प्रासंगिक

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आज़ादी के 72वें साल में लोकतंत्र पर भीड़तंत्र हावी हो गया

एक सोची-समझी साज़िश के तहत जनता को एक बिना सोच-समझ वाली भीड़ में बदल दिया गया है. अब ऐसी भीड़ देश के हर क़स्बे -गांव में घूम रही है, जो एक इशारे पर किसी को भी पीट-पीटकर मार डालने को तैयार है.

(फोटो: पीटीआई)

‘हमें आज़ादी तो मिल गई है पर पता नहीं कि उसका करना क्या है’

आज़ादी के 72 साल: हमारी हालत अब भी उस पक्षी जैसी है, जो लंबी कैद के बाद पिंजरे में से आज़ाद तो हो गया हो, पर उसे नहीं पता कि इस आज़ादी का करना क्या है. उसके पास पंख हैं पर ये सिर्फ उस सीमा में ही रहना चाहता है जो उसके लिए निर्धारित की गई है.

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जब प्रेमचंद ने महात्मा गांधी का भाषण सुनकर सरकारी नौकरी छोड़ दी थी…

वह असहयोग आंदोलन का ज़माना था, प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार थे. बेहद तंगी थी, बावजूद इसके गांधी जी के भाषण के प्रभाव में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया था.

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1982 की बॉम्बे कपड़ा मिल की चर्चित हड़ताल की पूर्वकथा

जनवरी 1982 में मुंबई के कपड़ा मिलों के दो लाख से ज़्यादा मज़दूर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर अनिश्चिकालीन हड़ताल पर गए थे. दत्ता सामंत के नेतृत्व में लगभग दो साल तक चली इस हड़ताल ने पूरे कपड़ा मिल उद्योग के साथ सरकार को भी हैरान कर दिया था. इस ऐतिहासिक हड़ताल पर लेखक हब वैन वर्श की किताब ‘द 1982-83 बॉम्बे टेक्सटाइल्स स्ट्राइक एंड द अनमेकिंग ऑफ अ लेबरर्स सिटी’ का अंश.

(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

‘यह गांधी कौन था?’ ‘वही, जिसे गोडसे ने मारा था’

जब गोडसे की जय-जयकार होगी, तब यह तो बताना ही पड़ेगा कि उसने कौन-सा महान कर्म किया था. बताया जाएगा कि उस वीर ने गांधी को मार डाला था. गांधी गोडसे के बहाने याद किए जाएंगे. अभी तक गोडसे को गांधी के बहाने याद किया जाता था. एक महान पुरुष के हाथों मरने का कितना फायदा मिलेगा गांधी को.

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… तो देश को 1977 में ही मिल जाता पहला दलित प्रधानमंत्री

चुनावी बातें: 1977 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद जनसंघ के सांसद चाहते थे कि बाबू जगजीवन राम के रूप में पहला दलित प्रधानमंत्री देकर देश को नया संदेश दिया जाए, लेकिन राजनीतिक जटिलताओं के चलते ऐसा हो न सका.

Jallianwala Bagh Manto Wiki

जब मंटो जलियांवाला बाग़ में घंटों बैठकर अंग्रेज़ी हुकूमत के तख़्तापलट के सपने देखा करते थे

जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने मंटो को बदल दिया था. मंटो तब सात साल के थे, जब बाग़ का ख़ूनी दृश्य देखा और उसको कहीं अपने भीतर महसूस किया. बचपन की ये कैफ़ियत उनके परिपक्व होने तक भी नहीं निकल पाई. इसके बहुत बाद में जब वे अपने साहित्यिक जीवन की पहली कहानी ‘तमाशा’ लिख रहे थे, तब शायद उसी यातना से गुज़र रहे थे.

चौधरी चरण सिंह (फोटो: द वायर)

जब चौधरी चरण सिंह बोले- अगर मेरे दल का प्रत्याशी किसान-मज़दूरों से धोखा करता हो, तो वोट न देना

चुनावी बातें: चौधरी चरण सिंह ने एक चुनावी सभा में मतदाताओं से कहा था कि अगर उनकी पार्टी का प्रत्याशी चारित्रिक रूप से पतित हो या शराब पीता हो, तो वे उसे हराने में संकोच न करें.

पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा (फोटो साभार: alchetron.com)

जब मकान मालिक ने किराया न देने पर पूर्व प्रधानमंत्री का सामान बाहर फिंकवा दिया था

चुनावी बातें: देश की राजनीति में एक समय ऐसा भी था जब सादगी हमारे नेताओं के बीच एक स्थापित परंपरा हुआ करती थी.

प्रतीकात्मक फोटो पीटीआई

भारत में वायु प्रदूषण की वजह से 2017 में 12 लाख लोगों की असमय मौत: रिपोर्ट

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2019 रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में विश्व के 3.6 अरब लोग घर में होने वाले प्रदूषण से प्रभावित हुए. भारत में अभी भी 60 फीसदी, बांग्लादेश में 79 फीसदी और चीन में 32 फीसदी लोग ठोस ईंधन से खाना बना रहे हैं. इसकी वजह से घर के भीतर प्रदूषण बढ़ रहा है.

प्रतीकात्मक फोटो रॉयटर्स

पिछले साल दुनियाभर में 11.3 करोड़ लोगों ने किया घोर भुखमरी का सामना: रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु से जुड़ी आपदाओं और आर्थिक अशांति जैसे कारणों से पैदा हुए खाद्य संकट की वजह से 53 देशों में ये लोग घोर भुखमरी का सामना कर रहे हैं और उन्हें तत्काल खाद्य पदार्थ, पोषक आहार और आजीविका की ज़रूरत है.

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क्यों भारत ने 1971 के युद्ध के बाद 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा किया था

1971 में पाकिस्तान के सरेंडर के बाद इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी चिंता मुजीबुर्रहमान की हिफ़ाज़त थी. पाकिस्तानी युद्धबंदियों की रिहाई वो क़ीमत थी, जो उन्होंने इस बांग्लादेशी नेता की सुरक्षित वापसी के लिए ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को चुकाई थी.

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जब नेहरू ने कहा- वही संस्कृति के बारे में सबसे ज़्यादा बात कर रहे हैं, जिनमें इसका क़तरा तक नहीं है

पुस्तक अंश: 1950 में नेहरू ने लिखा, ‘यूपी कांग्रेस कमेटी की आवाज़ उस कांग्रेस की आवाज़ नहीं है, जिसे मैं जानता हूं, बल्कि यह उस तरह की आवाज़ है जिसका मैं पूरी ज़िंदगी विरोध करता रहा हूं. कुछ कांग्रेसी नेता लगातार ऐसे आपत्तिजनक भाषण दे रहे हैं, जैसे हिंदू महासभा के लोग देते हैं.’

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अपूर्वानंद की मास्टरक्लास: गांधी हत्या या गांधी वध?

आज की मास्टर क्लास में अपूर्वानंद उन लोगों के बारे में चर्चा कर रहे हैं जिन्हें गांधी हत्या को गांधी वध कहने में संकोच नहीं होता.

Mahatma Gandhi Photo Wikimedis commons

अभी गांधी की बात करना क्यों ज़रूरी है?

आज हमारे सामने ऐसे नेता हैं जो केवल तीन काम करते हैं: वे भाषण देते हैं, उसके बाद भाषण देते हैं और फिर भाषण देते हैं. सार्वजनिक राजनीति से करनी और कथनी में केवल कथनी बची है. गांधी उस कथनी को करनी में तब्दील करने के लिए ज़रूरी हैं.

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जब चार्ली चैप्लिन मिलने पहुंचे गांधी से

महात्मा गांधी से मिलने के बाद चार्ली चैप्लिन के शब्द थे, ‘अंततः जब वे (गांधी) पहुंचे और अपने पहनावे की तहें संभालते हुए टैक्सी से उतरे तो स्वागत में जयकारे गूंज उठे. उस छोटी तंग गरीब बस्ती में क्या अजब दृश्य था जब एक बाहरी शख़्स एक छोटे-से घर में जन-समुदाय के जयघोष के बीच दाख़िल हो रहा था.’

फोटो साभार: thierry ehrmann/Flickr CC BY 2.0

बापू के नाम: आज आप जैसा कोई नहीं, जो भरोसा दिला सके कि सब ठीक हो जाएगा

जयंती विशेष: जिस दौर में गांधी को ‘चतुर बनिया’ की उपाधि से नवाज़ा जाए, उस दौर में ये लाज़िम हो जाता है कि उनकी कही बातों को फिर समझने की कोशिश की जाए और उससे जो हासिल हो, वो सबके साथ बांटा जाए.

आचार्य रामचंद्र गौड़

अगर आचार्य रामदास की मुहिम चलती रहती तो हिंदी में विज्ञान लेखन की इतनी दुर्गति न होती

पुण्यतिथि विशेष: 12 सितंबर, 1937 को अंतिम सांस लेने वाले आचार्य रामदास गौड़ द्वारा पैदा की गई वैज्ञानिक चेतना का ही परिणाम था कि उन दिनों विज्ञान लेखकों की गणना भी साहित्यकारों में की जाती थी.

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रामस्वरूप वर्मा: अंधविश्वास-सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ तर्क व मानवतावाद की बात करने वाला नेता

जन्मदिन पर विशेष: लगभग पचास साल तक राजनीति में सक्रिय रहे रामस्वरूप वर्मा को राजनीति का ‘कबीर’ कहा जाता है. किसान परिवार मेें जन्मे वर्मा ने एक लेखक, समाज सुधारक और चिंतक के रूप में उत्तर भारत पर गहरा असर डाला.

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अपने अवसान के दिन तक संभावनाओं से भरे हुए थे राजीव गांधी

जयंती विशेष: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के सातवें और अब तक के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ अपने आत्मीय रिश्ते को याद करते हुए एक बार बताया था कि कैसे राजीव ने उनकी जान बचाई थी.

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…जब वाजपेयी ने दी थी मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत

वीडियो: गुजरात दंगों के बाद पहली बार राज्य के दौरे पर गए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जब एक पत्रकार ने पूछा कि मुख्यमंत्री के लिए क्या संदेश है तब उन्होंने कहा, ‘राजधर्म का पालन करें.’

स्वामी पागलदास.

अयोध्या में अब कोई ‘पागलदास’ नहीं रहता

जयंती विशेष: अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मृदंगाचार्य रामशंकरदास उर्फ स्वामी पागलदास को खोकर अयोध्या आज भी उतनी ही उदास है जितनी वह मध्यकाल में वैरागियों द्वारा निर्गुण संत कवि पलटूदास को ज़िंदा जलाए जाने के वक़्त हुई होगी.

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जब बंगाल में ऐसी धोतियां फैशन में थीं जिनके किनारों पर ‘खुदीराम बोस’ लिखा रहता था

शहादत दिवस पर विशेष: सामान्य युवा इतना भले ही जानते हैं कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ने देश को सरदार भगत सिंह जैसा शहीद-ए-आज़म दिया, लेकिन सबसे कम उम्र के शहीद के बारे में कम ही लोग जानते हैं.

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ओडिशा: रिश्तेदार के शव को साइकिल से बांधकर ले जाना पड़ा श्मशान, गांववालों ने कर दिया था बहिष्कार

आरोप है कि दूसरी जाति की एक महिला से शादी करने के कारण 60 साल के चतुरभुजा बांका को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था इसलिए लाश को ले जाने में किसी ने भी उनकी मदद नहीं की.

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प्रेमचंद का ‘सूरदास’ आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है

1925 में आए प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि में किसान सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं. जो बात रंगभूमि में सूरदास ने कहने की कोशिश की थी, वही आज जब कोई किसान कह रहा है तो उसे निशाना साधकर गोली मारी जा रही है.

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प्रेमचंद को क्यों पढ़ें

प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल बेमानी जान पड़ता है, लेकिन हर दौर में उठता रहा है. अक्सर कहा जाता है कि अब भी भारत में किसान मर रहे हैं, शोषण है, इसलिए प्रेमचंद प्रासंगिक हैं. प्रेमचंद शायद ऐसी प्रासंगिकता अपनी मृत्यु के 80 साल बाद न चाहते.

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दूसरे देशों में गाय दूध के लिए होती है, हमारे यहां दंगा करने के लिए

जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए. क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बांध देते हैं.

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क्या आपको 24 जुलाई 1991 का दिन याद है?

यह वह दिन है, जब तत्कालीन वित्तमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में वित्तवर्ष 1991-92 का आम बजट पेश करते हुए भारत के आर्थिक नीतियों में बदलाव की घोषणा की थी.

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1978 में इंदिरा ने जो किया, क्या उसे फिर दोहराया जा सकता है?

अगर 1977 भारत की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के सत्ता में आने के कारण भारतीय राजनीति का एक बड़ा पड़ाव है तो 1978 को इंदिरा गांधी के उस जुझारूपन के कारण याद रखा जाना चाहिए, जिसके बल पर उन्होंने अपनी वापसी की इबारत लिखी.

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चंद्रशेखर: किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह दूसरों की देशभक्ति पर शक करे

पुण्यतिथि विशेष: बहुत कम समय के लिए भारत के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर सत्ता की राजनीति के मुखर विरोधी थे और लोकतांत्रिक मूल्यों व सामाजिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता की राजनीति को महत्व देते थे.

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सरकार चाहती है देश का युवा समझे कि प्रतिरोध करना राष्ट्रद्रोह और ग़ैर-लोकतांत्रिक है

हमारी राष्ट्रीय राजनीति और भाजपा कांग्रेस विरोधी आंदोलन यानी प्रतिरोध का ही नतीजा हैं, लेकिन इसके बारे में कोई बात नहीं करता. ख़ुद भाजपा भी नहीं. वे चाहते हैं कि हम इमरजेंसी के बारे में जानें लेकिन उतना, जितने से उन्हें नुकसान न पहुंचे.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi visiting the Terracota Warriors Museum, in Xi'an, Shaanxi, China on May 14, 2015.

क्या आपातकाल को दोहराने का ख़तरा अब भी बना हुआ है?

आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी. आज फिर वैसा ही नज़ारा दिख रहा है. सारे अहम फ़ैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते, सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है.

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नीरा बेन देसाई: भारत में स्त्री आंदोलनों की विस्मृत कुल माता

पुण्यतिथि विशेष: 1957 में प्रकाशित नीरा बेन का शोधग्रंथ ‘वीमेन इन मॉडर्न इंडिया’ स्त्रियों की दुर्दशा पर मौलिक शोधों के सिलसिले में अनूठा साबित हुआ. 1974 में देश में स्त्रियों की दशा के विश्लेषण के लिए गठित जिस समिति ने ‘समानता की ओर’ शीर्षक से बहुचर्चित विस्तृत रिपोर्ट दी थी, नीरा बेन उसकी सदस्य थीं.

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जॉर्ज ऑरवेल को पता था कि आने वाला वक़्त ‘बिग ब्रदर’ का है

जन्मतिथि पर विशेष: जॉर्ज ऑरवेल ने 1948 में एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था- 1984. इसमें समय से आगे एक समय की कल्पना की गई है, जिसमें राज सत्ता अपने नागरिकों पर नज़र रखती है और उन्हें बुनियादी आज़ादी देने के पक्ष में भी नहीं है.

B-127,  DELHI-271118 -  NOVEMBER 27, 2008 -  New Delhi : A file photo of former Prime Minister V P Singh at a press conference in New Delhi in 2007.  Singh died after a prolonged illness in New Delhi on Thursday.  PTI Photo

विश्वनाथ प्रताप सिंह: राजनीति में सामाजिक न्याय के कई नए मुहावरे गढ़ने वाला शख़्स

जन्मदिन पर विशेष: वीपी सिंह कहा करते थे कि सामाजिक परिवर्तन की जो मशाल उन्होंने जलाई है और उसके उजाले में जो आंधी उठी है, उसका तार्किक परिणति तक पहुंचना अभी शेष है. अभी तो सेमीफ़ाइनल भर हुआ है और हो सकता है कि फ़ाइनल मेरे बाद हो. लेकिन अब कोई भी शक्ति उसका रास्ता नहीं रोक पाएगी.

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गिजूभाई बधेका: जिन्होंने बच्चों का शैक्षिक स्वतंत्रता संग्राम लड़ा

पुण्यतिथि पर विशेष: बच्चे स्कूल जाने से हीलाहवाली करने के बजाय उत्साह व उल्लास के साथ वहां जाएं और जीवनोपयोगी शिक्षा ग्रहण करें, इसके लिए गिजूभाई ने कई क्रांतिकारी प्रयोग किए.

महात्मा गांधी. (फोटो: रॉयटर्स)

क्या गांधी की हत्या में आरएसएस की भूमिका थी?

गांधीजी की हत्या में आरएसएस का हाथ होने के मामले को अदालती कार्यवाही पर छोड़ना उचित है. लेकिन इतिहास लेखन उनकी हत्या के पीछे छुपे विचार को पकड़ने में दिलचस्पी रखता है.

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मौलवी अहमदउल्ला शाह फ़ैज़ाबादी: 1857 का ‘फौलादी शेर’, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की बेल सींची

शहादत दिवस पर विशेष: 1857 की क्रांति के दौरान साधु-फकीरों, सिपाहियों व चौकीदारों के जरिये रोटी व कमल का जो फेरा लगता था, वह भी मौलवी अहमदउल्ला की ही सूझ थी.

भगवती चरण वोहरा. (जन्म: 04 जुलाई 1904 - अवसान: 28 मई 1930, फोटो साभार: शहीद कोश)

भगवतीचरण वोहरा: जिनके त्याग के आगे भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नज़र आता था

शहादत दिवस पर विशेष: क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा के निधन पर भगत सिंह के शब्द थे, ‘हमारे तुच्छ बलिदान उस श्रृंखला की कड़ी मात्र होंगे, जिसका सौंदर्य कॉमरेड भगवतीचरण वोहरा के आत्मत्याग से निखर उठा है.’