प्रासंगिक

स्वामी पागलदास.

अयोध्या में अब कोई ‘पागलदास’ नहीं रहता

जयंती विशेष: अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मृदंगाचार्य रामशंकरदास उर्फ स्वामी पागलदास को खोकर अयोध्या आज भी उतनी ही उदास है जितनी वह मध्यकाल में वैरागियों द्वारा निर्गुण संत कवि पलटूदास को ज़िंदा जलाए जाने के वक़्त हुई होगी.

(फोटो: पीटीआई)

‘हमें आज़ादी तो मिल गई है पर पता नहीं कि उसका करना क्या है’

आज़ादी के 71 साल: हमारी हालत अब भी उस पक्षी जैसी है, जो लंबी कैद के बाद पिंजरे में से आज़ाद तो हो गया हो, पर उसे नहीं पता कि इस आज़ादी का करना क्या है. उसके पास पंख हैं पर ये सिर्फ उस सीमा में ही रहना चाहता है जो उसके लिए निर्धारित की गई है.

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जब बंगाल में ऐसी धोतियां फैशन में थीं जिनके किनारों पर ‘खुदीराम बोस’ लिखा रहता था

शहादत दिवस पर विशेष: कभी बिहार के उसी मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले को यह गौरव हासिल हुआ था कि वहां की जेल में सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस शहीद हुए थे, जो इन दिनों एक सरकारी बालिका आश्रय गृह में हुई हैवानियत के कारण लगातार चर्चा में है.

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ओडिशा: रिश्तेदार के शव को साइकिल से बांधकर ले जाना पड़ा श्मशान, गांववालों ने कर दिया था बहिष्कार

आरोप है कि दूसरी जाति की एक महिला से शादी करने के कारण 60 साल के चतुरभुजा बांका को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था इसलिए लाश को ले जाने में किसी ने भी उनकी मदद नहीं की.

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प्रेमचंद का ‘सूरदास’ आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है

1925 में आए प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि में किसान सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं. जो बात रंगभूमि में सूरदास ने कहने की कोशिश की थी, वही आज जब कोई किसान कह रहा है तो उसे निशाना साधकर गोली मारी जा रही है.

Premchand

प्रेमचंद को क्यों पढ़ें

जन्मतिथि विशेष: प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल बेमानी जान पड़ता है, लेकिन हर दौर में उठता रहा है. अक्सर कहा जाता है कि अब भी भारत में किसान मर रहे हैं, शोषण है, इसलिए प्रेमचंद प्रासंगिक हैं. प्रेमचंद शायद ऐसी प्रासंगिकता अपनी मृत्यु के 80 साल बाद न चाहते.

Harishankar Parsai The Wire Hindi

दूसरे देशों में गाय दूध के लिए होती है, हमारे यहां दंगा करने के लिए

जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए. क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बांध देते हैं.

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क्या आपको 24 जुलाई 1991 का दिन याद है?

यह वह दिन है, जब तत्कालीन वित्तमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में वित्तवर्ष 1991-92 का आम बजट पेश करते हुए भारत के आर्थिक नीतियों में बदलाव की घोषणा की थी.

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1978 में इंदिरा ने जो किया, क्या उसे फिर दोहराया जा सकता है?

अगर 1977 भारत की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के सत्ता में आने के कारण भारतीय राजनीति का एक बड़ा पड़ाव है तो 1978 को इंदिरा गांधी के उस जुझारूपन के कारण याद रखा जाना चाहिए, जिसके बल पर उन्होंने अपनी वापसी की इबारत लिखी.

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चंद्रशेखर: किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह दूसरों की देशभक्ति पर शक करे

पुण्यतिथि विशेष: बहुत कम समय के लिए भारत के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर सत्ता की राजनीति के मुखर विरोधी थे और लोकतांत्रिक मूल्यों व सामाजिक परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता की राजनीति को महत्व देते थे.

Student Protest Reuters

सरकार चाहती है देश का युवा समझे कि प्रतिरोध करना राष्ट्रद्रोह और ग़ैर-लोकतांत्रिक है

हमारी राष्ट्रीय राजनीति और भाजपा कांग्रेस विरोधी आंदोलन यानी प्रतिरोध का ही नतीजा हैं, लेकिन इसके बारे में कोई बात नहीं करता. ख़ुद भाजपा भी नहीं. वे चाहते हैं कि हम इमरजेंसी के बारे में जानें लेकिन उतना, जितने से उन्हें नुकसान न पहुंचे.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi visiting the Terracota Warriors Museum, in Xi'an, Shaanxi, China on May 14, 2015.

क्या आपातकाल को दोहराने का ख़तरा अब भी बना हुआ है?

आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी. आज फिर वैसा ही नज़ारा दिख रहा है. सारे अहम फ़ैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते, सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है.

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नीरा बेन देसाई: भारत में स्त्री आंदोलनों की विस्मृत कुल माता

पुण्यतिथि विशेष: 1957 में प्रकाशित नीरा बेन का शोधग्रंथ ‘वीमेन इन मॉडर्न इंडिया’ स्त्रियों की दुर्दशा पर मौलिक शोधों के सिलसिले में अनूठा साबित हुआ. 1974 में देश में स्त्रियों की दशा के विश्लेषण के लिए गठित जिस समिति ने ‘समानता की ओर’ शीर्षक से बहुचर्चित विस्तृत रिपोर्ट दी थी, नीरा बेन उसकी सदस्य थीं.

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जॉर्ज ऑरवेल को पता था कि आने वाला वक़्त ‘बिग ब्रदर’ का है

जन्मतिथि पर विशेष: जॉर्ज ऑरवेल ने 1948 में एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था- 1984. इसमें समय से आगे एक समय की कल्पना की गई है, जिसमें राज सत्ता अपने नागरिकों पर नज़र रखती है और उन्हें बुनियादी आज़ादी देने के पक्ष में भी नहीं है.

B-127,  DELHI-271118 -  NOVEMBER 27, 2008 -  New Delhi : A file photo of former Prime Minister V P Singh at a press conference in New Delhi in 2007.  Singh died after a prolonged illness in New Delhi on Thursday.  PTI Photo

विश्वनाथ प्रताप सिंह: राजनीति में सामाजिक न्याय के कई नए मुहावरे गढ़ने वाला शख़्स

जन्मदिन पर विशेष: वीपी सिंह कहा करते थे कि सामाजिक परिवर्तन की जो मशाल उन्होंने जलाई है और उसके उजाले में जो आंधी उठी है, उसका तार्किक परिणति तक पहुंचना अभी शेष है. अभी तो सेमीफ़ाइनल भर हुआ है और हो सकता है कि फ़ाइनल मेरे बाद हो. लेकिन अब कोई भी शक्ति उसका रास्ता नहीं रोक पाएगी.

gijubhai wiki

गिजूभाई बधेका: जिन्होंने बच्चों का शैक्षिक स्वतंत्रता संग्राम लड़ा

पुण्यतिथि पर विशेष: बच्चे स्कूल जाने से हीलाहवाली करने के बजाय उत्साह व उल्लास के साथ वहां जाएं और जीवनोपयोगी शिक्षा ग्रहण करें, इसके लिए गिजूभाई ने कई क्रांतिकारी प्रयोग किए.

महात्मा गांधी. (फोटो: रॉयटर्स)

क्या गांधी की हत्या में आरएसएस की भूमिका थी?

गांधीजी की हत्या में आरएसएस का हाथ होने के मामले को अदालती कार्यवाही पर छोड़ना उचित है. लेकिन इतिहास लेखन उनकी हत्या के पीछे छुपे विचार को पकड़ने में दिलचस्पी रखता है.

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मौलवी अहमदउल्ला शाह फ़ैज़ाबादी: 1857 का ‘फौलादी शेर’, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की बेल सींची

शहादत दिवस पर विशेष: 1857 की क्रांति के दौरान साधु-फकीरों, सिपाहियों व चौकीदारों के जरिये रोटी व कमल का जो फेरा लगता था, वह भी मौलवी अहमदउल्ला की ही सूझ थी.

भगवती चरण वोहरा. (जन्म: 04 जुलाई 1904 - अवसान: 28 मई 1930, फोटो साभार: शहीद कोश)

भगवतीचरण वोहरा: जिनके त्याग के आगे भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नज़र आता था

शहादत दिवस पर विशेष: क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा के निधन पर भगत सिंह के शब्द थे, ‘हमारे तुच्छ बलिदान उस श्रृंखला की कड़ी मात्र होंगे, जिसका सौंदर्य कॉमरेड भगवतीचरण वोहरा के आत्मत्याग से निखर उठा है.’

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जब राममोहन राय को मुग़ल सम्राट की ओर से दी गई ‘राजा’ की उपाधि

जयंती विशेष: राममोहन ‘राजा’ शब्द के प्रचलित अर्थों में राजा नहीं थे. उनके नाम के साथ यह शब्द तब जुड़ा जब दिल्ली के तत्कालीन मुग़ल शासक बादशाह अकबर द्वितीय ने उन्हें राजा की उपाधि दी.

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बहादुरशाह ज़फ़र: आज़ादी के सत्तर साल बाद भी दो गज़ ज़मीन न मिली कू-ए-यार में

विशेष: बहादुरशाह ज़फ़र हमारे उस स्वतंत्रता संग्राम के नायक हैं जिसमें हम हार भले ही गए थे पर हिंदुओं व मुसलमानों ने उसे एकजुट होकर लड़ा था और अपनी एकता की शक्ति प्रमाणित कर दी थी.

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दादा साहब फाल्के: सिनेमा की शुरुआत करने वाले की पहचान सिर्फ़ एक अवॉर्ड तक सीमित

जयंती विशेष: 1944 में उनकी एक गुमनाम शख़्स की तरह मौत हो गई जबकि तब तक उनका शुरू किया हुआ कारवां काफी आगे निकल चुका था. फिल्मी दुनिया की बदौलत कुछ शख़्सियतों ने अपना बड़ा नाम और पैसा कमा लिया था. घुंडीराज गोविंद फाल्के को हम आम तौर […]

शलभ श्रीराम सिंह.

शलभ श्रीराम सिंह: प्रेम और प्रकृति का नहीं, बग़ावत का कवि

पुण्यतिथि विशेष: शलभ श्रीराम सिंह ने नकारात्मकता के बजाय संघर्ष या युद्ध को अपनी कविता का महत्वपूर्ण पक्ष बनाया.

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जब चुनाव हार गए थे बाबा साहब भीमराव आंबेडकर

जन्मदिन विशेष: भारत के जिस संविधान का भीमराव आंबेडकर को निर्माता कहा जाता है उसके लागू होने के बाद 1952 में हुए देश के पहले लोकसभा चुनाव में वे बुरी तरह हार गए थे.

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आंबेडकर: संविधान अच्छे हाथों में रहा तो अच्छा, बुरे हाथों में गया तो ख़राब साबित होगा

जन्मदिन विशेष: आज हम अपनी राजनीति में नियमों, नीतियों, सिद्धांतों, नैतिकताओं, उसूलों व चरित्र के जिन संकटों से दो-चार हैं, उनके अंदेशे भीमराव आंबेडकर ने तभी भांप लिए थे.

New Delhi: Parliament during the first day of budget session in New Delhi on Tuesday. PTI Photo by  Kamal Kishore  (PTI2_23_2016_000104A)

आज ही के दिन 1947 में पेश हुआ हिंदू कोड बिल, ​कट्टरपंथियों ने काटा था बवाल

आज जैसे तीन तलाक़ में बदलाव की मांग को कट्टरपंथी धड़ा इस्लाम में दख़ल बताता है, कुछ वैसा ही आज़ादी के बाद हिंदू रूढ़ियों में बदलाव किए जाने पर अतिवादियों ने उसे हिंदू धर्म पर हमला बताया था.

(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

सत्यभक्त: हिंदी नवजागरण के अलबेले सेनानी

जन्मदिन विशेष: डाॅ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि अगर भारत में किसी एक व्यक्ति को कम्युनिस्ट पार्टी का संस्थापक होने का श्रेय दिया जा सकता है तो वह सत्यभक्त ही हैं.

Bismillah Khan Pinerest

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान: भारतीय संगीत का संत कबीर

जन्मतिथि विशेष: उस्ताद ऐसे बनारसी थे जो गंगा में वज़ू करके नमाज़ पढ़ते थे और सरस्वती को याद कर शहनाई की तान छेड़ते थे. इस्लाम में संगीत के हराम होने के सवाल पर हंसकर कहते थे, ‘क्या हुआ इस्लाम में संगीत की मनाही है, क़ुरान की शुरुआत तो ‘बिस्मिल्लाह’ से ही होती है.’

Radha_celebrating_Holi wikimedia commons

आज रंग है ऐ मां रंग है, मेरे महबूब के घर रंग है री…

सूफ़िया-ए-किराम हों या पीर-फ़क़ीर, दरवेश हों या साधू-संत सब अपने-अपने पीर-ओ-मुर्शिद और ख़ुदा से रिश्ता क़ायम करने के लिए इश्क़ पर ज़ोर देते हैं. इश्क़ के अनेक रंगों में एक रंग होली का है.

Sant Ravidas Wikipedia

‘जब सभ कर दोउ हाथ पग दोउ नैन दोउ कान, रविदास पृथक कइसे भये हिंदू औ मूसलमान’

संत कवियों की लंबी परंपरा में एक रविदास ही ऐसे हैं जो श्रम को ईश्वर बताकर ऐसे राज्य की कल्पना करते हैं, जो भारतीय संविधान के समता, स्वतंत्रता, न्याय व बंधुत्व पर आधारित अवधारणा के अनुरूप है.

Godse Gandhi Reuters Wikimedia Commons

30 जनवरी अब तक ‘गांधी निर्वाण दिवस है’, आगे ‘गोडसे गौरव दिवस’ हो जाएगा

गोडसे को भगत सिंह का दर्जा देने की कोशिश चल रह रही है. गोडसे ने हिंदू राष्ट्र के विरोधी गांधी को मारा था. गोडसे जब भगत सिंह की तरह राष्ट्रीय हीरो हो जाएगा, तब तीस जनवरी का क्या होगा?

Indian Army's Arjun MK-I tanks (MBTs) are driven for display during the Republic Day parade in New Delhi January 26, 2014. India celebrated its 65th Republic Day on Sunday. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA - Tags: MILITARY ANNIVERSARY POLITICS)

सत्यमेव जयते हमारा मोटो है, मगर गणतंत्र दिवस की झांकियां झूठ बोलती हैं

यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाए, लेकिन झांकी सजाए लघु उद्योगों की.

Subhash-Chandra-Bose-Jawahar-Lal-Nehru-Wiki

क्या नेताजी के ज़िंदा होने की ख़बर नेहरू को घेरने के लिए फैलाई गई थी?

लोगों को यक़ीन दिलाया गया कि नेताजी इसलिए भूमिगत रहे क्योंकि नेहरू ने ब्रिटिश सरकार से गुपचुप समझौता किया था कि अगर नेताजी कभी जीवित मिलते हैं तो उन्हें एक युद्ध अपराधी के रूप में तत्काल ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा.

बाबा साहब आंबेडकर और भीमा कोरेगांव में सोमवार को हिंसा हुई हिंसा. (फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स/एएनआई)

प्रासंगिक: जब नौ साल की उम्र में कोरेगांव गए आंबेडकर को जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ा

अपनी किताब ‘वेटिंग फॉर अ वीज़ा’ में भीमराव आंबेडकर ने 1901 में कोरेगांव यात्रा के दौरान हुए छुआछूत के कटु अनुभव पर विस्तार से चर्चा की है.

मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी (फोटो साभार: विकीपीडिया)

हमें सरहद पर बुला लें तो आज भी लड़ने के लिए तैयार हैं: लोंगेवाला लड़ाई के नायक मेजर चांदपुरी

फिल्मकार जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर लाेंगेवाला की लड़ाई पर ही बनी थी, जिसमें सनी देआेल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार अदा किया था.

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‘एक फिल्म ने ऐसे बादशाह की छवि बिगाड़ दी जिसने मंगोलों से हिंदुस्तान की हिफ़ाज़त की थी’

‘इतिहास के ज्ञान के नाम पर जहालत इतनी है कि फिल्मों को ही इतिहास मान लिया जाता है. हमें यह समझना होगा कि फिल्म इतिहास नहीं है.’

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मेरा झारखंड बनना अब भी बाकी है

कई बार पत्र-पत्रिकाओं के लेख आपको बता सकते हैं कि हमारे सपनों का झारखंड सपने से भी आगे जा चुका है पर इस सपने की सच्चाई देखनी हो तो गांव की पगडंडी पर आइये.

(फोटो साभार: Nehru Memorial Library)

क्या जनता के नेहरू को दिल्ली निगल गई?

1950-60 के दशक में दिल्ली ने अपने जैसा एक नेहरू बना लिया. यह 1920-30 के दशक के नेहरू से भिन्न था. समय के साथ वो नेहरू जनता की नज़र से ओझल होते गए जिसने अवध के किसान आंदोलन में संघर्ष किया था.

Girija Devi Wikipedia

मशहूर गायिका गिरिजा देवी पर शास्त्रीय गायिका विद्या राव से विनोद दुआ की बातचीत

ठुमरी की मलिका कही जाने वाली प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी का कोलकाता में 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया.

Sitaram Kesari YouTube

न खाता न बही, जो चचा केसरी कहें वही सही

पुण्यतिथि विशेष: 13 वर्ष की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने वाले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी के पास लगभग 35 वर्षों तक सांसद और तीन सरकारों में मंत्री रहने के बावजूद दिल्ली में अपना घर नहीं था.