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फिल्म इंडस्ट्री ने धमकी और ब्लैकमेलिंग के आगे झुकने की आदत बना ली है

आज ये फिल्मों और किताबों के बारे में है, कल ये पत्रकारिता या किसी और बारे में होगा. आज़ादी में हो रही इस दख़लअंदाज़ी के ख़िलाफ़ खड़ा होना अब ज़रूरी हो गया है.

Wire Hindi Editorial

एक बार फिर हिंदी फिल्म के निर्माताओं ने अपनी फिल्म से ‘आपत्तिजनक दृश्यों’ को हटाने के दबाव और धमकियों के आगे हथियार डाल दिए. भारत की न्यायिक व्यवस्था पर तंज़ करती फिल्म ‘जॉली एलएलबी-2’ के निर्माताओं ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर फिल्म से चार सीन हटा दिए हैं.

वे इस फैसले को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचे थे, पर 10 फरवरी को फिल्म को रिलीज़ करने के चलते उन्होंने अपील ख़ारिज कर दी.

ग़ौरतलब है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) ने इस फिल्म को बिना किसी कट के पास कर दिया था. एक वकील के फिल्म के ख़िलाफ याचिका दायर करने के बाद फिल्म कोर्ट तक पहुंची.

इन वकील साहब का मानना था कि फिल्म में इस पेशे का मज़ाक उड़ाया गया है. वे यह भी चाहते थे कि फिल्म के नाम से ‘एलएलबी’ शब्द को भी हटा दिया जाए. यहां ध्यान देने वाली बात ये है शिकायत करने वाले ने फिल्म नहीं देखी है (फिल्म का ट्रेलर देखकर ही वे जान गए कि फिल्म में वकीलों का मज़ाक बनाया गया है) पर फिर भी कोर्ट ने फिल्म देखने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया जिसने चार दृश्यों पर आपत्ति जताई और उन्हें फिल्म से काटने का आदेश दिया.

क्या ये तीनों सिनेमा के विशेषज्ञ थे? हम नहीं जानते. क्या जिन दृश्यों में वकीलों का मज़ाक बनाया गया, वहां इन्हें गुस्सा आया? शायद.

फिल्म के निर्माता यह कह सकते हैं कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था, क्योंकि फिल्म की रिलीज़ सिर पर आ चुकी थी. उन्हें निश्चित तारीख पर फिल्म रिलीज़ करनी थी. यहां काफी धन दांव पर लगा है, इसे बेकार करने से बेहतर था कि समझौता कर लिया जाए.

उनकी बात सही है. पर एक और बात जो सही है वो ये कि फिल्म इंडस्ट्री ने धमकियों और ब्लैकमेलिंग के सामने झुकने को अपनी आदत बना लिया है. और इस बात से तमाम असंतुष्ट, हर बात का विरोध करने वाले, पब्लिसिटी चाहने वाले और शायद कुछ ब्लैकमेलरों को भी बल मिला है, साथ ही कुछ दिनों के लिए लाइमलाइट में आने का मौका भी.

इंडस्ट्री की इस बुज़दिली और पीछे हट जाने की हमारे पास दो हालिया मिसालें भी  हैं. पहले संजय लीला भंसाली को ‘करणी सेना’ ने सरेआम बेइज्ज़त किया, यह साहसी सेना किसी निहत्थे फिल्म निर्देशक को मारकर एक काल्पनिक राजकुमारी के सम्मान की रक्षा कर रही थे. पर भंसाली ने चुपचाप इनसे समझौता कर लिया.

उनकी फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण भी इस हिंसा और इसे करने वालों की आलोचना करने की बजाय यह कहकर उनके गुस्से को कम करने की कोशिश करती दिखीं कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर आपत्ति की जा सके.

यहां यह ध्यान रहे कि यह फिल्म अभी बन ही रही है. इससे पहले करण जौहर, जिन्होंने एक पाकिस्तानी अभिनेता को अपनी फिल्म में लिया था, ने भी ऐसा बेतुका समझौता किया था.

उन्होंने सफाई दी कि जब दोनों देशों के संबंध सामान्य थे तब उन्होंने उस अभिनेता को फिल्म में लिया. राज ठाकरे की धमकी के बाद उन्होंने आर्मी वेलफेयर फंड में पांच करोड़ रुपये देकर और अपना स्पष्टीकरण देता एक वीडियो बनाकर अपनी देशभक्ति साबित की.

ठाकरे के लोगों ने धमकी दी थी कि वे फिल्म को रिलीज़ नहीं होने देंगे, पर फिर समझौता हुआ, जिसके सूत्रधार बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस.

दूसरे शब्दों में कहें तो अगर कोई फिल्मकार अपनी बात कहना चाहता है तब न तो सरकार से न ही किसी सरकारी संस्था से उसे कोई मदद मिलेगी. दुख की बात यह है कि कोर्ट भी उसके साथ नहीं खड़ा होगा.

1989 में ‘ओरु ओरु ग्रामाथिले’ मामले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि किसी भी फिल्म को अगर सेंसर बोर्ड द्वारा पास कर दिया जाएगा, तब उस पर किसी ‘अति संवेदनशील’ व्यक्ति की शिकायत नहीं दर्ज़ की जाएगी.

पर फिर भी, माननीय जज साहब ने जॉली एलएलबी के खिलाफ आई शिकायत को नज़रअंदाज़ करने की बजाय उस पर संज्ञान लेना बेहतर समझा.

करण जौहर के मामले में मुख्यमंत्री जी ने वो किया जो उन्हें लगा कि बिल्कुल सही था पर उनका काम फिल्म की रिलीज़ सुनिश्चित करना था. और जयपुर में भंसाली मामले में तो पुलिस ने बताया कि भंसाली ने खुद भरोसा दिलाया है कि वे वहां शूटिंग नहीं करेंगे.

वैसे कई ऐसे फिल्मकारों के भी उदाहरण हैं जिन्होंने झुकने से मना कर दिया. अनुराग कश्यप अपने प्रोडक्शन की फिल्म उड़ता पंजाब के लिए सेंसर बोर्ड अध्यक्ष पहलाज निहलानी के खिलाफ खड़े हुए थे.

पहलाज ने उनकी फिल्म को पास करने से पहले ढेरों कट की सूची दी थी. अनुराग कोर्ट पहुंचे और जीते. फिल्म बहुत ही कम काटे गए दृश्यों के साथ रिलीज़ हुई.

बॉलीवुड से किसी तरह की एकता की उम्मीद करना ही बेमानी है; वे अपने लिए ही खड़े नहीं होते हैं. पर इस बात को सिर्फ बॉलीवुड से जोड़कर देखना ग़लत होगा.

रचनात्मक अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला हम सभी से जुड़ा हुआ है. बड़े फलक पर देखें तो समाज पर इस तरह की धमकियों का कोई अच्छा असर नहीं होता.

हमें न केवल इस तरह की हरकत करने वाले शरारती तत्वों के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा बल्कि सरकारी संस्थाओं द्वारा इनके प्रति बरती जा रही नरमी पर भी आवाज़ उठानी होगी.

आज ये फिल्मों और किताबों के बारे में है, कल ये पत्रकारिता या किसी और बारे में होगा. हमारी आज़ादी और मूल्यों पर हो रही इस दख़लअंदाज़ी के ख़िलाफ़ खड़ा होना अब ज़रूरी हो गया है.