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सांप्रदायिक दंगों में बिहार अव्वल क्यों है?

एक साल की देरी से जारी किए गए एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 में देश में दंगों की कुल 58,729 वारदातें दर्ज की गईं. इनमें से 11,698 दंगे बिहार में हुए. वर्ष 2017 में ही देश में कुल 723 सांप्रदायिक/धार्मिक दंगे हुए. इनमें से अकेले बिहार में 163 वारदातें हुईं, जो किसी भी सूबे से ज़्यादा है.

Patna: Bihar Chief Minister Nitish Kumar speaks during the International Conference on Crop Residue Management in Patna, Monday, Oct. 14, 2019. (PTI Photo)(PTI10_14_2019_000064B)

नीतीश कुमार. (फोटो: पीटीआई)

इसी साल एक टीवी कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि उनके कार्यकाल में सूबे में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़े न केवल उनके दावे को खारिज कर रहे हैं, बल्कि आंकड़ों से ये भी पता चलता है कि इस मामले में बिहार अव्वल है.

लगभग एक साल की देरी से जारी किए गए एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 में देशभर में दंगों की कुल 58,729 वारदातें दर्ज की गई. इनमें से 11,698 दंगे बिहार में हुए.

इस बार एनसीआरबी की रिपोर्ट में सांप्रदायिक/धार्मिक दंगों के लिए अलग कॉलम बनाया गया है और इन्हें सामान्य दंगों से अलग रखा गया है.

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017 में देश में कुल 723 सांप्रदायिक/धार्मिक दंगे हुए. इनमें से केवल बिहार में सांप्रदायिक/धार्मिक दंगों की 163 वारदातें हुईं, जो देश के किसी भी सूबे से ज्यादा है. इन दंगों से 214 लोग प्रभावित हुए.

सांप्रदायिक/धार्मिक दंगों के मामले में दूसरे स्थान पर कर्नाटक, तीसरे स्थान पर ओडिशा, चौथे स्थान पर महाराष्ट्र और चौथे स्थान पर झारखंड है. कर्नाटक में सांप्रदायिक/धार्मिक हिंसा की 92 घटनाएं, ओडिशा में 91, महाराष्ट्र में 71 दर्ज की गईं. उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक/धार्मिक दंगों की 34 घटनाएं हुई हैं.

दिलचस्प बात ये है कि वर्ष 2016 के मुकाबले अन्य राज्यों में इस तरह की वारदातें कम हुई हैं.

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016 में सांप्रदायिक हिंसा के मामले हरियाणा अव्वल था. वहां सांप्रदायिक हिंसा की 250 घटनाएं हुई थीं. लेकिन, इसमें काफी कमी आई है. वर्ष 2017 में हरियाणा में सांप्रदायिक हिंसा की महज 25 घटनाएं हुईं. इसी तरह झारखंड में 2016 में सांप्रदायिक हिंसा की 176 वारदातें दर्ज की गई थीं, जो वर्ष 2017 में घट कर 66 पर आ गईं.

लेकिन, इसके उलट बिहार में इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं. वर्ष 2016 में बिहार में सांप्रदायिक हिंसा की 139 घटनाएं हुई थीं, जो वर्ष 2017 के मुकाबले 24 कम थी.

2016 से पूर्व के वर्षों में भी बिहार में सांप्रदायिक हिंसा कम हुई थी. 27 नवंबर 2012 को लोकसभा में इसे लेकर पूछे गए सवालों के जवाब में गृह मंत्रालय की तरफ से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2009 और 2010 में बिहार में सांप्रदायिक हिंसा की 40-40 घटनाएं दर्ज हुई थीं. वहीं, वर्ष 2011 में सांप्रदायिक हिंसा की 26 घटनाएं हुई थीं.

वर्ष 2012 में भी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में गिरावट आई थी. आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2012 में बिहार में सांप्रदायिक हिंसा की 21 वारदातें हुई थीं, जिनमें तीन लोगों की मौत हो गई थी.

हालांकि वर्ष 2013 में सांप्रदायिक हिंसा में बढ़ोतरी हुई थी. आंकडे़ बताते हैं कि उस साल सांप्रदायिक हिंसा की 63 घटनाएं हुई थीं.

जानकारों का कहना है कि हाल के वर्षों में बिहार में धार्मिक उग्रता में इजाफा देखा जा रहा है. धार्मिक कार्यक्रमों में खुलेआम भड़काऊ गाने बजाए जाते हैं और आपत्तिजनक नारे लगते हैं. जिनका हश्र दो समुदायों के बीच तनाव और हिंसा के रूप में सामने आ रहा है. एनसीआरबी के आंकड़े इसी ट्रेंड की तस्दीक करते हैं.

उल्लेखनीय है कि पिछले साल ही रामनवमी के वक्त बिहार के आधा दर्जन जिलों में सांप्रदायिक दंगे हो गए थे और दंगों का ट्रेंड कमोबेश एक-सा था. एक जुलूस निकलता है… भड़काऊ गाने बजते हैं… एक अफवाह उड़ती है और फिर भीड़ बेकाबू होकर तोड़फोड़-रोड़ेबाजी शुरू कर देती है.

पिछले साल दुर्गा पूजा में मूर्ति विसर्जन के जुलूस के दौरान सीतामढ़ी शहर में दंगा हो गया था, जिसमें एक मुस्लिम बुजुर्ग की हत्या कर दी गई थी. इस दंगे को लेकर मौके पर तैनात पुलिस पदाधिकारियों ने अपने लिखित बयान में इस बात का जिक्र किया था कि जुलूस में शामिल लोग बेहद आपत्तिजनक नारे लगा रहे थे.

सीतामढ़ी में हुई वारदात के संबंध में जिले के डुमरा प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी मुकेश कुमार ने अपने बयान में लिखा था, ‘मेरे और थानाध्यक्ष (सीतामढ़ी) द्वारा हनुमान जी का मूर्ति का निरीक्षण किया गया. पंचमुखी हनुमान जी की प्रतिमा के दोनों दाहिने हाथों पर गरदा (धूल) जैसा निशान बना हुआ था, जबकि दोनों बाएं हाथ सुरक्षित थे.’

उन्होंने अपने बयान में लिखा था कि मूर्ति तोड़ने की अफवाह के बाद भीड़ से एक आदमी माइक लेकर चिल्लाने लगा, ‘ऐ! हिंदू के बच्चों, तुम मउगा हो गए हो. प्रतिमा का हाथ टूट गया है और तुम लोग चुपचाप हो, इसका बदला लो. एक-एक मियां को काट दो, मस्जिद को तोड़ दो.’

बीते 10 अक्टूबर को पटना से सटे जहानाबाद शहर में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के वक्त जबरदस्त हिंसा हुई थी. एक से दो व्यक्तियों की मौत हुई. कई धार्मिक स्थलों में तोड़फोड़ की गई थी और तीन दर्जन दुकानें लूट ली गई थीं. हालात इतने नाजुक हो गए थे कि पूरे शहर में कई दिनों तक कर्फ्यू लगी रही और कुछ दिन के लिए इंटरनेट सेवा भी बंद करनी पड़ी थी.

डेढ़ सप्ताह तक जहानाबाद शहर में धारा 144 लागू रही. अब हालात पटरी लौटने जरूर लगे हैं, लेकिन लोगों के जेहन में खौफ अब भी तारी है.

जहानाबाद की हिंसा भी मूर्ति पर पथराव कर उसे क्षतिग्रस्त करने की अफवाह से शुरू हुई थी और देखते ही देखते पूरा शहर जलने लगा. घटनास्थल से आधा किलोमीटर दूर स्थित इलाकों में भी उत्पाती भीड़ ने तोड़फोड़ मचाई थी.

बताया जाता है कि 10 अक्टूबर की सुबह दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के लिए जा रही थी. शहर की कच्ची मस्जिद के पास मूर्ति रोक दी गई थी. उसी वक्त यह अफवाह उड़ी कि मूर्ति पर पत्थरबाजी हुई है, जिससे मूर्ति क्षतिग्रस्त हो गई है.

इसके बाद कुछ लोगों भीड़ चींखती हुई मस्जिद और दुकानों को निशाना बनाने लगी. यह वारदात सुबह 6 बजे के आसपास हुई थी, लेकिन उस वक्त थमी नहीं बल्कि 9 से 11 बजे के बीच अलग-अलग इलाकों में दुकानों को निशाना बनाया गया.

जहानाबाद टाउन थाने के प्रभारी सतेंद्र कुमार साही ने पत्थरबाजी और मूर्ति टूटने की घटना से पूरी तरह इनकार किया और कहा, ‘न मूर्ति पर पत्थर फेंका गया था और न ही मूर्ति टूटी थी.’

इस हिंसा में जिन दुकानदारों की दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया है, वे सभी गरीब तबके से हैं. घटना के बाद उनके घरों का चूल्हा मुश्किल से जल पा रहा है.

कच्ची मस्जिद से थोड़ी दूर पचमहला में शमीम अहमद की टेलरिंग की दुकान थी. दंगाइयों ने दुकान तोड़ कर सामान लूट लिया और दुकान को आग के हवाले कर दिया. शमीम अभी तक दुकान शुरू नहीं कर पाए हैं.

वे कहते हैं, ‘12 दिन से दुकान बंद है. दुकान में कुछ भी नहीं छोड़ा गया है कि उसे खोला जाए. दुकान दोबारा चालू करने के लिए सब कुछ खरीदना होगा. उतनी पूंजी नहीं है कि डेढ़-दो लाख लगा दूं. 12 दिन से घर में बैठा हुआ हूं. कर्ज लेकर चूल्हा जल रहा है.’

जानकार बिहार में दंगे की घटनाओं में इजाफे के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व अन्य संगठनों के उभार को जिम्मेदार मानते हैं.

पटना के डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘हाल के वर्षों में जिस तरह से धार्मिक कार्यक्रमों में आक्रामकता बढ़ी है. पिछली रामनवमी में पटना में नंगी तलवारें लेकर रामनवमी का जुलूस निकली ना था. इससे साफ है कि भाजपा अब पहले जैसी नहीं है. वह बिहार में खुद को मजबूत कर रही है और दंगे, दो समुदायों में तनाव से उसे मजबूती मिलती है.’

गौरतलब हो कि इस साल 18 मई को राज्य पुलिस के स्पेशल ब्रांच के एसपी ने बिहार के सभी जिलों के डीएसपी को आरएसएस समेत 18 हिंदुत्ववादी संगठनों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने को कहा था.

इस पत्र में आरएसएस के साथ ही उससे जुड़े बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण समिति, धर्म जागरण समन्यव समिति, हिंदू राष्ट्र सेना, राष्ट्रीय सेविका समिति, शिक्षा भारती, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, दुर्गा वाहिनी, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय रेल संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, अखिल भारतीय शिक्षक महासंघ, हिंदू महासभा, हिंदू युवा वाहिनी और हिंदू पुत्र संघ का जिक्र किया गया था.

एसपी ने इस आदेश को गंभीरता से लेते हुए तत्वरित कार्रवाई करने को कहा था. इन संगठनों के बारे पुलिस इसलिए भी जानकारी जुटा रही थी, क्योंकि कई दंगों में इन संगठनों की संलिप्तता सामने आई थी.

बिहार में सांप्रदायिक दंगों को लेकर राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्विटर पर लिखा है, ‘बिहार के कथावाचक सीएम को हार्दिक बधाई. उनके अथक पलटीमार प्रयासों से देशभर में बिहार को दंगों में प्रथम स्थान मिला है. मर्डर में द्वितीय, हिंसक अपराधों में द्वितीय और दलितों के विरुद्ध अपराध में भी बिहार अग्रणी रूप से द्वितीय स्थान पर है. 15 वर्ष से गृह विभाग उन्हीं के जिम्मे है.’

लेकिन, हैरान करने वाले आंकड़ों के बावजूद बिहार सरकार इसको लेकर चिंतित नहीं है. भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. प्रेम कुमार से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘बिहार में सबकुछ ठीक है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)