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क्यों कुपोषण के ख़िलाफ़ लड़ रहे ग्रोथ मॉनिटर्स अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं?

कुपोषण के लिए कुख्यात मध्य प्रदेश का श्योपुर राज्य का एकमात्र जिला है, जहां कुपोषण पर काबू पाने के लिए पुरुष ग्रोथ मॉनिटर्स नियुक्त किए गए हैं. लेकिन कुपोषित बच्चों के पोषण की ज़िम्मेदारी संभाल रहे इन ग्रोथ मॉनिटर्स के लिए अपनी रोज़ी-रोटी चलाना मुश्किल हो रहा है.

Sheopur Growth Monitor Photo Deepak Goswami copy

श्योपुर जिले के विजयपुर में बना पोषण पुनर्वास केंद्र.

डेढ़ वर्षीय अजीत आदिवासी जब पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) पहुंचाया गया तो वह हड्डियों का ढांचा था. अतिगंभीर कुपोषण की श्रेणी वाले अजीत को एनआरसी पहुंचाने वाले अरविंद गौड़ थे. अरविंद श्योपुर जिले की विजयपुर तहसील के इकलौद सेक्टर में महिला एवं बाल विकास विभाग (डब्ल्यूसीडब्ल्यू) के अंतर्गत ग्रोथ मॉनिटर के पद पर तैनात हैं.

अरविंद जैसे ही 20 ग्रोथ मॉनिटर पूरे श्योपुर जिले में तैनात हैं जिनका काम है कुपोषित बच्चों की पहचान करके उन्हें एनआरसी में पहुंचाना, कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य सुधार पर नजर रखना, कुपोषण प्रभावित श्योपुर जिले में इस संबंध में प्रदान की जा रही सरकारी सेवाओं की निगरानी और उनकी हितग्राहियों तक पहुंच सुनिश्चित करना.

लेकिन, कुपोषित बच्चों के पोषण की व्यवस्था करने वाले इन ग्रोथ मॉनिटर्स के लिए आज अपने ही परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो रहा है.

वर्ष 2016 के सितंबर माह में कुपोषण के लिए कुख्यात मध्य प्रदेश के श्योपुर में कुपोषण 116 मासूमों को लील गया था. देश भर में सुर्खियों में रहे इस मामले के बाद शासन- प्रशासन जागा और कुपोषण की रोकथाम के लिए मंथन शुरू किया.

इसी को ध्यान में रखते हुए अगले वर्ष सितंबर आने से पहले ही अगस्त 2017 में राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग ने जिला प्रशासन की अनुशंसा पर एक नवीन पहल की.

इस पहल के तहत श्योपुर के कुपोषण प्रभावित आदिवासी इलाकों में पुरुष पर्यवेक्षकों, जिन्हें ‘ग्रोथ मॉनिटर’ नाम दिया गया, की नियुक्ति की. अब तक कुपोषण की जमीनी लड़ाई और कुपोषित बच्चों की पहचान करके उन्हें एनआरसी तक पहुंचाने का जिम्मा महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर था, जिनके कामकाज पर एक महिला सुपरवाइजर ही नजर रखती थीं.

लेकिन, जंगलों में बसे दूरदराज के उन गांवों में जहां सड़कें तक न हों और कोई यातायात सुविधा तक उपलब्ध न हो, वहां उन्हें जाने में समस्याएं आती थीं. मसला सुरक्षा का भी होता था. इसी के चलते कई बार ऐसे इलाकों के कुपोषित बच्चे उनसे छूट जाते थे.

इसी चुनौती से पार पाने के लिए कुपोषण की भयावहता के आधार पर जिले को तीन हिस्सों में बांटते हुए कुल 23 ग्रोथ मॉनिटर के पद स्वीकृत किए गए. इन पदों पर युवाओं को तरजीह दी गई और 20 पदों पर तत्काल नियुक्ति भी हो गई.

इन सभी ग्रोथ मॉनिटर को 11 महीने के अनुबंध पर रखा गया, जिसे साल 2018 में फिर से एक साल के लिए बढ़ा दिया गया. इस तरह श्योपुर प्रदेश का एकमात्र जिला बना, जहां ग्रोथ मॉनिटर्स नियुक्त किए गए.

31 मई 2019 को इनके अनुबंध के दो साल पूरे हुए, लेकिन इस बार अनुबंध बढ़ाया नहीं गया. वो भी तब जब स्वयं डब्ल्यूसीडब्ल्यू के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) द्वारा जारी की गई एक प्रगति रिपोर्ट बताती है कि ग्रोथ मॉनिटर की तैनाती वाले इन दो सालों में जिले में कुपोषण की स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ था.

लेकिन,  डेढ़ माह बाद ही जुलाई माह में जब कुपोषण से मौतों का सिलसिला फिर से शुरु हुआ तो विभाग ने सभी ग्रोथ मॉनिटर के साथ फिर से अनुबंध कर लिया. लेकिन इस बार यह अनुबंध केवल आठ माह का है जो कि मार्च 2020 में खत्म हो जाएगा.

साथ ही, नये अनुबंध में ग्रोथ मॉनिटर को मिलने वाले वेतन में भी कटौती की गई है, जिसके चलते उनके सामने मार्च 2020 के बाद रोजगार का संकट तो है ही, साथ ही साथ वेतन में की गई कटौती से भी वे खफा हैं.

वे दावा करते हैं कि उन्हें श्रम कानून के तहत मिलने वाला न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है जबकि उन्होंने अपने काम के जरिये सकारात्मक परिणाम दिए हैं. यही कारण है कि अब उनके बीच विरोध के स्वर फूटने लगे हैं.

जिले के कराहल विकासखंड स्थित सलापुरा सेक्टर में तैनात ग्रोथ मॉनिटर महफूज खान कहते हैं, ‘कुपोषण के हालातों को लेकर सरकार गंभीर ही नहीं है. श्योपुर सहरिया आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है. हमारी नियुक्ति इस समुदाय में कुपोषण की समस्या को देखते हुए निगरानी करने के उद्देश्य के साथ की गई थी. अब ऐसा तो है नहीं कि श्योपुर में कुपोषण खत्म हो गया है या सहरिया समुदाय यहां से पलायन करके कहीं ओर चला गया है. दोनों ही यहां मौजूद हैं. इसके बावजूद भी हम पर हटाए जाने का संकट मंडरा रहा है.’

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कुपोषित बच्चों के परिजनों के साथ ग्रोथ मॉनिटर्स.

अखिलेश तोमर विजयपुर विकासखंड के अगरा सेक्टर में ग्रोथ मॉनिटर हैं. वे कहते हैं, ‘किसी पद को तब खत्म किया जाता है जब या तो वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल न हो या फिर तय लक्ष्यों की प्राप्ति हो गई हो. लेकिन हमारे मामले में दोनों ही बातें नहीं है. श्योपुर में कुपोषण समाप्ति का लक्ष्य अभी बहुत दूर है. तभी तो हमारे हटाए जाने के बाद जुलाई माह में दर्जनभर से अधिक मौतें हुई थीं. वहीं, जिस उद्देश्य से हमारी नियुक्ति हुई थी, हमने नतीजे भी बेहतर दिए. जिसकी पुष्टि स्वयं विभाग करता है. फिर क्यों हमें हटाकर न सिर्फ कुपोषण की मुहिम को कमजोर करके कुपोषित बच्चों की जान को संकट में डाला जा रहा है, बल्कि हमारा भी रोजगार छीना जा रहा है.’

ग्रोथ मॉनिटर के कामकाज के संबंध में 14 जून 2019 को महिला एवं बाल विकास विभाग के श्योपुर जिला कार्यक्रम अधिकारी ने ‘पुरुष ग्रोथ मॉनिटर द्वारा की गई प्रगति की जानकारी’ नामक एक रिपोर्ट जारी की थी. यह रिपोर्ट भी अखिलेश के दावों की पुष्टि करती है.

उक्त रिपोर्ट के मुताबिक, जिले को कुपोषण की भयावहता के आधार पर तीन परियोजनाओं (विजयपुर 1, विजयपुर 2 और कराहल) में विभाजित किया गया था. तीनों में क्रमश: चार, पांच और 11 यानी कुल 20 ग्रोथ मॉनिटर तैनात किए गए थे.

अगस्त 2017 में उनकी नियुक्ति हुई थी और मई 2019 तक उनसे काम कराया गया. उसके बाद अनुबंध रोक दिया था. इस दौरान कुल 1,890 बच्चे एनआरसी में भर्ती कराए गए.

रिपोर्ट में दर्ज है कि उनकी नियुक्ति से पहले दिसंबर 2016 की स्थिति में इन तीनों परियोजना में अति कम वजन के कुल बच्चों की संख्या 2,755 थी जो नियुक्ति के बाद मार्च 2019 की स्थिति में 1,705 रह गई. यानी 1,050 बच्चों को इस दौरान कुपोषण से पोषण की श्रेणी में लाया जाना संभव हो सका.

इन्हीं परिणामों का नतीजा था कि कई ग्रोथ मॉनिटर्स को जिला कलेक्टर ने कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रशस्ति-पत्र से भी सम्मानित किया था.

अखिलेश बताते हैं, ‘इस दौरान तीनों परियोजनाओं की ग्रेडिंग में भी सुधार हुआ. हमारे आने से पहले विजयपुर 1, विजयपुर 2 और कराहल परियोजनाओं की ग्रेडिंग प्रदेश में क्रमश: 428, 432 और 356 हुआ करती थी जो हमारे आने के बाद 30, 28 और 230 पर आ गई. वहीं, श्योपुर जिले की ग्रेडिंग 50 से खिसककर 9 पर आ गई.’

वे आगे कहते हैं, ‘इन सुखद नतीजों के बाद भी पहले तो हमारा अनुबंध समाप्त कर दिया लेकिन दोबारा भी किया तो वेतन कम कर दिया. पिछले अनुबंध में हमें 10,000 रुपये मासिक मिलते थे. साथ में ट्रैवलिंग अलाउंस (टीए) के तौर पर 2,500 रुपये भी मिलते थे, लेकिन नये अनुबंध में इसे समाप्त कर दिया गया.’

विजयपुर के अगरा ‘बी’ सेक्टर में तैनात मारुतिनंदन अवस्थी कहते हैं, ‘एक सेक्टर में कम से कम करीब 25 आंगनबाड़ी होती हैं. चूंकि हमारी नियुक्ति ही जंगलों और दूर-दराज के गांवों में विभाग की सेवाएं पहुंचाने के लिए हुई थी इसलिए हमारा मूल कार्य भ्रमण ही है. इसमें रोज का औसतन 150 रुपये पेट्रोल में खर्च हो जाता है. इस तरह महीने में 20-25 दिन काम करने में तीन से चार हजार रुपये तो पेट्रोल में ही खर्च हो जाते हैं. परिवार में बीवी- बच्चे और माता-पिता हैं, छह हजार रुपये में कैसे परिवार का भरण-पोषण होगा?’

वे आगे कहते हैं, ‘ऊपर से मेरे पास तो एक नहीं, दो-दो सेक्टर हैं. मौखिक तौर पर यहां का सहरसा सेक्टर भी मुझे संभालने कह दिया गया है. पहले 2,500 रुपये टीए मिलता था तो समस्या नहीं होती थी. लेकिन अब… ’ कहते- कहते वे बीच में रुक जाते हैं, फिर कहते हैं, ‘… उम्र 36 साल हो गई है, अब तो कहीं और नौकरी भी नहीं मिलेगी.’

कराहल विकासखंड के गोरस सेक्टर में तैनात विनोद आर्य के परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं. उनकी उम्र भी 30 साल से अधिक हैं.

वे कहते हैं, ‘छह हजार में ही परिवार चलाना है. पेट्रोल के अलावा इलाके की सड़कें भी ऐसी हैं कि बाइक में खूब मेन्टेनेंस निकलता है. लेकिन बेरोजगारी के चलते नौकरी कर रहे हैं. जितना मिलता है, उससे ही पेट भर रहे हैं. लेकिन अब वो नौकरी भी मार्च में छिन जाएगी.’

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दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में सड़कें न होने की स्थिति में ग्रोथ मॉनिटर्स को वहां पहुंचने में खासी मुश्किल पेश आती है.

कुछ ऐसा ही विजयपुर के टर्राकलां सेक्टर में तैनात विवेक परिहार का कहना है. वे 32 साल के हैं. उनके सेक्टर में तो 37 आंगनबाड़ी हैं.

वे कहते हैं, ‘श्योपुर में कोई फैक्ट्री या कंपनी नहीं है इसलिए पेट भरने के लिए यहां जुड़े. एक तो सरकारी काम था, ऊपर से जब से पैदा हुए हैं, यहां कुपोषण कायम है. तो सोचा कि हमें लंबे समय का रोजगार मिल जाएगा. इसलिए जुटकर मेहनत की. शुरुआत में मेहनत का नतीजा भी मिला. हमारा शुरुआती अनुबंध दस हजार पर था. दूसरे अनुबंध में टीए के 2,500 रुपये बढ़ा दिए गये. लेकिन, फिर तीसरा अनुबंध ही नहीं किया. जब मजबूरी में किया भी तो आठ माह का और साथ ही कह दिया कि मार्च के बाद अब हम कोई और काम देख लें.’

अखिलेश कहते हैं, ‘अच्छा काम करने पर हमेशा वेतन और सेवाओं में वृद्धि की जाती है लेकिन हमारे साथ उल्टा है. वेतन भी कम कर दिया और सेवा से भी हटा रहे हैं.’

उनका कहना है कि श्रम कानून के मुताबिक हम सब डिप्लोमा-डिग्री होल्डर हैं जिससे कि उच्च कुशल श्रमिक की श्रेणी में आते हैं, जिसके तहत हमारा न्यूनतम वेतन 11,485 रुपये मासिक होना चाहिए. लेकिन, अजीब विडंबना है कि एक सरकारी विभाग ही दूसरे विभाग के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहा है. हमारी भविष्य निधि काटने तक का प्रावधान नहीं रखा है जो नियमानुसार जरूरी है.

साथ ही वे कहते हैं, ‘अक्सर परिजन अपने बच्चों को एनआरसी ले जाने के एवज में अपने अन्य बच्चों के लिए टॉफी-बिस्किट के पैसे मांगते हैं, तो हमें अपनी जेब से देने पड़ते हैं. नहीं देते तो वे एनआरसी नहीं जाते. उस स्थिति में यदि बच्चों को कुछ हो जाए तो अधिकारी हमें कठघरे में खड़ा करते हैं. अब इतने कम वेतन में हम भ्रमण पर भी जाएं, कुपोषित बच्चों के परिजनों को भी पैसे दें और अपना परिवार भी चलाएं. क्या संभव है?’

इस संबंध में हमारी श्योपुर डीपीओ ओमप्रकाश पांडे से चर्चा हुई. उनका कहना है कि वे ग्रोथ मॉनिटर का टीए बढ़ाने के संबंध में विभागीय आयुक्त को पत्र भेज चुके हैं. साथ ही वे कहते हैं, ‘ग्रोथ मॉनिटर्स को न्यूनतम वेतन के संबंध में अनुबंध के समय ही आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी. वे हमें तब नियम बताते, तो हम उतना कर देते.’

जिस पत्र की बात डीपीओ ने की, वह अगस्त 2019 में आयुक्त को लिखा गया था लेकिन आज तक की स्थिति में उस पर कोई भी कार्रवाई नहीं हुई है. ग्रोथ मॉनिटर्स को हटाए जाने की पूरी कवायद का एक राजनीतिक एंगल भी है.

ग्रोथ मॉनिटर्स की नियुक्ति जिस ‘अटल बाल आरोग्य पोषण मिशन’ के तहत हुई थी, वह प्रदेश की पूर्व भाजपा सरकार की योजना थी. महफूज खान कहते हैं, ‘अटल बाल मिशन का आखिरी साल वित्त वर्ष 2019-20 है. इसी के तहत हमारे लिए बजट जारी होता है. अब इस योजना को नई सरकार बंद कर रही है. अगर पुरानी सरकार होती तो यह आगे बढ़ जाता. नई सरकार को इसके नाम से दिक्कत है.’

डीपीओ पांडे भी ऐसा ही कहते हैं कि उनके हाथ में कुछ नहीं है, योजना का भविष्य सरकार के हाथ में है. अरविंद गौड़ के मुताबिक, विभाग इसलिए ग्रोथ मॉनिटर्स के समर्थन में नहीं है क्योंकि उनकी सीधी प्रतिद्वंदिता महिला सुपरवाइजर्स के साथ हो गई है.

वे कहते हैं, ‘सुपरवाइजर्स और हमारा काम लगभग समान ही है. इसलिए विभाग पहले से मौजूद सुपरवाइजर्स को ही रखना चाहता है. मार्च के बाद हम सौ फीसदी नहीं रहेंगे.’

बहरहाल, कराहल के दुधेरा सेक्टर में तैनात धीरज राठौड़ कहते हैं, ‘हम सब बेरोजगार तो हो ही जाएंगे, हमें रोजगार चाहिए, ये सच है. लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जैसे हालात अभी कराहल और विजयपुर में हैं, उन्हें अनदेखा न किया जाए. ऐसे दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में कुपोषण है, जहां हम तो पहुंच जाते हैं लेकिन कोई महिला सुपरवाइजर कैसे जाएगी? इस तरह तो कुपोषण की स्थिति फिर से और भयावह हो जाएगी.’

इस संबंध में श्योपुर कलेक्टर बसंत कुर्रे, डब्ल्यूसीडब्ल्यू आयुक्त एमबी ओझा और महिला एवं बाल विकास मंत्री से संपर्क साधने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)