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एमके वेणु

8 अप्रैल को मुंबई के एक टीकाकरण केंद्र पर वैक्सीन ख़त्म होने के बाद खड़े लोग. (फोटो: पीटीआई)

केंद्र को वैक्सीन की कमी की ज़िम्मेदारी लेते हुए फ़ौरन प्रभावी कदम उठाना चाहिए

देश में बेहद तेज़ी से बढ़ रहे कोरोना संक्रमण के मामलों के मद्देनज़र अब तक वैक्सीन उत्पादन क्षमता को बढ़ा दिया जाना चाहिए था. ज़ाहिर है कि इस दिशा में केंद्र सरकार की प्लानिंग पूरी तरह फेल रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)

नरेंद्र मोदी के लिए राजनीतिक मुसीबत बन सकती है सरकारी संपत्तियों की थोक बिक्री

निजीकरण को लेकर सरकार को परेशान करने वाला सबसे मुश्किल सवाल यह है कि सरकारी संपत्तियों को किस क़ीमत पर बेचा जाना चाहिए.

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किसान आंदोलन: प्रधानमंत्री के संबोधन से प्रदर्शनकारी किसानों को हुई निराशा

वीडियो: केंद्र के नए कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आंदोलनजीवी’ बयान पर रोष जताते हुए कहा कि यह किसानों का अपमान है. आंदोलनों के कारण भारत को औपनिवेशिक शासन से आज़ादी मिली और उन्हें गर्व है कि वे ‘आंदोलनजीवी’ हैं.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर (फोटो: पीटीआई)

क्या 2021 का बजट भारत को विकास की पटरी पर वापस ला सकता है

सरकार उम्मीद कर रही है कि भौतिक ओर सामाजिक- दोनों की तरह के बुनियादी ढांचे पर उसके द्वारा किया जाने वाला बड़ा खर्च नई आय पैदा करेगा, जिससे ख़र्च भी बढ़ेगा. पूंजीगत ख़र्चे में इस बढ़ोतरी का लाभ 4-5 साल में दिखेगा, बशर्ते इसका अमल सही हो.

(फोटो साभार: विकीपीडिया)

टीआरपी विवाद: विश्वसनीयता खो चुका है बार्क, आमूलचूल बदलाव की दरकार

टीआरपी व्यवस्था को विश्वसनीय बनाने का काम अब बार्क के आसरे नहीं हो सकता. माना जा रहा है कि रिपब्लिक मामले के बाद बार्क एक निष्पक्ष भूमिका निभाने की स्थिति में है, लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि एनबीए के कुछ अन्य सदस्य जैसे इंडिया टुडे टीवी भी इस तंत्र के बेजा इस्तेमाल को लेकर जांच के दायरे में हैं.

(फोटोः रॉयटर्स)

प्रधानमंत्री मोदी को भारत को कमतर दिखाने वाले आंकड़ों पर ध्यान देने की ज़रूरत है

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान जताया था कि भारत की जीडीपी 2020 में -10.3 फीसदी रह सकती है जबकि उनके अनुमान के मुताबिक़ साल 2021 में प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में बांग्लादेश भारत को पीछे छोड़ देगा.

(फोटो: द वायर)

भारत टेक्नोलॉजी और डेटा कंपनियों के एकाधिकार के ख़तरे को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ नहीं कर सकेगा

अमेरिका में बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए एंटी-ट्रस्ट क़ानूनों में बड़े बदलाव किए गए हैं, लेकिन भारत में कॉम्पिटीशन कमीशन ने डेटा और डिजिटल कारोबार क्षेत्र में वर्चस्व के दुरुपयोग की बस संभावना जताई है. डिजिटल एकाधिकार के लिए कोई तय नियम न होने से ऐसी कोई घटना होने के बाद कार्रवाई करना कठिन हो सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण. (फाइल फोटो: पीटीआई)

जीएसटी गतिरोध: अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राज्यों की ओर से केंद्र को क़र्ज़ लेना चाहिए

भारतीय अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए फंड का का इंतज़ाम करना एक राष्ट्रीय समस्या है. ऐसे समय में, ख़ासकर जब देश की अर्थव्यवस्था बाकी कई देशों के मुक़ाबले अधिक ख़राब है, तब केंद्र और राज्यों का क़र्ज़ लेने को लेकर उलझना अनुचित है.

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टोयोटा और हार्ले: क्या भारत में टैक्स और संस्थागत मांग को लेकर समस्याएं हैं?

वर्तमान आर्थिक स्थिति में भारत वैश्विक कंपनियों के लिए एक कम आकर्षक बाज़ार बन रहा है, जिसके संरचनात्मक रूप से ठीक होने में समय लग सकता है. कई वैश्विक ब्रांड भारत में या तो बड़े पैमाने पर निवेश घटाना चाहते हैं या अर्थव्यवस्था को देखते हुए आगे विस्तार के लिए निवेश नहीं कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)

कृषि विधेयक और श्रम क़ानून में बदलाव: महामारी के बीच मोदी सरकार का विध्वंसकारी खेल

ऐसे समय में जब भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग तबाह हो चुकी है, तब सुधारों के नाम पर किसानों और कामगारों के बीच उनकी आय को लेकर आशंकाएं और मानसिक परेशानियां पैदा करना सही नहीं है.

(फोटो: पीटीआई)

भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के अनुमान क्या वास्तविक तस्वीर दिखा रहे हैं

मुख्य आर्थिक सलाहकार द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार होने के आशावादी अनुमानों का समर्थन न करते हुए आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने सतर्क किया है कि अर्थव्यवस्था में धीरे-धीरे सुधार होगा.

(फोटो: पीटीआई)

गर्त में जीडीपी: मोदी के ‘सब चंगा सी’ रवैये से इस संकट का हल नहीं निकलेगा

मुख्य आर्थिक सलाहकार आश्वस्त कर रहे हैं कि सरकार के पास भविष्य में सही समय पर जारी करने के लिए काफी संसाधन हैं. लेकिन सौ सालों में एक बार आने वाले आर्थिक संकट का सामना कर रही अर्थव्यवस्था के पास बस एक ही चीज़ की किल्लत होती है और वह है समय.

New Delhi: People buy clothes from a roadside garment shop at Lajpat Nagar Central Market after authorities eased restrictions, during the ongoing COVID-19 nationwide lockdown, in New Delhi, Tuesday, June 2, 2020. (PTI Photo/Manvender Vashist)(PTI02-06-2020_000237B)

लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार के नरेंद्र मोदी के दावे में दम नहीं है

अगले छह महीनों में विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था में अधिक तेज़ी से होने वाले जिस सुधार को लेकर प्रधानमंत्री इतने आश्वस्त हैं, वह भारी-भरकम सरकारी ख़र्च के बिना असंभव लगता है. अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान पहुंचाया जा चुका है कि सुधार की कोई कार्य योजना पेश करने से पहले गंभीरता से इसका अध्ययन करना ज़रूरी है.

नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

मोदी के आर्थिक पैकेज का 10 फीसदी से भी कम हिस्सा गरीबों और बेरोजगारों को राहत के लिए है

सरकार ने राहत पैकेज का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज, ब्याज पर छूट देने इत्यादि के लिए घोषित किया है, जिसका फायदा बड़े बिजनेस वाले ही अभी उठा रहे हैं. यदि ज्यादा लोगों के हाथ में पैसा दिया जाता तो वे इसे खर्च करते और इससे खपत में बढ़ोतरी होती, जिससे अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में काफी मदद मिलती.

**EDS: VIDEO GRAB** New Delhi: Prime Minister Narendra Modi gestures during his address to the nation on coronavirus pandemic in New Delhi, Thursday, March 19, 2020. (PTI Photo)(PTI19-03-2020_000207B)

20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का महत्व इससे है कि सरकार गरीबों के हाथ में कितनी राशि देगी

यदि आरबीआई द्वारा की गईं घोषणाओं और केंद्र के पहले कोरोना राहत पैकेज की राशि जोड़ दें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में करीब 13 लाख करोड़ रुपये की ही अतिरिक्त राशि बचती है, जिसका विवरण दिया जाना अभी बाकी है.