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क्या मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारें चुनावों का सामना करने से डर रही हैं?

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने ‘मध्य प्रदेश नगर पालिका विधि संशोधन अध्यादेश, 2019’ को मंज़ूरी दी, जिसके तहत अब नगरीय निकायों के महापौर व अध्यक्षों का चुनाव जनता नहीं करेगी. इसी कदम का अनुसरण राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारों ने भी किया है.

भूपेश बघेल, कमलनाथ और अशोक गहलोत. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

भूपेश बघेल, कमलनाथ और अशोक गहलोत. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

1992 में केंद्र की राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया संविधान का 74वां संशोधन नगरीय निकायों से संबंधित था. 16 जनवरी 1993 से यह पूरे देश में प्रभावी हुआ.

इसके तहत त्रि-स्तरीय नगरीय निकायों (नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत) की व्यवस्था की गई थी. इसमें नगर निगम के महापौर और नगर पालिका व नगर पंचायत अध्यक्षों का चुनाव सीधे जनता द्वारा प्रत्यक्ष प्रणाली से करने का प्रावधान रखा गया. हालांकि, कई राज्यों ने इसका अनुसरण नहीं किया था.

मध्य प्रदेश उक्त संशोधन का अनुपालन करने वाला देश का पहला राज्य था. इसके क्रियान्वयन हेतु मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1994 पारित किया गया. जिसने नगर पालिका अधिनियम, 1956 की जगह ली. अधिनियम, 1956 में महापौर व अध्यक्षों का चयन अप्रत्यक्ष प्रणाली से होता था, जहां जनता पार्षद चुनती थी और पार्षद महापौर या अध्यक्ष का चयन करते थे.

1998-1999 से मध्य प्रदेश में (वर्ष 2000 से पहले छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था) नये अधिनियम के तहत महापौर व अध्यक्ष प्रत्यक्ष प्रणाली से जनता द्वारा चुने जाने लगे. विभाजन के बाद छ्त्तीसगढ़ ने भी इसी को अपनाया.

लेकिन अब दो दशक बाद, मध्य प्रदेश में कांग्रेस की ही सरकार ने यह व्यवस्था बदल दी है. 25 सितंबर को कमलनाथ सरकार ने ‘मध्य प्रदेश नगर पालिका विधि संशोधन अध्यादेश, 2019’ को मंजूरी दी, जिसके तहत महापौर व अध्यक्षों के चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से न होकर उसी अप्रत्यक्ष प्रणाली से होंगे जिससे कि 74वें संशोधन से पहले होते आए थे.

फिर उन्हीं पदचिह्नों पर चलते हुए छत्तीसगढ़ में भी यह बदलाव किया गया. इन दोनों राज्यों को देखते हुए राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने भी महापौर व अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही कराने का निर्णय ले लिया.

गौरतलब है कि इसी साल जनवरी में राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने नगर पालिका अधिनियम में संशोधन करके नगरीय निकायों के महापौर व अध्यक्षों का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराया जाना तय किया था. जनवरी के उक्त संशोधन से पहले राजस्थान में महापौर व अध्यक्षों का चयन अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही होता था.

कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में इन चुनावों को प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की वकालत की थी. अब उसका जनवरी के संशोधन को वापस लेना और घोषणा पत्र के विपरीत काम करना कई सवाल खड़े कर रहा है जिनके जवाब से बचने के लिए राजस्थान कांग्रेस ने अपने नेताओं पर इस संबंध में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने पर पाबंदी लगा दी है.

पाबंदी वाले पहलू की जानकारी राजस्थान कांग्रेस प्रवक्ता सुरेश चौधरी के जरिये द वायर  को मिली है. तीनों ही राज्यों में कांग्रेस की इस कवायद का व्यापक विरोध हो रहा है. गौरतलब है कि बीते वर्ष ही तीनों राज्यों में कांग्रेस एक साथ सत्ता में वापस लौटी हैं.

विपक्षी भाजपा का कहना है कि कांग्रेस चुनावों के माध्यम से सीधे जनता के सामने जाने से डर रही है. तीनों सरकारें 10 माह में ही अपनी लोकप्रियता खो चुकी हैं. इसलिए उन्हें डर है कि अगर महापौर और अध्यक्षों के चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होते हैं तो उन्हें हार झेलनी पड़ सकती है.

मध्य प्रदेश भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं, ‘तीनों राज्यों में सरकार में होने के बावजूद लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की बुरी हार हुई थी. उस हार से वे घबराए हुए हैं, इसलिए अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनावों के माध्यम से पार्षदों की खरीद-फरोख्त जैसे दांव-पेंच करके नगर निगम, निकाय और पंचायतों को कब्जाना चाहते हैं. चुनावों में जनता का सामना करने से उन्हें डर है कि कहीं लोकसभा चुनाव जैसी हालात फिर न हो जाए.’

गौरतलब है कि हालिया संपन्न लोकसभा चुनावों में कांग्रेस मध्य प्रदेश की 29 में से 28 सीटों पर हार गई थी. वहीं, राजस्थान में उसे सभी 25 सीटों पर हार मिली थी. छ्त्तीसगढ़ में छह माह पहले हुए विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत पाने वाली कांग्रेस राज्य की 11 में से 9 सीटों पर हार गई थी.

मध्य प्रदेश के लोकसभा चुनावों के इतिहास में कांग्रेस का वह सबसे खराब प्रदर्शन रहा था, जो छह माह पहले ही सरकार बनाने वाली पार्टी के लिए किसी झटके से कम नहीं था.

लोकसभा चुनाव के छह माह के भीतर ही मध्य प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव होने थे. लेकिन, पहले तो कमलनाथ सरकार ने क्षेत्रीय परिसीमन का कार्य टाल दिया, जिससे चुनाव अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गए हैं. उसके बाद सरकार उपरोक्त संशोधन अध्यादेश ले आई.

रजनीश के मुताबिक नये नियमों में कोई दल बदल कानून लागू नहीं है. इससे खरीद-फरोख्त को खुली छूट मिल गई है. साथ ही पुराने नियमों में ‘राइट टू रिकॉल’ जैसा प्रावधान था, जिनसे महापौर/अध्यक्षों पर अकर्मण्यता की स्थिति में हमेशा जनता की तलवार लटकी रहती थी. अब वो भी नहीं रहा है.

मध्य प्रदेश की भाजपा नगरीय निकाय समिति के अध्यक्ष कृष्ण मुरारी मोघे भी रजनीश की ही बात दोहराते हैं. वे कहते हैं, ‘अध्यादेश लाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण तो यही है कि कांग्रेस जनता के बीच जाने की स्थिति मे नहीं है. इसलिए यह प्रयास किया. दूसरी बात कि जब चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हुआ करते थे, तब पार्षदों की खरीद-फरोख्त होती थी. महापौर या अध्यक्ष जो वास्तव में जनता के प्रति उत्तरदायी होने चाहिए, उनकी सारी शक्ति पार्षदों को मैनेज करने में ही लग जाती थी. इसलिए राजीव गांधी 74वां संशोधन लेकर आए थे ताकि नगरीय निकाय ठीक ढंग से काम करें.’

फोटो साभार: फेसबुक/भाजपा

फोटो साभार: फेसबुक/भाजपा

वे आगे कहते हैं, ‘अब जब अप्रत्यक्ष चुनाव होंगे तो वही चीजें फिर से दोहराई जाएंगी. जिसके गंभीर परिणाम होंगे. इसलिए भाजपा विरोध कर रही है. लेकिन, आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस के जिन राजीव गांधी ने यह प्रावधान किया था, कांग्रेस उन्हीं की पहल और प्रयासों की धज्जियां उड़ा रही है.’

हालांकि, कांग्रेस का तर्क है कि अप्रत्यक्ष प्रणाली को अपनाने से नगरीय विकास को रफ्तार मिलेगी. साथ ही, प्रत्यक्ष चुनावों की स्थिति में होने वाला करोड़ों का खर्च बचेगा जिससे सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा.

मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना कहते हैं, ‘अधिकांश समय ऐसा होता था कि महापौर एक पार्टी का जीत गया, तो पार्षदों की संख्या किसी दूसरी पार्टी की अधिक हो जाती थी. जिससे विकास प्रभावित होता था और राजनीति शुरू हो जाती थी. दोनों एक-दूसरे के काम में अड़ंगे लगाते थे. इसी समस्या को देखते हुए हमने संविधान के अनुच्छेद 75 पर चलना तय किया जिसके तहत विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होते हैं. जिस दल के भी अधिक सांसद या विधायक जीतकर आते हैं, वह दल अपना नेता चुन लेता है जो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है. इसलिए पार्षदों से भी यह अधिकार क्यों छीना जाए?’

छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी का भी यही मानना है. साथ ही वे एक और तर्क देते हैं, ‘प्रत्यक्ष प्रणाली में महापौर का चुनाव होने से राजनीति में सक्रिय छोटे कार्यकर्ता यह चुनाव नहीं लड़ पाते थे क्योंकि चुनाव क्षेत्र बड़ा होता था और खर्च ज्यादा. लेकिन अब पार्षदों के माध्यम से जब अध्यक्ष और महापौर का निर्वाचन होगा तो सभी को अपनी काबिलियत साबित करने का मौका मिलेगा.’

कांग्रेस के इस प्रयास का अखिल भारतीय महापौर परिषद (एआईसीएम) भी विरोध कर रही है. एआईसीएम के अध्यक्ष नवीन जैन कहते हैं, ‘कांग्रेस अपनी बात को सही ठहराने के लिए लिए कुतर्क पर कुतर्क गढ़े जा रही है. यह बात सही है कि 74वें संशोधन से पहले पार्षद ही महापौर या अध्यक्षों को चुना करते थे. लेकिन जब जनता के द्वारा निर्वाचन की परंपरा चल पड़ी, जिसमें भ्रष्टाचार विहीन निर्वाचन होगा, तो अब जनता से वह अधिकार छीनकर फिर से पार्षदों तक सीमित क्यों किया जा रहा है?’

वे आगे कहते हैं, ‘कांग्रेस का यह प्रयास स्पष्ट कर देता है कि जनता के बीच उसका जनाधार नहीं बचा है. वह चाहती है कि पार्षदों को खरीदकर अपने महापौर और अध्यक्ष निकायों में बैठा दे. हमारा बस यह कहना है कि सत्ता जनता के लिए बनाई जाती है और जनता को चुनने का अधिकार होना चाहिए. यहां अपने स्वार्थ के लिए जनता से अधिकार छीना गया है. यह लोकतंत्र की हत्या है.’

74वां संशोधन न सिर्फ कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया था बल्कि संयुक्त मध्य प्रदेश में इसे लागू करने वाली भी कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार ही थी. अब फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने की कवायद भी कांग्रेस ही कर रही है.

अपनी ही बनाई नीतियों के खिलाफ जाने की इस कवायद पर रवि सक्सेना कहते हैं, ‘किसी भी नये प्रयास की शुरुआत करते समय सोचा जाता है कि भविष्य में अच्छे नतीजे मिलेंगे. यही सोचकर तब प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनावों की शुरुआत की थी. लेकिन जैसा मैने पहले कहा कि पिछले दो दशक में विकास रुक-सा गया था. इसी रुकावट की समाप्ति हेतु हमने अपना फैसला बदला.’

हालांकि विशेषज्ञ इस पर अलग राय रखते है. राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर कहते हैं, ‘यह कोई वाजिब कारण नहीं है एक नगरीय निकाय में पार्षद किसी दल के और महापौर या अध्यक्ष किसी और दल का हो तो विकास रुक जाता है. बल्कि इस दौरान जितने भी निकाय हैं, उनमें दोनों दलों के बीच बेहतर समन्वय देखने मिला है. कांग्रेस जो कह रही है, वह तार्किक नहीं है. जनता में अभी भी यह सवाल बना हुआ है कि कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया?’

वे आगे कहते हैं, ‘इसलिए सामान्य समझ यही बनती है कि कांग्रेस हार के डर से ऐसा कर रही है. क्योंकि अब तक उसने अपने इस फैसले के बचाव में ऐसी कोई भी तार्किक व्याख्या नहीं दी है जिससे कि जनता को समझाया जा सके. जनता तो दूर की बात है, उन्होंने मीडिया तक को आश्वस्त करना जरूरी नहीं समझा. पार्षदों की खरीद-फरोख्त होने के आरोप लग रहे हैं. उसे कैसे रोका जाएगा? उसका क्या जवाब है इनके पास?’

खरीद-फरोख्त की संभावनाओं को खारिज करते हुए नितिन शैलेष कहते हैं, ‘खरीद-फरोख्त और सत्ता का दुरुपयोग करने वाली तो भाजपा है. अंतागढ़ विधानसभा सीट पर हुआ उपचुनाव इसका उदाहरण है.’

बता दें कि 2014 में छ्त्तीसगढ़ की अंतागढ़ विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था जहां ऐन वक्त पर कांग्रेसी उम्मीदवार ने अपना नाम वापस ले लिया था. बाद में इस चुनावों में खरीद- फरोख्त सामने आई थी.

बहरहाल छत्तीसगढ़ भाजपा प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव का कहना है, ‘राज्य में कांग्रेस का एक आंतरिक सर्वे आया है कि शहरी क्षेत्रों में इन्होंने विकास कार्य नहीं किए हैं. इसलिए इन्हें शहरी क्षेत्रों में हार का डर है.’

Bardhaman: A voter gets her finger marked with indelible ink before casting vote at a polling station, during the 4th phase of Lok Sabha elections, in Bardhaman, Monday, April 29, 2019. (PTI Photo)(PTI4_29_2019_000107B)

फोटो: पीटीआई

मध्य प्रदेश के संदर्भ में कुछ ऐसा ही राज्य के वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित सोचते हैं. वे कहते हैं, ‘यह बात सही है कि प्रत्यक्ष चुनावों में हवा अभी भाजपा के पक्ष में ही है. जब 1998 में कांग्रेस ने प्रत्यक्ष चुनावों का नियम लागू किया था, तब चौतरफा उसकी हवा थी. कांग्रेस आश्वस्त रहती थी कि सीधे चुनावों में भी हम ज्यादा से ज्यादा महापौर/अध्यक्ष बना लेंगे. ऐसा हुआ भी था. अब हालात बदल गए हैं. लोकसभा के चुनाव, यहां तक कि विधानसभा के चुनावों में भी कांग्रेस शहरी क्षेत्रों में पिछड़ी थी. और नगर निगम तो सारे शहरी क्षेत्र ही हैं. तो वहां पर तो स्वाभाविक है कि भाजपा को लाभ है, कांग्रेस यह बात समझ रही है.’

वे आगे कहते हैं, ‘अभी भी सभी 16 निगमों में भाजपा के ही महापौर हैं. अधिकांश नगर पालिका और नगर पंचायतों में भी भाजपा के ही अध्यक्ष हैं. प्रत्यक्ष चुनावों में ज्यादातर निकायों में भाजपा के ही महापौर और अध्यक्ष चुने जा सकते थे. लेकिन अब अप्रत्यक्ष चुनाव में पार्षदों की खरीद-फरोख्त करना आसान होगा.’

गिरिजा शंकर भी इससे इत्तेफाक रखते हुए कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए सब बदल गया. तब तो कहकर बच गये कि केंद्र का चुनाव था. लेकिन अब अगर नगर निकाय, मंडी, पंचायत कोई भी छोटा या बड़ा चुनाव हारेंगे तो सरकारों की लोकप्रियता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा. इसलिए अब वे कोई चुनावी जोखिम लेना नहीं चाहते. लोकसभा की तरह अगर भाजपा यहां भी स्वीप कर जाती तो कांग्रेस के लिए एक नैतिक संकट खड़ा हो जाएगा. बस इसी जोखिम को टालने की कोशिश में कांग्रेस है.’

वहीं, राकेश कहते हैं, ‘यह बात भी सही है कि 1998 से जो अनुभव हैं, उनमें सीधे चयनित होने वाला महापौर/अध्यक्ष पार्षदों की सुनता नहीं है. उसका कहना होता है कि जनता ने चुना है, जो करना चाहो, कर लो. यह कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही पार्षदों की सामान्य शिकायतें रही हैं.’

कांग्रेस को इससे लाभ होगा या नहीं, विशेषज्ञों में इस बात को लेकर संशय है. विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस जुआ खेल रही है जो तभी सफल होगा जब जनता उसके पार्षद उम्मीदवारों पर भरोसा दिखाए. अगर भाजपा के पक्ष में लोकसभा चुनाव जैसे एकतरफा नतीजे आ गए तो कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं लगेगा.

बहरहाल, रवि सक्सेना चुनावों से डरने वाली बात से इनकार करते हैं. उनका कहना है, ‘अभी इतनी जगह लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हुए तो क्या कांग्रेस चुनावों से भाग गई? हम लड़े और कई चुनाव जीते भी हैं. यह भाजपा का कुतर्क है, इसमें कोई तथ्य नहीं है.’

हालांकि, तथ्य तो यह है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस इस संशोधन अध्यादेश के साथ-साथ पार्षदों के चुनाव भी गैरदलीय व्यवस्था पर कराने की इच्छुक थी. जहां जनता निर्दलीय पार्षदों को चुनती और जीतने के बाद वे पार्षद अपना-अपना दल चुन लेते. इस संबंध में उसकी पूरी तैयारी भी हो गई थी. भाजपा ने इसके खिलाफ हर स्तर पर मोर्चा खोल दिया था.

लेकिन अंत समय में पार्टी के अंदर से ही इस पर विरोध दर्ज कराया गया तो इस प्रस्ताव को वापस ले लिया गया था. इसीलिए इस बात को बल मिल रहा है कि एक पार्टी के तौर पर कांग्रेस जनता का सामना करने से डर रही है.

राजस्थान का उदाहरण इस बात की तस्दीक भी करता है, जहां पहले तो उसने विधानसभा के घोषणा पत्र पर अमल करते हुए प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव की घोषणा कर दी, फिर लोकसभा चुनाव के बाद खुद ही उस फैसले को पलट दिया.

छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसा ही हुआ. इस संबंध में संजय श्रीवास्तव बताते हैं, ‘चुनावी प्रक्रिया लगभग प्रारंभ हो गई थी. सीटों का परिसीमन भी हो गया था. सीटों पर महापौर, अध्यक्ष पद के आरक्षण भी तय हो गये थे, फिर अचानक सरकार कहती है कि अप्रत्यक्ष चुनाव करेंगे. सीधा सा अर्थ है कि हार का डर है.’

वहीं, राजस्थान में भाजपा अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराए जाने का विरोध तो नहीं कर रही है क्योंकि वह खुद इसी प्रणाली से चुनाव कराती आई थी, लेकिन उसका विरोध इस बात को लेकर है कि कांग्रेस क्यों बार-बार अपने फैसले बदल रही है?

राजस्थान भाजपा प्रवक्ता लक्ष्मीकांत भारद्वाज कहते हैं, ‘हमें कोई आपत्ति नहीं है. हम भी अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही करा रहे थे. सरकार में आने के बाद इन्होंने ही उसे बदलकर प्रत्यक्ष कराने का संशोधन किया. अब हार सामने दिखी तो लौट के बुद्धू घर को आए.’

बहरहाल, छत्तीसगढ़ सरकार ने एक और फैसला लिया है कि निकाय चुनाव अब ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से कराए जाएंगे. रवि सक्सेना दावा करते हैं कि मध्य प्रदेश सरकार भी ऐसा करने जा रही है और प्रक्रिया शुरू कर दी है.

इस पर संजय श्रीवास्तव कहते हैं, ‘इन राज्यों में ईवीएम से ही इनकी सरकार बनी, बावजूद इसके बैलेट पेपर ला रहे हैं तो स्पष्ट है कि हार के डर से धांधली की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)