अज्ञेय

कपिला वात्स्यायन. (फोटो साभार: ट्विटर)

प्रख्यात कलाविद् कपिला वात्स्यायन का निधन

पद्म विभूषण से सम्मानित देश की प्रख्यात कलाविद् एवं राज्यसभा की पूर्व मनोनीत सदस्य कपिला वात्स्यायन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की संस्थापक सदस्य और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की आजीवन ट्रस्टी भी थीं.

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हिंदी साहित्य ने विभाजन को कैसे देखा

आज़ादी के 72 साल: जहां हिंदी लेखकों ने विभाजन पर बार-बार लिखा, हिंदी कवि इस पर तटस्थ बने रहे. कईयों ने आज़ादी मिलने के जश्न की कवितायें तो लिखीं, लेकिन देश बंटने के पीड़ादायी अनुभव पर उनकी चुप्पी बनी रही.

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रवीन्द्रनाथ त्यागी: ‘जिसने देखा नहीं मेरा कवि, उसने देखी नहीं मेरी सच्ची छवि’

पुण्यतिथि विशेष: बहुत कम ही लोग जानते हैं कि त्यागी जितने अच्छे व्यंग्यकार थे, उतने ही बड़े कवि भी थे. एक आलोचक की मानें तो उनके साहित्यिक जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यही थी कि उनके व्यंग्यकार की लोकप्रियता ने एक बार उनके कवि की गरदन दबोची, तो फिर जीवन भर नहीं छोड़ी.

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प्रेमचंद को क्यों पढ़ें

प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल बेमानी जान पड़ता है, लेकिन हर दौर में उठता रहा है. अक्सर कहा जाता है कि अब भी भारत में किसान मर रहे हैं, शोषण है, इसलिए प्रेमचंद प्रासंगिक हैं. प्रेमचंद शायद ऐसी प्रासंगिकता अपनी मृत्यु के 80 साल बाद न चाहते.

फोटो साभार: apvaad.blogspot.in

विद्रोह और समन्वय के कवि कुंवर नारायण

कुंवर नारायण के काव्य में अवध की विद्रोही चेतना, गंगा जमुनी तहजीब, नए-पुराने के बीच समन्वय और भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच समन्वय की सोच विद्यमान है.

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कुंवर नारायण: अपनी अनुपस्थिति में अधिक उपस्थित रहेंगे

हिंदी के कुछ लेखकों की भारतीयता वैश्विकता विरोध में चली गई है. कुंवर नारायण के साथ ऐसा नहीं है. वे पूर्व-पश्चिम का कोई द्वंद्व न देखते हैं, न दिखाते हैं. उनके यहां ‘कोई दूसरा नहीं’ है.