहा है. वो निहत्थों पर वार नहीं करती. उस के पास हथियार और ताक़त भारतीयों की रक्षा के लिए दिए गए हैं.

फ़ारूक़ अहमद डार ने भारतीय संविधान पर विश्वास रखते हुए वोट डाला था, वो भी तब जब श्रीनगर के 93% वोटर मतदान नहीं कर रहे थे. डार भारतीय हैं, जिनकी सेना ने रक्षा नहीं बल्कि दुनिया के सामने उनका मज़ाक़ बना दिया.

लेकिन मज़ाक़ डार का नहीं बना, सेना का बना और अब लगातार बनता जा रहा है. जनरल बिपिन रावत इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं.

सेनाध्यक्ष बिपिन रावत को अंदेशा था कि मेजर गोगोई को पुरस्कृत करने के फ़ैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया होगी. भाजपा तो महबूबा मुफ़्ती की सरकार में बराबर की भागीदार है, जो कि इस मामले की जांच कर रही है.

सवाल ये है कि अब उस पुलिस जांच का क्या होगा? ऐसे में सेना को ऐसी ख़बर देनी थी जो कि मेजर गोगोई की ख़बर से बड़ी लग सके.

तो लीजिए, जनाब! मंगलवार को सेना ने कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में पाकिस्तानी बंकरों को नेस्तनाबूद करने का वीडियो जारी कर दिया. आमतौर पर सेना ऐसे वीडियो सार्वजनिक रूप से जारी नहीं करती.

वो इसे रक्षा मंत्रालय कवर करने वाले संवाददाताओं को लीक कर देती थी लेकिन इस बार बाक़ायदा प्रेस ब्रीफ़िंग की गई जिसके बाद वीडियो जारी किया गया. हालांकि सेना ने यह बताने से इनकार कर दिया कि पाकिस्तानी बंकरों पर हमला किस दिन और किस समय पर हुआ.

सेना के लिए यह रौ में बहने का समय नहीं है. उसे राजनीति से अलग रहने की ज़रूरत है. पर इस वक़्त ऐसा नहीं लग रहा है.

अच्छा होता कि सेना मेजर गोगोई के मुद्दे पर चुप्पी साधे रहती. कश्मीर की स्थानीय स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने जो किया वो कोर्ट आॅफ इंक्वायरी में बता दिया जाता और उन्हें क्लीन चिट दे दी जाती.

तय है कि पुलिस जांच भी रफ़ा-दफ़ा हो जाएगी. अब सेना मेजर गोगोई से टीवी पर बयान दिलवा रही है. तो एक बयान फ़ारूक़ अहमद डार का भी सुन लीजिए. उन्होंने कहा है कि अब वो ज़िंदगी में कभी वोट नहीं डालेंगे.

मेजर गोगोई को पुरस्कृत कर सेना ने एक झटके में कश्मीर घाटी के सभी वासियों को संदेश दे डाला है कि सेना तुम्हारी दोस्त नहीं है. वो तुम्हारी रक्षा के लिए नहीं है बल्कि उस ज़मीन के टुकड़े के क़ब्ज़े के लिए तैनात है जिसे तुम अपना घर मानते हो.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)