समाज

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‘सलमा आपा ने उतना लिखा नहीं जितना वे लिख सकती थीं’

सलमा सिद्दीक़ी को अधिकतर लोग कृश्न चंदर की हमसफ़र के रूप में ही जानते हैं, पर उनकी एक अलग पहचान भी थी..एक लेखक की. सलमा 13 फरवरी को इस दुनिया से रुख़सत हो गईं. सलमा आपा, सब उन्हें इसी नाम से जानते थे…अक्सर ही लोग उनकी ख़ूबसूरती के […]

Muslim brides wait for the start of their mass marriage ceremony in Mumbai May 11, 2014. REUTERS/Danish Siddiqui/Files

शादियों में फिज़ूलखर्ची रोकने के लिए लोकसभा में निजी विधेयक

कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश करने वाली हैं, जो शादियों में फिज़ूलखर्च रोकने के अलावा गरीब परिवार की लड़कियों की शादी में योगदान से संबंधित है.

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़: जैसे बीमार को बेवजह क़रार आ जाए…

फ़ैज़ ऐसे शायर हैं जो सीमाओं का अतिक्रमण करके न सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान, बल्कि पूरी दुनिया के काव्य-प्रेमियों को जोड़ते हैं. वे प्रेम, इंसानियत, संघर्ष, पीड़ा और क्रांति को एक सूत्र में पिरोने वाले अनूठे शायर हैं.

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क्या आपको पता है कि मेरठ में एक फिल्म इंडस्ट्री भी है?

राजधानी दिल्ली से लगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की अपनी फिल्म इंडस्ट्री है जिसे यहां के लोगों ने ‘मॉलीवुड’ नाम दिया हुआ है.

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दर्शक कृपया ध्यान दें! एनएसडी के कर्ता-धर्ता पर्दे के पीछे दूसरे ही नाटक में लगे हैं

जिस भारंगम को अंतर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह के रूप में पेश किया जाता है , उसका इस्तेमाल नाट्य विद्यालय के पदाधिकारी निजी फायदे के लिए कर रहे हैं.

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एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने से रुके शिक्षा और मानवाधिकार के काम

विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत एनजीओ को मिलने वाले विदेशी चंदे पर लगने के बाद सामाजिक मुद्दों और मानवाधिकार से जुड़े काम प्रभावित हुए हैं.

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‘ये लेखन की परिपक्व उम्र नहीं, अभी थोड़ा और पकिए’

किस दिन, किस मुहूर्त में लेखक बना, याद नहीं न इसका जरा भी भान हुआ. बस याद रही इस यात्रा की वो सारी बातें जो खुद में एक उपन्यास है.

ससुरा बड़ा पइसावाला का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

भोजपुरी फिल्म फेस्टिवल : अपने ही जाल में उलझा भोजपुरी सिनेमा

बदलते दौर के भौतिक चमक-दमक को तो भोजपुरी सिनेमा खूब दिखाता है, पर सामाजिक -सांस्कृतिक मूल्यों की जड़ता से नहीं भिड़ता. वह एक बड़े विभ्रम का शिकार है.

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क्या विश्व पुस्तक मेले से गायब हो जाएंगी भारतीय भाषाएं?

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में शामिल होने वाले विभिन्न भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों की संख्या में लगातार कमी दर्ज की जा रही है.

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‘भंसाली के साथ वही हुआ जो सत्रह साल पहले मेरे साथ हुआ था’

मैं इस सिस्टम से नाराज हूं. मुझे इस पर गुस्सा है क्योंकि ये सिर्फ दिखावा करता है कि इसे हमारी फिक्र है पर असलियत इसके उलट है.