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सचिन कुमार जैन

Las Vegas Metro Police officers work near the concert venue after a mass shooting at a music festival on the Las Vegas Strip in Las Vegas, Nevada, U.S. October 1, 2017. REUTERS/Las Vegas Sun/Steve Marcus

दुनिया में विकास का पैमाना युद्धों का ख़ात्मा क्यों नहीं है?

मानव समाज के 3400 सालों के लिखित इतिहास में केवल 268 साल शांति वाले रहे हैं यानी इस धरती ने बस आठ प्रतिशत समय शांति के साथ गुज़ारा है.

Gorakhpur: A view of a flooded region in eastern Uttar Pradesh on Wednesday. PTI Photo  (PTI8_24_2017_000228B)

क्या हम बाढ़ और सूखा जैसी आपदाओं से सहज होते जा रहे हैं?

अगर सरकारें नासमझ नहीं तो फिर शायद बेहद शातिर हो गई हैं. वे यह सवाल बहस में नहीं आने देना चाहती हैं कि आख़िर अब हर साल सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि क्यों आने लगे हैं?

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आठ सालों में देश में पांच साल की उम्र से पहले ही हुई 1.13 करोड़ बच्चों की मौत

वर्ष 2008 से 15 के बीच हर घंटे औसतन 89 नवजात शिशुओं की मृत्यु होती रही है. 62.40 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु जन्म के 28 दिनों के भीतर हुई.

farmer reuters

क्या भारत डब्ल्यूटीओ के जाल में फंस चुका है?

भारत सरकार अब इस बात से सहमत है कि खाद्य सब्सिडी को कम से कम किया जाना होगा, इस कारण से पूरी संभावना है कि भारत में रोज़गार, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गैर-बराबरी का दर्द अब और ज़्यादा बढ़ेगा.

Nehru Wikimedia

हमें राजनीतिक आज़ादी तो मिल गई, लेकिन सामाजिक और आर्थिक आज़ादी कब मिलेगी?

सरकार यह महसूस नहीं करती है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण पर किया गया ख़र्च वास्तव में बट्टे-खाते का ख़र्च नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य के लिए किया गया निवेश है.

The Minister of State for Commerce & Industry (Independent Charge), Smt. Nirmala Sitharaman meeting the DG, WTO, Mr. Roberto Azevedo, in Geneva on July 18, 2017.

नीति बनाने वाले किसान और उपभोक्ता को एक-दूसरे का दुश्मन बना रहे हैं

जब कुछ ख़ास व्यापारिक प्रतिष्ठानों का एकाधिकार स्थापित हो जाएगा, तब क़ीमतें सरकार और किसान नहीं, बड़ी कंपनियां तय करेंगी.

Mob Violence Blush Me

लोगों का भीड़ में बदलना और क़ातिल हो जाना विकास का कैसा मुक़ाम है?

भीड़ को राजनीति और सत्ता मिलकर पैदा करते हैं. उन्हें निर्देशित करते हैं. फिर भीड़ उनके नियंत्रण से भी बाहर निकल जाती है. वह किसी की नहीं सुनती.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi being presented a "Plough" as symbol of farming at the launching ceremony of DD Kisan Channel, in New Delhi on May 26, 2015. 
The Union Minister for Agriculture, Shri Radha Mohan Singh is also seen.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों का कम निजी कंपनियों को ज़्यादा फायदा है

राज्यवार आंकड़ों से पता चलता है कि योजना के तहत किसान जितने भुगतान का दावा करते हैं निजी बीमा कंपनियां उससे कम राशि अदा करती हैं.

Farmers Reuters

किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घाटे का सौदा है

वास्तव में किसानों से उपज खरीदने वालों से व्यापार में नैतिकता की अपेक्षा भर की जाती रही. सरकार ने यह कोशिश कभी नहीं की कि किसानों को उचित कीमतें मिलें.

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क्या खेती करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता?

खेती से जुड़े किसी भी काम को अकुशल श्रम माना जाता है. क्या मिट्टी की पहचान के साथ फसल तय करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता? बीज अंकुरित होगा या नहीं, यह जांचना गैर-तकनीकी काम है? कौन से उर्वरक-खाद डालना है, कब डालना है, क्या यह विशेषज्ञता का काम नहीं है?

Rewa (31)

विकास के लिए आदिवासियों और दलितों की ही बलि क्यों दी जाती है?

भारत के प्रधानमंत्री सबको घर उपलब्ध करवाने का वायदा करते हैं, वहीं मध्य प्रदेश सरकार आदिवासियों के बने बनाए घर तोड़ रही है.

(फोटो :रॉयटर्स)

किसान से रिश्ता मत तोड़िये, समाज टूट जाएगा

किसान सरकारी कर्मचारियों की तरह काम बंद नहीं करता है. सूखे, बाढ़ समेत तमाम संकट से जूझ रहा है लेकिन अपना पुरुषार्थ नहीं छोड़ता. हमें सरकार के उस भुलावे से बाहर निकलना होगा कि बड़े उद्योगपति आयेंगे और देश में बहार आ जाएगी.