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झारखंड: रांची का एक आदिवासी टोला, जहां राज्य बनने के 19 साल बाद भी ‘विकास’ नहीं पहुंचा

झारखंड राज्य के निर्माण को 19 साल हो गए हैं. रांची नगर निगम के वार्ड 50 में आने वाले नदी दीपा टोला के लोग एक अदद पुल के निर्माण के लिए पिछले कई सालों से सरकार से गुहार लगाते-लगाते थक चुके हैं.

रांची का नदी दीप टोले में बनी बांस की पुलिया. (सभी फोटो: मो. असगर खान)

रांची का नदी दीपा टोले में बनी बांस की पुलिया. (सभी फोटो: मो. असगर खान)

रांची: झारखंड में जल्द होने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दल नए-नए नारों संग चुनावी सभाएं कर रहे हैं. जनादेश, बदलाव, जनाक्रोश, संकल्प आदि जैसा नारा विपक्ष की सभाओं में है, तो ‘बदल रहा झारखंड’ का नारा भाजपा की रघुबर दास सरकार राज्य के विभिन्न जिलों के गांव, गली-मोहल्ले तक पहुंचाने में लगी है.

लेकिन यह नारा 19 साल पुराने झारखंड की राजधानी रांची में स्थित हाईकोर्ट से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक आदिवासी टोले की तस्वीर और वहां के लोगों की जिंदगी नहीं बदल पाया.

इस टोले का नाम ‘नदी दीपा’ है, जो रांची नगर निगम के वार्ड 50 में आता है.

यहां रहने वाले 22 वर्षीय छात्र दीपक लकड़ा को सरकार और स्थानीय विधायक से काफी शिकायत है, क्योंकि दस साल के गुहार और आग्रह के बाद भी टोले में एक छोटी सी पुलिया नहीं बन पाई है. यहां रहने वाले लोगों के लिए पुलिया का बन जाना ही सबसे बड़ा विकास होगा.

ये वो पुलिया है, जो 25 घरों वाले नदी दीपा टोले को शहर जाने वाली मुख्य सड़क से जोड़ती है.

दीपाक कहते हैं, ‘सरकार का नारा है कि झारखंड बदल रहा है. अब इस बांस की पुलिया को देखिए, जो चारों तरफ से टूटी हुई है. आप इस पर चल सकते हैं? बोलिए, नीचे गिरे तो 15 फीट दलदल में घुस जाइएगा.’

वे कहते हैं, ‘छोटे-छोटे बच्चे इसे रोज पार कर स्कूल कैसे जाते होंगे. हम लोगों को हर काम के लिए इसी पुलिया को पार कर शहर जाना पड़ता हैं. हर समय डर रहता है कि अगर गिरे तो गए. अब बोलिए, हमारी जिंदगी बदली है क्या.’

दीपक के मुताबिक, किसी की जान तो नहीं गई, लेकिन पुलिया से गिरने पर कई लोगों के पैर-हाथ जरूर टूटे हैं.

झारखंड बनने के 18 साल बाद टोले को मिली थी बिजली

टोलावालों के मुताबिक, उन्हें पिछले कई वर्षों से सुविधा के नाम पर सिर्फ आश्वासन दिया जा रहा है. राज्य के गठन यानी 19 साल में जो कुछ हुआ उसमें यहां के 7-8 घर में शौचालय, आधा दर्जन लोगों का पीएम आवास बना और टोले का इकलौता हैंड पंप लग पाया है. सड़क के नाम पर पगडंडी और 18 साल बाद गांव में बिजली पहुंच पाई है.

इस टोले से लगे छोटा घागरा और हुंडरू नाम की बस्तियां हैं. टोलेवालों के मुताबिक, इन दोनों बस्तियों के लोग भी बांस की इसी टूटी पुलिया के सहारे डोरंडा बाजार (हाईकोर्ट के नजदीक स्थित मोहल्ला) जाते हैं.

डोरंडा से टोले की दूरी लगभग दो किलोमीटर है, लेकिन यह तब है जब आप इस पुलिया होकर जाते हैं. पुलिया से न जाकर अगर आप एयरपोर्ट के रास्ते सफर तय करते हैं तो डोरंडा तक की दूरी लगभग आठ किलोमीटर हो जाती है.

दिक्कत तब होती है, जब कोई बीमार पड़ जाए और उसे गोद या कंधे पर उठाकर पुलिया पार कराना पड़ता है. टोलेवालों का कहना है कि इस पुलिया से रोजाना 250-300 लोग आवाजाही करते हैं.

यहां के लोग मजदूरी और खेती करके जीवनयापन करते हैं. टोले की सुशीला लिंडा और किरण कुजूर अपने-अपने पतियों के साथ दिहाड़ी मजदूरी करती हैं. दोनों ने सरकार से अधिक मीडिया के प्रति नाराजगी जाहिर की.

वे कहती हैं, ‘हमें अपनी चिंता नहीं है. बच्चे जब स्कूल जाते हैं तब डर लगता है. सुबह तो हम लोग उनको पुलिया पार करा देते हैं, लेकिन लौटते वक्त वे अकेले होते हैं. इस पर चलने के दौरान डर लगता है कि जाने कब टूट जाए.’

नदी दीप टोले में रहने वाले लच्छू कच्छप और दीपक लकड़ा.

नदी दीपा टोले में रहने वाले लच्छू कच्छप और दीपाक लकड़ा.

दोनों कहती हैं, ‘हर बार प्रेस से आप जैसे लोग आते हैं, फोटो खींचते हैं और पैसा बनाकर चले जाते हैं.’

टोले में सबसे बुजुर्ग 80 साल के लच्छू कच्छप हैं. दस साल पहले टोले के लोगों ने आपस में चंदा कर बांस बल्ली से पुलिया बनाई थी. तब से लेकर हर साल की जाने वाली मरम्मत में लच्छू कच्छप की अहम भूमिका रहती है.

वे बताते हैं, ‘हम लोग आपकी उम्र से ही पुलिस से आ-जा रहे हैं. उससे पहले पुलिया नहीं थी तो कीचड़ और दलदल में घुसकर पार करते थे. इधर कोई नेता नहीं आता था. 2014 में विधानसभा चुनाव के समय नवीन जायसवाल (वर्तमान विधायक) आकर बोले थे कि वोट दीजिए, जीतते ही पुल बनवा देंगे. वो पुल पर चढ़े भी थे, लेकिन इसके बाद इधर कोई नहीं आया.’

पार्षद ने कहा, हमसे ज़्यादा विधायक ज़िम्मेदार हैं

पुष्पा तिर्की आठ साल से इस इलाके की पार्षद हैं. कहती हैं, ‘मैं पुलिया बनवाने के लिए कई साल से प्रयास कर रही हूं. अभी भी लगी हूं. निगम में पुल-पुलिया का बजट नहीं होता है. हम लोगों को साल में 20-25 लाख ही फंड मिलता है. इसके लिए बड़ा फंड चाहिए. फिर भी निगम को हम कई आवेदन दिए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.’

वे कहती हैं, ‘हम कोशिश में लगे हुए हैं. इसके लिए ग्रामीण विकास योजना में भी आवेदन दिए हैं. विधायक नवीन जायसवाल से भी कहा था. दो साल पहले उन्होंने कहा था कि पुलिया बनवा देंगे, पर अब तक नहीं बनवाया.’

पुष्पा तिर्की कहती हैं कि इसके लिए वो अपने आपको जिम्मेदार तो मानती हैं, लेकिन वह खुद से कहीं अधिक स्थानीय विधायक को जिम्मेदार ठहराती हैं.

विधायक ने कहा- पुलिया का शिलान्यास हुआ, टोलेवालों ने बताया झूठ

नदी दीपाा टोला के पुलिया के बारे में नवीन जायसवाल का कहना है कि पुलिया बन रही है. शिलान्यास हो गया है.

वे कहते हैं, ‘आप पत्रकार हैं, जानकारी नहीं है कि टेंडर हो गया है. शिलान्यास के समय 200 लोग थे. पुल का काम बरसात में नहीं चालू होता है. आप जब ये रिपोर्ट ले रहे हैं तो वहां (टोला) जाकर भी जानकारी लीजिए. वहां पुल बनने की प्रक्रिया सरकार ने शुरू कर दी है. काम आवंटित हो गया है. पानी कम होगा, उसके बाद काम शुरू होगा.’

पुलिया बनने में देरी के सवाल पर उन्होंने कहा कि बाद में बात कीजिएगा.

वहीं, विधायक के इस दावे को टोले के लोग झूठ बताते हैं. दीपक लकड़ा कहते हैं, ‘यहां कोई शिलान्यास नहीं हुआ. यहां कोई आया ही नहीं है. वो (विधायक) ये बात कैसे कह सकते हैं. इसी हफ्ते हम लोग उनके पास पुलिया निर्माण के लिए गए थे. तब उन्होंने कहा था कि एक लिखित आवेदन दीजिए, तब आगे कुछ करेंगे.’

टोलेवालों के अनुसार, विधायक ने जिस पुलिया के निर्माण की बात कही, दरअसल वह बगल के कुसाई टोला में बनाई जा रही है. नदी दीपा टोला वाले इस बात को लेकर भी नाराज हैं और विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि वे इतने साल से गुहार लगा रहे हैं. उन्हें आश्वासन दिया गया और उनकी पुलिया बगल के कुसाई टोला को दे दी गई.

यही कहना पार्षद पुष्पा तिर्की का भी है. उन्होंने बताया, ‘नदी दीपा टोला की पुलिया का शिलान्यास नहीं हुआ. वहां निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है. बगल के कुसाई टोला में पुलिया बनाई जा रही है, जिसका शिलान्यास हुआ है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)