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पूर्वा भारद्वाज

(फोटो साभार: Composition 8, Vassily Kandinsky (1923)/विकीमीडिया कॉमन्स)

यह साल हम सबने किस तरह काटा है…

बदसूरत से बदसूरत समय में जीवन में आस्था नहीं छोड़नी चाहिए. बदसूरती और नाइंसाफ़ी का दस्तावेज़ीकरण भी कितना ज़रूरी है. क्या हमारे दौर का भी दर्ज हो रहा है?

(फोटो: पीटीआई)

लॉकडाउन धीरे-धीरे ही सही, मध्य वर्ग के सरोकारों को बदल रहा है…

कोरोना वायरस के चलते लगे लॉकडाउन का असर समाज के सभी वर्गों और सभी उम्र के लोगों पर पड़ रहा है. ऐसे ही एक मध्यमवर्गीय युवक की कहानी…

New Delhi: Family members sit on the rooftop of their houses during the nationwide lockdown, imposed in wake of the coronavirus pandemic, in New Delhi, Tuesday, April 21, 2020. (PTI Photo/Atul Yadav)(PTI21-04-2020 000240B)

लॉकडाउन: दबे क़दमों से समाज की बनावट में बिखराव आ रहा है…

लॉकडाउन के दौरान कई स्तरों पर हो रहे नुकसानों में उन सामाजिक क्षतियों का ज़िक्र नहीं हो रहा है, जिनका सामना न्यूनतम संसाधनों के सहारे रह रहे निम्न आर्थिक वर्ग के परिवार कर रहे हैं.

वीडियो स्क्रीनशॉट

‘करिहा छमा छठी मैया भूल चूक गलती हमार’

छठ के इस वीडियो को देखकर शहर में अकेले रह रहे उच्च और मध्यमवर्ग के लोग अपने जीवन में आ रही कमी को महसूस करते हैं. यह सुख-सुविधा की कमी नहीं है. यह रौनक और संस्कृति के तत्त्वों की कमी है.