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सीवर में मौत: क़रीब 50 फीसदी पीड़ित परिवारों को ही मिला 10 लाख का मुआवज़ा

विशेष रिपोर्ट: द वायर द्वारा आरटीआई के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 1993 से साल 2019 तक महाराष्ट्र में सीवर सफाई के दौरान हुई 25 लोगों की मौत के मामले में किसी भी पीड़ित परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा नहीं दिया गया. वहीं, गुजरात में सीवर में 156 लोगों की मौत के मामले में सिर्फ़ 53 और उत्तर प्रदेश में 78 मौत के मामलों में सिर्फ़ 23 में ही 10 लाख का मुआवज़ा दिया गया.

Lucknow: Laboures work to open a clogged sewers after heavy rains in Lucknow on Monday, July 30, 2018. (PTI Photo/Nand Kumar) (PTI7_30_2018_000226B)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: साल 1993 से लेकर 2019 तक में देश भर में सीवर सफाई के दौरान जितनी मौतें हुई हैं, उसमें से करीब 50 फीसदी पीड़ित परिवारों को पूरे दस लाख रुपये का मुआवजा दिया गया है. कई मामलों में मुआवजे के रूप में 10 लाख रुपये से कम की राशि दी जा रही है. द वायर द्वारा दायर किए गए सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जरिये ये जानकारी सामने आई है.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 के अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि अगर किसी व्यक्ति की सीवर सफाई के दौरान मौत होती है तो पीड़ित परिवार को 10 लाख का मुआवजा देना होगा.

हालांकि केंद्र के राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) ने आरटीआई के तहत बताया कि राज्यों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक देश के 20 राज्यों ने 1993 से लेकर अब तक के सीवर सफाई के दौरान कुल 814 लोगों की मौत होने की जानकारी दी है और इसमें से सिर्फ 455 मामलों में ही पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया गया है.

हालांकि सीवर मौतों का ये आंकड़ा अभी काफी अधूरा है और आयोग बाकी जानकारी जुटाने के लिए राज्यों को लगातार पत्र लिख रहा है. राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन काम करता है. आयोग की जिम्मेदारी है कि वे देश भर में सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों के मामलों की मॉनिटरिंग करें और इससे संबंधित आंकड़ें इकट्ठा करें.

मालूम हो कि 27 मार्च 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत सरकार मामले में आदेश दिया था कि साल 1993 से सीवरेज कार्य (मैनहोल, सेप्टिक टैंक) में मरने वाले सभी व्यक्तियों के परिवारों की पहचान करें और उनके आधार पर परिवार के सदस्यों को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान किया जाए.

लेकिन द वायर द्वारा प्राप्त किए गए दस्तावेज दर्शाते हैं कि कई सारे मामलों में पीड़ित परिवारों को दस लाख रुपये के बजाय इससे कम जैसे कि चार लाख रुपये, पांच लाख रुपये, यहां तक कि दो लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जा रहा है. मुआवजा देने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति जैसे कि कॉन्ट्रैक्टर, नगर निगम, जिला प्रशासन, राज्य सरकार पर होती है.

आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक सीवर में दम घुटने से सबसे ज्यादा 206 मौतें तमिलनाडु में हुई हैं लेकिन इसमें से सिर्फ 162 मामलों में ही पीड़ित परिवार को पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया गया है.

इस मामले में गुजरात की हालत काफी खराब है. यहां पर अब तक कुल 156 लोगों की मौत सीवर सफाई के दौरान होने की पहचान की गई है, लेकिन सिर्फ 53 मामलों में यानी कि करीब 34 फीसदी पीड़ित परिवारों को ही पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया गया है.

उत्तर प्रदेश की भी हालत कुछ ऐसी ही है. यहां पर कुल 78 लोगों की मौत सीवर सफाई के दौरान होने की पहचान की गई है और सिर्फ 23 मामलों यानी कि करीब 30 फीसदी पीड़ित परिवारों को ही 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया है.

सफाई कर्मचारी आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि वे लगातार राज्यों को पत्र लिख रहे हैं कि जिन मामलों में 10 लाख से कम का मुआवजा दिया गया है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया जाए. द वायर ने इस संबंध में आयोग के अध्यक्ष मनहर वालजीभाई जाला से मैसेज और कॉल के जरिये संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

देश की राजधानी में पांच जुलाई 2019 तक सीवर मौतों के कुल 49 मामले सामने आए थे जिसमें से सिर्फ 28 मामलों में ही 10 लाख का मुआवजा दिया गया. हालांकि बीते सितंबर महीने में जाला ने कहा था कि अब तक दिल्ली में सीवर सफाई के दौरान कुल 64 लोगों की मौत हुई है, जिसमें से 46 के परिवारों को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है.

Sewer-Death-Compensation A

सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों का मामला कितना गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में बीते दो सालों में ही 38 सफाईकर्मियों की सीवर सफाई के दौरान मौत हो चुकी है.

अन्य राज्यों को अगर देखें तो हरियाणा में अब तक कुल सीवर सफाई के दौरान 70 लोगों की मौत हुई है, जिसमें से 51 पीड़ित परिवारों को ही 10 लाख का मुआवजा दिया गया है.

वहीं कर्नाटक में अब तक कुल सीवर सफाई के दौरान 73 लोगों की मौत हुई है, जिसमें से 64 मामलों में ही पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया गया.

महाराष्ट्र राज्य का मामला काफी चौंकाने वाला है. यहां पर अब तक कुल 25 लोगों की मौत सीवर सफाई के दौरान हुई, लेकिन एक भी पीड़ित परिवार को 10 लाख का मुआवजा नहीं दिया गया है.

मध्य प्रदेश में इस तरह के कुल सात मामले आए हैं और सातों मामलों में 10 लाख रुपये दिए गए हैं.

पंजाब में कुल 35 लोगों की मौत सीवर सफाई के दौरान हुई और सिर्फ 25 मामलों में ही 10 लाख का मुआवजा दिया गया है. वहीं राजस्थान में कुल 38 लोगों की मौत के मामले सीवर सफाई के दौरान आए हैं लेकिन सिर्फ 8 पीड़ित परिवारों को ही पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया गया है.

इसी तरह तेलंगाना में चार, त्रिपुरा में दो, उत्तराखंड में छह और पश्चिम बंगाल में 18 लोगों की मौत सीवर सफाई के दौरान सामने आई है, लेकिन इन राज्यों में क्रमश: दो, शून्य, एक और 13 मामलों में ही पूरे 10 लाख का मुआवजा दिया गया.

सामाजिक कार्यकर्ताओं और पीड़िताओं की ये शिकायत रहती है कि सीवर सफाई के दौरान मौत के मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है और थोड़ा मुआवजा देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है. आरोप है कि पुलिस भी इन मामलों में सही से जांच नहीं करती है.

मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने की दिशा में काम कर रहे गैर सरकारी संगठन सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा, ‘ये विषय सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं है. मुआवजा दिया तो भी ठीक है, नहीं दिया तो भी ठीक है. सरकार की प्राथमिकता शौचालय बनाने की है, सफाईकर्मियों की स्थिति सुधारने की नहीं.’

विल्सन के कोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी निराशा जताते हुए कहा, ‘कोर्ट को इस बात का संज्ञान लेना चाहिए था कि आखिर क्यों उनके आदेश का पालन नहीं हो रहा है. क्या उन्हें इसकी जानकारी नहीं है? अदालतें सिर्फ ये कहती हैं कि ये सही नहीं हो रहा है…, इतना कहने से किसी आदेश का पालन नहीं होता, उन्हें इसके लिए समयसीमा तय करनी चाहिए. सफाईकर्मियों की मौत के लिए जिम्मेदार एक भी व्यक्ति पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई है.’

केंद्र ने भी इसकी पुष्टि की है कि इन मामलों में किसी व्यक्ति पर कोई कार्रवाई हुई है या नहीं, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है. सरकार ने लोकसभा में बताया कि मैनुअल स्कैवेंजर्स को काम पर रखने के लिए किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने या सजा देने के संबंध में कोई जानकारी नहीं है.

मालूम हो कि हाल ही में सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा, ‘दुनिया के किसी देश में लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर्स में नहीं भेजा जाता है. हर महीने मैला ढोने के काम में लगे चार से पांच लोग की मौत हो रही है.’

सीवर से संबंधित मौतों से जुड़े आंकड़े इकट्ठा करने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. आयोग ये जानकारी राज्यों, अखबार या किसी के द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर इकट्ठा करते हैं.

एक अधिकारी ने बताया कि आयोग में कुल चार अखबार आते हैं उसी के आधार पर ये जानकारी ली जाती है और संबंधित विभाग को लिखा जाता है. सीवर से संबंधित मौतों की जो जानकारी इसमें नहीं होती है हमें उसके बारे में पता नहीं चल पाता है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1993 से लेकर अब तक में कुल 814 सफाईकर्मियों की सीवर सफाई के दौरान मौत हुई है. हालांकि सफाई कर्मचारी आंदोलन का दावा है कि करीब 1870 मौतें होने के मामले सीवर सफाई के दौरान आए हैं. विल्सन ने कहा कि उनके पास सीवर सफाई के दौरान 1096 मौतों के साक्ष्य हैं और उन्होंने इससे संबंधित सारी जानकारी मंत्रालय को दे दी है.

आयोग की शक्तियां हैं काफी सीमित

नियमानुसार देखें तो राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का काम निगरानी और दिशा-निर्देश देना है. इसके पास इन निर्देशों को लागू कराने की शक्तियां नहीं हैं. जिला स्तर पर अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि पात्र लोगों को मुआवजा दिया जाए.

12 अगस्त 1994 को सफाई कर्मचारी आयोग का गठन एक वैधानिक संस्था के रूप में तीन साल के लिए किया गया था. हालांकि बीच-बीच में संशोधन करके इसकी समय सीमा को बढ़ाया जाता रहा है. मौजूदा समय में ये गैर-वैधानिक (नॉन स्टैट्युटरी) संस्था के रूप में काम कर रहा है.

बता दें कि मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है. अगर किसी विषम परिस्थिति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए 27 तरह के नियमों का पालन करना होता है.

सीवर में अंदर घुसने के लिए इंजीनियर की अनुमति होनी चाहिए और पास में ही एंबुलेंस होना चाहिए ताकि दुर्घटना की स्थिति में जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सके.

सीवर टैंक की सफाई के दौरान विशेष सूट, ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, गम शूज, सेफ्टी बेल्ट व आपातकाल की अवस्था के लिए एंबुलेंस को पहले सूचित करने जैसे नियमों का पालन करना होता है. हालांकि ऐसे कई सारे मामले हैं, जिसमें ये पाया गया है कि इन नियमों का पालन न तो सरकारी एजेंसियां कर रही हैं और न ही निजी एजेंसियां.