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अफ़शां अंजुम

An employee speaks on a mobile phone as she eats her lunch at the cafeteria in the Infosys campus in Bengaluru, India, September 23, 2014. REUTERS/Abhishek N. Chinnappa/File Photo

‘बॉयज़ लॉकर रूम’ के ताले खुलें, इसके लिए बात करना ज़रूरी है

इस दुनिया में बेटियों की परवरिश मुश्किल है, लेकिन उससे भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण बेटों की परवरिश करना है. देर-सवेर सामने आते लड़कों के सीक्रेट ग्रुप बताते हैं कि इसकी परतें हमारे समाज और परवरिश के बीच उलझी हुई हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

लॉकडाउन में बढ़ती घरेलू हिंसा: आपदा के समय महिलाओं के लिए एक और इम्तिहान

कोरोना संकट के दौरान देश-विदेश से महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती घरेलू हिंसा की ख़बरें आ रही हैं. कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच घर में बंद रहने के अलावा कोई चारा भी नहीं है. लेकिन अफ़सोस कि टीवी पर आ रहे निर्देशों में पारिवारिक हिंसा पर जागरूकता के संदेश नदारद हैं. महिलाओं पर पड़े कामकाज के बोझ को भी चुटकुलों में तब्दील किया जा चुका है.

Srinagar: Security personnel stands guard at a blocked road on the 33rd day of strike and restrictions imposed after the abrogration of Article of 370 and bifurcation of state, in Srinagar, Friday, Sept. 6, 2019. (PTI Photo) (PTI9_6_2019_000063A)

कश्मीर में केवल इंटरनेट नहीं, कश्मीरियों की ज़िंदगी के कई दरवाज़े बंद थे

बीते 5 मार्च को सात महीने के बाद जम्मू कश्मीर में इंटरनेट से प्रतिबंध हटाया गया है. एक तबके का मानना था कि यह बैन शांति प्रक्रिया के लिए अहम था, हालांकि स्थानीयों के मुताबिक़ यह प्रतिबंध मनोरंजन या सोशल मीडिया पर नहीं बल्कि आम जनता के जानने और बोलने पर था.

Indian security force personnel keep guard alongside a road during restrictions after the government scrapped the special constitutional status for Kashmir, in Srinagar August 15, 2019. REUTERS/Danish Ismail

370 का जश्न और सहमा हुआ कश्मीर

इस पूरे अध्याय ने कश्मीर की आवाज़ और बोलने का हक़ दोनों छीन लिया, लेकिन कहा गया कि कश्मीरी जनता खुश है. अजीत डोभाल को सबने चार कश्मीरियों के साथ खाना खाते तो देखा पर किसी को नहीं पता कि उन तस्वीरों में पीछे कितने सैनिक बंदूक ताने खड़े थे.