नॉर्थ ईस्ट

एक हताश मां का संघर्ष, जिसके बेटे की हत्या का आरोप मणिपुर सीएम के बेटे पर है

साक्षात्कार: छह साल से मणिपुर की एक मां अपने बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए भटक रही है. उनके बेटे की हत्या का आरोप राज्य के मुखिया एन. बीरेन सिंह के बेटे पर है.

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साल 2011 में 20 मार्च को इम्फाल के रहने वाले इरोम रॉजर की गोली लगने से मौत हो गई थी. इम्फाल में रोड रेज़ के एक मामले में वर्तमान मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के बेटे एन. अजय मेईतेई ने इरोम को बहुत नज़दीक से गोली मारी थी, जिसके बाद उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया था.

सीबीआई द्वारा मामले की जांच के बाद इम्फाल की एक निचली अदालत ने एन. अजय को ग़ैर-इरादतन हत्या का दोषी बताते हुए उन्हें 5 साल कारावास की सज़ा सुनाई. 7 जनवरी 2012 से अजय राज्य की सजीवा सेंट्रल जेल में बंद हैं.

हाल ही में अजय के वक़ील द्वारा मणिपुर हाईकोर्ट में उनकी ज़मानत के लिए आवेदन किया गया. इस पर विरोध जताते इस साल 12 मई को इरोम रॉजर की मां इरोम चित्रा ने अधिवक्ता उत्सव बैंस की मदद से सुप्रीम कोर्ट में इस ज़मानत की अर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक याचिका दर्ज की. बैंस बताते हैं कि वे अलग से भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले हैं.

मीडिया में यह ख़बर भी आई थी कि हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के बाद उत्सव बैंस और नई दिल्ली में रहने वाली इम्फाल की सामाजिक कार्यकर्ता बीनालक्ष्मी नेपराम ने आरोप लगाया है कि उन्हें एक उग्रवादी संगठन और राज्य की पुलिस की ओर से लगातार दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ा था.

बैंस ने तब केंद्रीय गृह सचिव को उनको वॉट्सऐप कॉल के ज़रिये मिली धमकी के बारे में बताते हुए पत्र लिखा था, साथ ही पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई थी.

वहीं बीनालक्ष्मी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके बताया था कि जब वे इम्फाल में नहीं थीं, तब कुछ हथियारबंद पुलिसवालों ने इम्फाल में उनके घर जाकर उनके बूढ़े माता-पिता को परेशान किया.

बीनालक्ष्मी की इस शिकायत पर पुलिस ने स्थानीय मीडिया को बताया कि वे बैंस की धमकी मिलने की शिकायत के बाद उनका बयान लेने उनके घर गए थे.

हाल ही में रॉजर के माता-पिता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर अपने लिए न्याय की गुज़ारिश करने नई दिल्ली भी आए. इस दौरान द वायर से बातचीत में उनकी मां इरोम चित्रा ने अपने पिछले 6 साल के इंसाफ के संघर्ष के अनुभव साझा किए.

जब आपके बेटे की मौत हुई तब उसकी क्या उम्र थी?

रॉजर उस वक़्त साढ़े 18 साल का था और बंगलुरु से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था. जब यह हादसा हुआ तब वो छुट्टी में घर आया था. वो मेरा इकलौता बेटा था.

क्या आप बता सकेंगी कि उस रोज़ (20 मार्च, 2011) को क्या हुआ था? क्या रॉजर एन. अजय को पहले से जानते थे?

उस दिन से मेरी पूरी ज़िंदगी ही बदल गई. उस दिन मैं और मेरे पति एक दर्दनाक ज़िंदगी जी रहे हैं; हमारी जान को ख़तरा है, हम पर कई लोगों द्वारा केस वापस लेने का दबाव लगातार बनाया जा रहा है. पर हम न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं.

रॉजर अजय को पहले से नहीं जानता था. वो होली का दिन था, (जिसे स्थानीय रूप से योशांग के नाम से मनाया जाता है) वो अपने चार और दोस्तों के साथ कार लेकर शहर में घूमने निकला था.

उसी समय मंत्री एन. बीरेन का बेटा एन. अजय (उस समय एन. बीरेन कांग्रेस सरकार में युवा मामलों और खेल मंत्री थे) भी अपनी बोलेरो गाड़ी में इन लोगों के आगे चल रहे थे. उनकी गाड़ी के पीछे एक दोपहिया गाड़ी पर दो लड़कियां थीं.

अजय न तो उन्हें रास्ता दे रहे थे, न रॉजर और न उनके दोस्तों को. रॉजर ने कई बार हॉर्न दिया, जिसके बाद अजय ने अपनी गाड़ी बीच रास्ते में ही रोकी और ग़ुस्से में बाहर निकले. फिर उन्होंने अपनी बंदूक निकाली और रॉजर पर गोली चलाकर भाग गए. अस्पताल ले जाते हुए रॉजर ने दम तोड़ दिया.

मैं घर पर ही थी, जब मुझे ये ख़बर मिली. मैं भागते हुए अस्पताल पहुंची पर तब तक वो जा चुका था. अस्पताल के बिस्तर पर मुझे उसका शव मिला.

फिर आपने क्या किया?

मेरे पति ने सिंग्जमाई पुलिस थाने में एफआईआर लिखवाई, जिसके बाद एक जॉइंट एक्शन कमेटी बनी. इस कमेटी ने रॉजर का शव लेने से इनकार करते हुए राज्य सरकार से इस मामले पर ठोस कदम उठाने की मांग की, साथ ही मंत्री का इस्तीफा भी मांगा.

जनता ने इस मामले पर काफी हंगामा किया था, जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह (भाजपा में शामिल होने से पहले एन. बीरेन सिंह एक समय पर इबोबी के करीबी माने जाते थे) ने विधानसभा में बयान दिया था कि अजय जो गाड़ी चला रहे थे वो उनके पिता को बतौर पार्टी प्रवक्ता दी गई थी.

इस बयान के अगले दिन उन्होंने फिर विधानसभा में कहा अजय बोलेरो से बाहर निकले और मैरून रंग की आल्टो गाड़ी में बैठे रॉजर को गोली मारी.

जनता के गुस्से के चलते मुख्यमंत्री को यह भी कहना पड़ा कि पूरी जांच के लिए मामला पुलिस से सीबीआई को ट्रांसफर किया जाएगा. इसके बाद ही कमेटी शव लेने को राज़ी हुई और मौत के दो दिन बाद 22 मार्च को रॉजर का अंतिम संस्कार किया गया.

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मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह. (फोटो: पीटीआई)

मामला सीबीआई को कब मिला?

मुख्यमंत्री ने तो उस वक़्त घोषणा कर दी थी, पर तब ऐसा नहीं हुआ. उसी साल अप्रैल में कुछ शुभचिंतकों की मदद से मैं दिल्ली आई और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम से मिली.

उन्हें पूरा मामला बताया और सहयोग की मांग की. उनसे गुज़ारिश की कि वे मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जिससे मेरे बेटे को न्याय मिल सके. उनके हस्तक्षेप के बाद मई 2011 में मामला सीबीआई के पास आया.

2012 में सीबीआई में मुख्य आरोपी अजय के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की. हालांकि इसमें उन्हें हत्या का आरोपी नहीं बताया गया था बल्कि आरोप अवैध रूप से हथियार रखने का था.

सीबीआई द्वारा दाख़िल इस आरोपपत्र में पर्याप्त सबूतों के अभाव के आधार पर अजय के साथ उस रोज़ कार में मौजूद उसके चार सहयोगियों को इम्फाल (पश्चिम) की सत्र अदालत के आदेशानुसार आरोप मुक्त कर दिया गया. इससे हमारा केस कमज़ोर हुआ.

इसके बाद इम्फाल (पश्चिम) की सत्र अदालत ने अजय को क़त्ल के बजाय आईपीसी की धारा 304 के तहत ग़ैर-इरादतन हत्या का दोषी माना और उन्हें 6 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया.

अजय की सज़ा की फैसला 11 जनवरी को आना था पर इसे 20 जनवरी तक टाला जाता रहा. फिर अजय को महज़ पांच साल की सज़ा सुनाई गई. मैं उस वक़्त बिल्कुल टूट गई थी, पर जैसे-तैसे ही सही मैंने इसे धीरे-धीरे स्वीकार कर लिया.

फिर आपने मणिपुर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका डालने की क्यों सोची?

क्योंकि एन. बीरेन सिंह के मणिपुर का मुख्यमंत्री (अब तक वे भाजपा में आ चुके थे) बनने के 4-5 दिन बाद ही उनके बेटे की ओर से हाईकोर्ट में ज़मानत की अर्ज़ी दी गई.

चूंकि सीबीआई ये मामला देख रही थी, इसलिए तब मैं सीबीआई के दफ्तर गई और पूछा कि क्या मैं इस ज़मानत को रुकवाने की अर्ज़ी दे सकती हूं. सीबीआई के जिन एसपी से मैं मिली, उन्होंने कहा कि वे दिल्ली में बैठे सीबीआई डायरेक्टर को लिखेंगे. पर ये तो साफ था कि वे इसे तुरंत रोकने के लिए कुछ नहीं करने वाले थे.

तब मैंने ख़ुद अपनी लड़ाई लड़ने की सोची. मैंने सोचा कि ज़मानत को रोकने के लिए मैं हाईकोर्ट जाऊंगी पर कोई भी स्थानीय वक़ील मेरा केस लेने को तैयार नहीं हुआ.

तब मैंने दिल्ली में रहने वाली मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता बीनालक्ष्मी नेपराम से संपर्क किया, जिनकी मदद से मुझे सुप्रीम कोर्ट के वक़ील उत्सव बैंस मिले और उन्होंने हमारा केस अपने हाथ में लिया.

हाल ही में उत्सव बैंस ने शिकायत दर्ज करवाई कि मणिपुर के एक उग्रवादी संगठन से उन्हें ये केस छोड़ने के लिए धमकियां मिल रही हैं. जब वे हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के लिए इम्फाल जा रहे थे, तब उन्होंने गृह सचिव को सुरक्षा देने के लिए चिट्ठी भी लिखी थी.

हां, मुझे मालूम चला था इस बारे में. वे 17 मार्च को केस से जुड़े दस्तावेज लेने आदि के लिए इम्फाल आए थे. मैंने उन्हें एफआईआर और सेशन कोर्ट के फैसले की प्रतियां सौंपी थीं.

उन्होंने बताया कि वहां से दिल्ली पहुंचने के दो दिन बाद 22 मार्च को उन्हें ये धमकी मिली थी. (बैंस ने बताया कि कॉल करने वाले ने ख़ुद को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का बताया था. मणिपुर में सक्रिय पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को भारत सरकार द्वारा एक आतंकी संगठन का दर्जा दिया गया है)

मणिपुर पुलिस पर अक्सर सत्ता में बैठे नेताओं के हाथ की कठपुतली होने का आरोप लगता रहा है. उन पर मानवाधिकार उल्लंघन के भी कई आरोप लग चुके हैं. आपका क्या अनुभव रहा?

मणिपुर पुलिस पर अक्सर सत्ता में बैठे नेताओं के हाथ की कठपुतली होने का आरोप लगता रहा है. उन पर मानवाधिकार उल्लंघन के भी कई आरोप लग चुके हैं. आपका क्या अनुभव रहा?

रॉजर के श्राद्ध (मृत्यु के 14वें दिन होने वाली रस्म) के अगले दिन आधी रात के करीब कुछ हथियारबंद पुलिस वाले मेरे घर आए और दरवाज़ा खोलने को कहा जो अंदर से बंद था.

मैंने उन्हें मना कर दिया और दिन में आने को कहा. मुझे शक़ था कि वो लोग मुख्यमंत्री के विधानसभा में दिए गए बयानों की प्रतियां लेने आए थे, जो मैंने अपने केस को मज़बूत बनाने के संभालकर रख लिए थे.

मैंने वो कागज़ एक प्लास्टिक की थैली में रखे और एक चाकू लेकर रेंगते हुए अपने कमरे से बाहर गई और चुपचाप आंगन में एक गड्ढा खोदकर उसमें दबा दिए और उस पर एक गमला रख दिया. फिर मैंने कमरे में आकर पुलिसवालों के जाने का इंतज़ार किया. मैं बेहद डर गई थी. वे घर के बाहर ही खड़े थे. मैंने पुलिस की चार गाड़ियां देखी थीं.

अगली रात वे फिर उसी वक़्त आए. मैंने फिर दरवाज़ा खोलने से इनकार कर दिया.

इसके बाद मैं पुलिस थाने गई और एसपी से मिली. उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने उन गाड़ियों का नंबर क्यों नोट नहीं किया. इस पर मैंने पलटकर उन्हीं से सवाल किया कि अंधेरे में ऐसा कैसे संभव था! इसके अगले ही दिन मैंने उन दस्तावेज़ों की कई कॉपियां निकलवाईं और उन्हें सुरक्षित जगहों पर रख दिया.

मैं आज भी इस सदमे से बाहर नहीं आई हूं क्योंकि मैं जहां भी जाती हूं, पुलिस की गाड़ियां मेरा पीछा करती हैं. मैं बीते 6 सालों से अपने बेटे के लिए न्याय पाने का संघर्ष कर रही हूं. पर मैं हार नहीं मानने वाली हूं.

मेरी मुख्यमंत्री एन. बीरेन से कोई निजी दुश्मनी नहीं है, उन्हें मेरी शुभकामनाएं लेकिन मुझे अपने बेटे के लिए न्याय मांगने का अधिकार तो है.

मीडिया में इस तरह की ख़बरें भी थीं कि राज्य सरकार द्वारा आपका साथ देने वाले दोस्तों और रिश्तेदारों को डराया-धमकाया जा रहा है.

मेरा कोई भी रिश्तेदार अब मेरे साथ नहीं है क्योंकि वे सब डरे हुए हैं. मैं अकेली खड़ी हूं. इस साल 14 मई को आधी रात में मेरे एक दूर के रिश्तेदार निंगोबम बिरजीत के घर हथियारबंद पुलिसवाले पहुंचे और उन्हें उठाकर ले गए.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वो हाईकोर्ट में एन. अजय की ज़मानत अर्ज़ी के ख़िलाफ़ मुझे याचिका दायर करने में मदद कर रहे थे. इससे दो दिन पहले जब बिरजीत दिल्ली से लौटे थे तब इम्फाल एअरपोर्ट से उनके घर के पास तक हथियार लिए पुलिसकर्मियों ने उनका पीछा किया था. 14 मई से बिरजीत पुलिस हिरासत में हैं.

इसके बाद मुझे पता चला कि हथियार के साथ कुछ पुलिसवाले बीनालक्ष्मी की ग़ैर-मौजूदगी में उनके इम्फाल वाले घर भी पहुंचे थे.

क्या आपको न्याय की उम्मीद है?

हां. मुझे उच्च न्यायिक व्यवस्था से न्याय मिलने की आस है. इस मामले में मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी बहुत उम्मीदें हैं. मैंने उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने की कोशिश भी की है, ताकि मैं और मेरे पति की आपबीती बता सकें.

मैंने सुना है वे अच्छे इंसान हैं, मुझे ऐसा लगता है कि वे हमारी बात सुनेंगे और इंसाफ दिलाने में मदद करेंगे. जैसा मैंने पहले भी कहा है कि मणिपुर के मुख्यमंत्री से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है पर मुझे अपने बेटे के लिए न्याय मांगने का अधिकार है, जिसे बिना किसी कारण के मार दिया गया. मैंने 19 मई को गृहमंत्री को भी अपने बेटे के लिए न्याय मांगती एक मां को इंसाफ दिलाने में सहयोग देने के लिए ज्ञापन दिया है.

नोट: इस साल 22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने रॉजर के माता-पिता द्वारा उनकी सुरक्षा को लेकर दायर की गई याचिका को सुना. इस याचिका में रॉजर के माता-पिता का आरोप था कि उनके केस के मुख्य आरोपी के पिता मणिपुर के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं, जिससे उन्हें ख़तरा हो सकता है.

उनका यह भी आरोप था कि बीरेन उन्हें धमकाने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन आरोपों पर जस्टिस एल. नागेश्वर और जस्टिस नवीन सिन्हा की अवकाशीय बेंच ने केंद्र व मणिपुर सरकार से 29 मई तक जवाब मांगा है.

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