प्रासंगिक

‘पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म हो रहे हैं तो क्या हम भी यहां वही करें?’

जवाहर लाल नेहरू की पुण्यतिथि पर विशेष: नेहरू हमारे स्वतंत्रता आंदोलन से निकले अकेले ऐसे नायक हैं, जिनकी विचारधारा और पक्षधरता में कोई विरोधाभास नहीं है.

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पंडित जवाहर लाल नेहरू. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

जब देश के हालात ऐसे हो चले हैं कि जम्मू-कश्मीर में सेना के एक मेजर द्वारा एक सैन्य आपरेशन के दौरान एक कश्मीरी नवयुवक को अपनी जीप के आगे बांधकर मानव-ढाल के रूप में इस्तेमाल करने को लेकर कहा जा रहा है कि उसने धर्मनिरपेक्षता की मुश्कें कसकर राष्ट्रीयता का परचम लहराया है.

सरकार और सेनाध्यक्ष उसका सम्मान कर रहे हैं और कई लोग धर्मनिरपेक्षता को संविधान की प्रस्तावना तक में बरदाश्त करने के मूड में नहीं हैं, बरबस याद आता है कि इस नवस्वतंत्र देश में सर्वोत्कृष्ट संवैधानिक मूल्य के रूप में धर्मनिरपेक्षता की प्रतिष्ठा के लिए पं. नेहरू को न सिर्फ तत्कालीन हिन्दू महासभा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बल्कि कांग्रेस के भीतर गोविन्द वल्लभ पंत व पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे संकीर्णतावादियों से भी जमकर लोहा लेना पड़ा था.

इतिहास गवाह है कि तब हिन्दू महासभा व संघ का कांग्रेस के इन संकीर्णतावादियों से उच्चस्तरीय सहयोग, कहना चाहिए गठजोड़, था. यह और बात है कि नेहरू के महानायकत्व के आगे उनकी एक नहीं चली थी.

दरअसल, देश के विभाजन के बाद हिन्दू महासभा और संघ का यह विश्वास और पक्का हो गया था कि वे देश की नई सांप्रदायिक स्थिति को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेंगे.

गांधी जी की हत्या का दांव उलटा पड़ा था, फिर भी कांग्रेस के अन्दर के अपने शुभचिंतकों से उन्हें ढेरों उम्मीदें थीं. ये उम्मीदें फलवती होती भी दिखीं, जब अयोध्या में 22-23 दिसम्बर, 1949 की रात षडयंत्रपूर्वक बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रख दिये जाने के मामले में यूपी के प्रीमियर गोविन्दवल्लभ पंत ने सरदार पटेल व टंडन की शह से हेकड़ीपूर्वक नेहरू की अवज्ञा शुरू कर दी.

लेकिन इस अवसर पर नेहरू ने खासी राजनीतिक परिपक्वता से काम लिया. 17 अप्रैल, 1950 को उन्होंने पंत को लिखा, ‘मैं पा रहा हूं कि साम्प्रदायिकता आज उन लोगों के दिलो-दिमाग में भी प्रवेश कर चुकी है, जो इससे पहले कांग्रेस के स्तम्भ हुआ करते थे. यह धीरे-धीरे बढ़ता हुआ लकवा है जिसे बीमार समझ भी नहीं पा रहा.’

साथ ही उन्होंने लिखा कि एक दिन वे इसके विरुद्ध अपनी पूरी शक्ति से अभियान शुरू करेंगे. दो मई, 1950 को उन्होंने सारे मुख्यमंत्रियों को लिखा, ‘हम सम्प्रदायों के बीच एकता का उद्देश्य भूल गये हैं. धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं…पर उसे बहुत कम समझ पाये हैं.’

फिर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने और सख्ती से काम लिया. 8 अगस्त, 1950 को सीधे पुरुषोत्तमदास टंडन को लिखा, ‘आप भारत में लोगों की बड़ी संख्या के लिए साम्प्रदायिक और पुरातनपंथी दृष्टि के प्रतीक बन गये हैं.’ इसलिए कृपया कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव न लड़ें. 28 अगस्त को सरदार पटेल को पत्र लिखकर टंडन के प्रति अपने एतराजों के कारण बताये.

फिर भी टंडन अगस्त, 1950 में हुआ कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़े और जीते तो संघ व हिन्दू महासभा की बांछें खिल गयीं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने उनकी जीत पर संतोष जताया और संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गनाइजर’ ने अपने 11 सितम्बर, 1950 के अंक में लिखा कि यह कांग्रेस के ‘गांधी प्लस नेहरू’ समीकरण की पराजय और ‘गांधी प्लस पटेल’ की जीत है.

इसके बाद नेहरू की चुनौतियां खासी विकट हो गयीं. लेकिन वे ऐसे ही नेहरू नहीं बन गये थे. जल्दी ही उन्होंने बाजी पलट दी. सितंबर, 1950 में टंडन की बल्ले-बल्ले के बीच नासिक में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ तो नेहरू ने उसके मंच से आर या पार की शैली में कई कड़ी, खरी व दो टूक बातें कहीं, ‘पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहे हैं तो क्या हम भी यहां वही करें? यदि इसे ही जनतंत्र कहते हैं तो भाड़ में जाये ऐसा जनतंत्र!’

उन्होंने सम्मेलन के प्रतिनिधियों से कहा, ‘यदि आप मुझे प्रधानमंत्री के रूप में चाहते हैं तो आपको बिना शर्त मेरे पीछे चलना होगा. नहीं चाहते तो वैसा साफ-साफ कहें. मैं पद छोड़ दूंगा और कांग्रेस के आदर्शों के लिए स्वतंत्र रूप से लड़ूंगा.’

तीर निशाने पर लगा और उन्होंने न सिर्फ प्रतिनिधियों का विश्वास जीत लिया बल्कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का भविष्य भी तय कर दिया. ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अपने 22 सितम्बर, 1950 के अंक में लिखा, ‘अब तय हो गया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनने की ओर बढ़ेगा, न कि परम्परावादी हिन्दू गुट द्वारा शासन की ओर.’

आगे चलकर मजबूर टंडन को कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा और 1952 के आम चुनाव में देश के मतदाताओं ने भी नेहरू की धर्मनिरपेक्ष नीतियों पर मुहर लगाकर न सिर्फ हिन्दू महासभा बल्कि सारे सम्प्रदायवादियों को औकात बता दी. कुछ ऐसे कि वे लम्बे वक्त तक कोई मंसूबा ही न बांध सके.

तभी से नेहरू को लेकर सम्प्रदायवादियों की वैचारिक खुन्नस वक्त-वक्त पर नये-नये रूपों में सामने आती रही है.

यही कारण है कि सरदार वल्लभभाई पटेल के रास्ते महात्मा गांधी से लेकर बाबासाहब डा. भीमराव अम्बेडकर तक देश व कांग्रेस के अनेक नायकों को उनकी पुरानी पहचान उसे अलग करके ‘अपना’ बनाने में लगी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार, और तो और, नेहरू की 125 जयंती तक पर उन्हें लेकर कोई उत्साह नहीं प्रदर्शित कर सकी.

हालांकि संघ परिवार के लोग अटल जी की युवावस्था में ही एक दिन उनके प्रधानमंत्री बनने की पं. नेहरू की भविष्यवाणी का जिक्र करते अघाते नहीं हैं और गत लोकसभा चुनाव के अपने भाषणों में नरेंद्र मोदी ने भी अटल जी की 1971 की दुर्गा यानी श्रीमती इंदिरा गांधी की तारीफ के पुल बांधने से परहेज नहीं किया था.

ऐसे में पं. नेहरू को लेकर उनकी उत्साहहीनता का एकमात्र सबब यही नजर आता है कि उन्हें उनके नायकत्व में अपने लिए कोई संभावना ही नजर नहीं आती. यकीनन, नेहरू हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन से निकले अकेले ऐसे नायक हैं, जिनकी विचारधारा और पक्षधरता में कोई द्वैत यानी झोल नहीं है.

सरदार बल्लभभाई पटेल को तो छोड़िए, ऐसे झोल आपको थोडी देर को महात्मा गांधी तक में दिख सकते हैं. नहीं दिखते तो प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी अपने तईं उनका नया रूप क्यों गढ़ने लगते?

अब उनके लोग उन बाबासाहब को भी, जो अपने निश्चय के अनुसार मरते वक्त हिन्दू नहीं रह गये थे, ‘घरवापसी’ का समर्थक और हिन्दू धर्म का पैरोकार सिद्ध करने का द्रविड़ प्राणायाम कर रहे हैं तो जाहिर है कि उन्हें उनमें भी ऐसे कुछ झोल दिख गये हैं.

उनका दुर्भाग्य कि नेहरू कहीं भी उन्हें ऐसी कोई छूट देते नजर नहीं आते, जिससे वे किसी भी स्तर पर उन्हें अपने पोंगापंथी, प्रतिगामी, परम्परावादी, सम्प्रदायवादी और पोच सोच के प्रति तनिक भी सहिष्णु साबित कर पायें.

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वे जिन मूल्यों के साथ रहे और प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने जैसे आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी भारत का निर्माण करना चाहा, उससे जुड़े उनके विचारों की यह कहकर तो आलोचना संभव है कि कई मामलों वे कम्युनिस्टों के साथ खड़े दिखने लगते हैं, लेकिन यह कहकर नहीं कि उनकी प्रगतिशीलता में कहीं कोई लोचा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

  • Kam

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