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सूचना आयुक्तों की जल्द नियुक्ति हो, आरटीआई के तहत देर से सूचना मिलने से क्या फायदा: जस्टिस लोकुर

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस मदन बी. लोकुर ने सूचना आयोगों में ख़ाली पद पर भी चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि कोर्ट के साथ विभिन्न विभागों में ख़ाली पद होना मज़ाक का विषय बनता जा रहा है. जब तक ये ख़ाली पद भरे नहीं जाएंगे, ऐसे ही लंबित मामले बढ़ते रहेंगे.

जस्टिस मदन बी. लोकुर. (फोटो: द वायर)

जस्टिस मदन बी. लोकुर. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस मदन बी. लोकुर ने कहा है कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून में संशोधन की वजह से काफी नुकसान हो सकता है. उन्होंने कहा कि संशोधन को संसद से पारित हुए दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है लेकिन केंद्र सरकार ने इससे संबंधित नियम अभी नहीं बनाए हैं.

जस्टिस लोकुर आरटीआई लागू होने की 14वीं वर्षगांठ पर दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में सतर्क नागरिक संगठन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि जनवरी या मार्च में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे गए थे. जब इससे संबंधित विज्ञापन अखबारों में छापे गए थे तो कुछ बताया नहीं गया था कि किसे कितना वेतन मिलेगा, कितना कार्यकाल होगा.

उन्होंने कहा, ‘अब जो संशोधन आया है उसमें भी इससे संबंधित कुछ नहीं लिखा है. अब जिन्होंने पहले आवेदन किया था, पता नहीं उन्हें रुचि है भी या नहीं. इसकी वजह से काफी नुकसान होने की संभावना है. नियम न बनने की वजह से आरटीआई को नुकसान होगा.’

जुलाई, 2019 में आरटीआई संशोधन विधेयक संसद से पारित किया गया. इसके तहत अब सूचना आयुक्तों की सैलरी, कार्यकाल और उनका दर्जा केंद्र सरकार तय करेगी. पहले केंद्रीय सूचना आयुक्त का दर्जा, कार्यकाल और सैलरी केंद्रीय चुनाव आयुक्त के बराबर होता था और सूचना आयुक्तों का दर्जा, कार्यकाल और सैलरी चुनाव आयुक्तों के बराबर होते थे.

कार्यक्रम में मदन लोकुर के अलावा मौजूदा मुख्य सूचना आयुक्त सुधीर भार्गव, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर जैसे कई लोग मौजूद थे.

उन्होंने कहा कि आरटीआई एक्ट ने पेंशन, राशन जैसे कई मुद्दों पर मदद करने की कोशिश की. अगर आम नागरिक कोई गलती करता है तो सरकार उन्हें जेल में डाल देती है, पर कोई अगर सरकारी अफसर हो जिसने पेंशन रोक दी हो और आरटीआई के इस्तेमाल से पेंशन मिल जाती हो, तो ऐसे लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती. अगर इन्हें गलत पेंशन मिल जाती तो इन्हें जेल में डाल दिया जाता लेकिन जिसने पेंशन रोकी है उसके खिलाफ कुछ नहीं हुआ.

उन्होंने सीआईसी से गुजारिश की कि अगर आपके पास ऐसे मामले आते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई कीजिए, जुर्माना लगाइए. ताकि लोगों और सरकार को पता चले कि गलत काम न हो.

मदन लोकुर ने सूचना आयोगों में खाली पद पर भी चिंता जाहिर की.

उन्होंने कहा, ‘कोर्ट के साथ विभिन्न विभागों में खाली पद होना मजाक का विषय बनता जा रहा है. जब तक ये खाली पद भरे नहीं जाएंगे तो ऐसे ही लंबित मामले बढ़ते रहेंगे. अगर कोई आरटीआई आवेदन सालों लंबित रहेगा तो इससे सरकार नहीं बल्कि आम जनता का नुकसान होता है.’

जस्टिस लोकुर ने यह भी सुझाव दिया कि एक ऐसा ऐप बनाया जाए जहां सभी योजनाओं से संबंधित जानकारी हो, जिसके जरिए लोग योजनाओं के बारे में जान सकें और आरटीआई भी दायर कर सकें.

लोकुर ने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि मामलों की सुनवाई का सीधा प्रसारण होगा. इसलिए केंद्रीय सूचना आयोग भी इस दिशा में सोचे कि अगर कोई मामला व्यापक जनहित का है तो उसको लाइव टेलीकास्ट किया जाए.

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मुख्य सूचना आयुक्त सुधीर भार्गव. (फोटो: द वायर)

उन्होंने कहा, ‘अगर कोई मामला है जिसमें जनहित हो तो उसका लाइव टेलीकास्ट किया जाए ताकि सभी लोगों को पता चले कि ये मामला क्या है और इसमें क्या फैसला हो रहा है. इसमें क्या बहस हो रही है. सरकार क्या कह रही है. आम जनता क्या कह रही है. इससे काफी फायदा हो सकता है.’

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ने कहा कि सूचना आयोगों में दो लाख 70 हजार अपीलें लंबित हैं, उनको कैसे सुलझाया जाएगा. अगर किसी मामले की पांच साल के बाद सुनवाई होगी तो उसका क्या फायदा है.

वहीं मुख्य सूचना आयुक्त सुधीर भार्गव ने कहा कि आरटीआई का उद्देश्य आम नागरिक को सशक्त करना है. अगर पंक्ति में खड़े अंतिम छोर पर व्यक्ति सशक्त हो सकता है तो पूरा समाज सशक्त होता है.

भार्गव ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि इसका क्रियान्वयन अच्छे तरीके से हो. मेरा मानना है कि ये कानून अभी ज्यादा पुराना नहीं है. अभी 14 साल ही हुए हैं और इसकी प्रगति हुई है. पहले प्रत्येक 100 आरटीआई आवेदन में से 14 को कोई सूचना नहीं मिल पाती थी. आज ये आंकड़ा घटकर चार पर आ गया है.’

उन्होंने स्वीकार किया कि फैसले देने में देरी हो रही है. आयुक्त ने कहा कि इस समय जो सुनवाई चल रही है उसमें वे 2018 के मामले सुन रहे हैं. मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा, ‘सूचना मांगने के पीछे सूचना मांगने वालों का एक मकसद होता है. वो अपनी समस्या का निवारण चाहता है.’

उन्होंने अधिकतर सूचना आयुक्तों को नौकरशाह होने की बात को सही ठहराते हुए कहा कि ये अच्छी बात है. हमारी ट्रेनिंग ग्रामीण क्षेत्र से हुई है इसलिए हमारा उनकी तरफ झुकाव होता है.

उन्होंने न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि जब तक व्यक्ति की बदनियति साबित नहीं हो जाती है तब तक हम जुर्माना नहीं लगा सकते हैं. बहुत कम मामलों में ये साबित हो पाता है.

केस मैनेजमेंट पर उन्होंने कहा कि हर आयुक्त दिन में 15-16 मामलों को सुनता है. 90 फीसदी मामलों में फैसले उसी दिन अपलोड कर दिए जाते हैं.

सुधीर भार्गव ने कहा, ‘हमारा भी उद्देश्य है कि हम इसे सशक्त बनाएं. ऐसा नहीं कि हम और आप अलग हैं. हमारा झुकाव सरकार नहीं बल्कि आपकी तरफ होता है.’