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हिंदी में छुआछूत की वही बीमारी है जो हमारे समाज में है

हिंदी दिवस पर विशेष: जितना बोझ आप बच्चों पर लाद रहे हैं डेढ़ लाख शब्दों का स्त्रीलिंग पुल्लिंग याद करने का, उतना मेहनत में बच्चा रॉकेट बना देगा.

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जब प्रेमचंद ने महात्मा गांधी का भाषण सुनकर सरकारी नौकरी छोड़ दी थी…

वह असहयोग आंदोलन का ज़माना था, प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार थे. बेहद तंगी थी, बावजूद इसके गांधी जी के भाषण के प्रभाव में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर. (फोटो: पीटीआई)

बजट 2019ः गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 50 करोड़ रुपये आवंटित

नई योजना के तहत ऐसे स्थानों पर उर्दू शिक्षकों की भी नियुक्ति की जाएगी, जहां की 25 फीसदी से अधिक आबादी उर्दू बोलती है. हालांकि, देश में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए शुरू की गई योजना के लिए इस साल बजट आवंटित नहीं किया गया.

फोटो साभार: Harish Sharma/Pixabay

सत्ता के मन में उपजे हिंदी प्रेम के पीछे राजनीति है, न कि भाषा के प्रति लगाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पहले मसौदे में हिंदी थोपने की कथित कोशिश पर मचे हंगामे को देखते हुए एक बात साफ है कि इस हो-हल्ले का हिंदी से कोई वास्ता नहीं है. हिंदी थोपने या ख़ारिज करने की इच्छा का संबंध हिंदी राष्ट्रवाद, धर्म, जाति और अंग्रेज़ी से एक असहज जुड़ाव जैसी बातों से हो सकता है, मगर इसका संबंध उस भाषा से कतई नहीं है, जिसका नाम हिंदी है.

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क्या मोदी सरकार वाकई उर्दू का भला चाहती है?

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद ने उर्दू के प्रमोशन के लिए बॉलीवुड के कलाकारों से प्रचार करवाने की बात कही. हालांकि बजट से मालामाल परिषद पर अक्सर यह इल्ज़ाम लगता रहा है कि हाल के सालों में इसने उर्दू भाषा के विकास में कोई अहम रोल अदा नहीं किया.

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क़ादिर ख़ान: जिन्हें लेकर अपनी-अपनी ग़लतफ़हमियां हैं

क़ादिर ख़ान हिंदी सिनेमा में उस पीढ़ी के आख़िरी लेखक थे, जिन्हें आम लोगों की भाषा और साहित्य की अहमियत का एहसास था. उनकी लिखी फिल्मों को देखते हुए दर्शकों को यह पता भी नहीं चलता था कि इस सहज संवाद में उन्होंने ग़ालिब जैसे शायर की मदद ली और स्क्रीनप्ले में यथार्थ के साथ शायरी वाली कल्पना का भी ख़याल रखा.

उर्दू शाहर मीर अनीस.

मीर अनीस: गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतिनिधि शायर

मीर अनीस उर्दू शायरी के उस दौर में हुए थे, जब ग़ज़लों का झंडा चहुंओर बुलंद था. उन्होंने ग़ज़लों से इतर मर्सियों की रचना का कठिन रास्ता चुना.

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वीडियो: उर्दू साहित्य और समाज में समलैंगिकता का सवाल

विशेष: उर्दू साहित्य और समाज का समलैंगिकता को लेकर रवैया क्या हमेशा से ही तंग था? भारतीय समाज और इतिहास में समलैंगिकता को लेकर बनी वर्जनाओं (टैबू) के बारे में बता रही हैं यासमीन रशीदी.

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‘ज़बान वो ख़त्म होती है जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी से न निकली हो’

वीडियो: उर्दू को अवाम तक पहुंचाने में देवनागरी और हिंदी की भूमिका, हिंदी में नुक़्ते के चलन और उर्दू के भविष्य पर विनोद दुआ से द वायर उर्दू के फ़ैयाज़ अहमद वजीह की बातचीत.

उर्दू शायर असरार जामई. (फोटो: द वायर)

‘मुझ से बड़ा शायर ना होगा जामई, हिंद-ओ-पाकिस्तान में और ना क़ब्रिस्तान में’

वीडियो: किसी ज़माने में फ़ख़्र-ए-बिहार कहे जाने वाले हास्य व्यंग्य के प्रसिद्ध उर्दू शायर असरार जामई इन दिनों दयनीय स्थिति में ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं. रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया और सरकार ने अपने रिकॉर्ड में उन्हें मृत बताकर उनका पेंशन भी बंद कर दिया.

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प्रेमचंद का ‘सूरदास’ आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है

1925 में आए प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि में किसान सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं. जो बात रंगभूमि में सूरदास ने कहने की कोशिश की थी, वही आज जब कोई किसान कह रहा है तो उसे निशाना साधकर गोली मारी जा रही है.

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प्रेमचंद को क्यों पढ़ें

प्रेमचंद की प्रासंगिकता का सवाल बेमानी जान पड़ता है, लेकिन हर दौर में उठता रहा है. अक्सर कहा जाता है कि अब भी भारत में किसान मर रहे हैं, शोषण है, इसलिए प्रेमचंद प्रासंगिक हैं. प्रेमचंद शायद ऐसी प्रासंगिकता अपनी मृत्यु के 80 साल बाद न चाहते.

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क्यों राजनीति ने उर्दू को मुसलमान बना दिया है?

आम जनमानस में उर्दू मुसलमानों की भाषा बना दी गई है, शायद यही वजह है कि रमज़ान की मुबारकबाद देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने उर्दू को चुना. सच यह है कि जम्मू कश्मीर, पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उर्दू नहीं बोली जाती.

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मंटो की कहानियां सभ्यता के गाल पर तमाचा मारती हैं

यह विडंबना है कि ज़िंदगी भर अपने लिखे हुए के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने वाला, मुफ़लिसी में जीने और समाज की नफ़रत झेलने वाला मंटो आज ख़ूब चर्चा में है. इसी मंटो ने लिखा था कि मैं ऐसे समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख़्स के किरदार को लॉन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल-धुलाकर आए.

बसपा प्रमुख मायावती. (फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश में निर्दोष दलितों-पिछड़ों को झूठे मामलों में जेल भेजा जा रहा है: मायावती

बसपा प्रमुख ने यूपीकोका का विरोध करते हुए कहा, भाजपा की द्वेषपूर्ण और जातिवादी नीति के कारण क़ानून का बड़े पैमाने पर ग़लत इस्तेमाल हो रहा है.

(फोटो साभार: फ़ेसबुक)

मैंने आज़ादी के बाद जैसा हिंदुस्तान देखा था, उसी हिंदुस्तान में मरना चाहता हूं: मुनव्वर राना

जन्मदिन विशेष: इस सियासी उथल-पुथल में एक बुजुर्ग की हैसियत से मुझे ख़ौफ़ लगता है कि कहीं हिंदुस्तान में ज़बान, तहज़ीब और मज़हब के आधार पर कई हिंदुस्तान बन जाएं. यह बहुत अफ़सोसनाक होगा.

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मैं तुम्हारी भाषा से प्यार करता हूं

हिंदी दिवस पर विशेष: हम अपनी भाषा की महानता की गाथा में दूसरी भाषाओं के प्रति एक स्पर्धाभाव ले आते हैं. यह ठीक बात नही है. इससे किसी भी भाषा को आगे बढ़ने और दूसरे भाषायी-सांस्कृतिक स्थलों पर फूलने-फलने की संभावना न्यूनतम हो जाती है.

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गुरुदत्त एक अनसुलझा क्रॉसवर्ड है, जिसमें कोई न कोई शब्द पूरा होने से रह ही जाता है

जन्मदिन विशेष: गुरुदत्त फिल्म इंडस्ट्री का एक ऐसा सूरज थे, जो बहुत कम वक़्त के लिए अपनी रौशनी लुटाकर बुझ गया पर सिल्वर स्क्रीन को कुछ यूं छू कर गया कि सब सुनहरा हो गया.

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कुलभूषण को बचाने के लिए आॅल इंडिया रेडियो की पाकिस्तानी जनता से अपील

पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव के समर्थन में एआईआर की ओर से प्रसारित कार्यक्रम में पाकिस्तानी श्रोताओं को बताया जा रहा है कि इस्लाम में मुसाफिर की हत्या करना गुनाह है.

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जन गण मन की बात: कानून की धज्जियां उड़ाते आध्यात्मिक गुरु और उर्दू भाषा, एपिसोड 35

जन गण मन की बात की 35वीं कड़ी में श्रीश्री रविशंकर और जग्गी वासुदेव के कानून की धज्जियां उड़ाते कारनामों और उर्दू भाषा पर विनोद दुआ चर्चा कर रहे हैं.

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क्यों यूपी विधानसभा में उर्दू में शपथ लेना अवैध है और संस्कृत में वैध?

संस्कृत हिंदू धर्म ग्रंथों की भाषा है, इसीलिए भाजपा का उससे कुछ अधिक ही लगाव है. यह अलग बात है कि इस भाषा की समृद्ध साहित्यिक-दार्शनिक विरासत से उसका कोई ख़ास परिचय नहीं है.