कृषि उपज

A farmer shows wheat crop damaged by unseasonal rains in his wheat field at Sisola Khurd village in the northern Indian state of Uttar Pradesh, March 24, 2015. To match Insight INDIA-MODI/ Picture taken March 24, 2015. REUTERS/Anindito Mukherjee

क़र्ज़ माफ़ी के बावजूद महाराष्ट्र में सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्या की

एनसीआरबी के मुताबिक, साल 2019 में देश भर के कुल 10,281 किसानों ने आत्महत्या की थी. इसमें से 3,927 किसान आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र के हैं. आंकड़ों के अनुसार, पिछले कई वर्षों में राज्य में हर साल 3500 से अधिक किसान अपनी जान दे देते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: रॉयटर्स)

आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं: सरकार

राज्यसभा में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने कहा कि सरकार की ओर से किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कई कार्यक्रम अमल में लाए जा रहे हैं लेकिन आत्महत्या करने वाले किसानों को मुआवजा देने का प्रावधान वर्तमान में चलाई जा रही किसी नीति में नहीं है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

साल 2016 में 11,379 किसानों ने आत्महत्या की, केंद्र ने अंतत: जारी किए आंकड़े

किसान आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र लगातार पहले स्थान पर बना हुआ है. साल 2016 में इस राज्य में सर्वाधिक 3,661 किसानों ने आत्महत्या की. इससे पहले 2014 में यहां 4,004 और 2015 में 4,291 किसानों ने आत्महत्या की थी.

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मोदी के चार साल: देश का किसान दुख और विनाश के चक्रव्यूह में फंस गया है

देश में पिछले चार वर्षों में कृषि विकास दर का औसत 1.9 प्रतिशत रहा. किसानों के लिए समर्थन मूल्य से लेकर, फसल बीमा योजना, कृषि जिंसों का निर्यात, गन्ने का बकाया भुगतान और कृषि ऋण जैसे बिंदुओं पर केंद्र सरकार पूर्णतया विफल हो गई है.

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बागपत में गन्ने के बकाया भुगतान की मांग को लेकर धरने पर बैठे किसान की मौत

कैराना लोकसभा उपचुनाव से ठीक एक दिन पहले 27 मई को बागपत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली है. लेकिन इससे पहले पांच दिन से धरने पर बैठे एक किसान की मौत हो गई है.

फोटो: पीटीआई

मोदी सरकार के कार्यकाल में किसान आत्महत्या दर में 45 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा: कांग्रेस

कांग्रेस बोली, पिछले 3 सालों में 38 हज़ार किसानों ने आत्महत्या की है. 35 किसान हर दिन आत्महत्या कर रहे हैं. सरकार ने किसानों की जगह अमीरों का क़र्ज़ माफ़ किया.

दिल्ली के संसद मार्ग पर देश भर के 184 किसान संगठनों की ओर से दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद लगाई गई. (फोटो: कृष्णकांत/द वायर)

कॉरपोरेट की क़र्ज़माफ़ी से विकास होता है, किसानों की क़र्ज़माफ़ी विकास-विरोधी है

भाषणों में पूरी राजनीति और सरकार किसानों-ग़रीबों को समर्पित है लेकिन किसान अपनी उपज समर्थन मूल्य से भी कम पर बेचने को मजबूर है.

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क़र्ज़माफ़ी को फैशन बताने वाले उपराष्ट्रपति ने कहा- नेताओं व प्रेस ने किसानों के लिए कुछ न किया

उपराष्ट्रपति ने कृषि में और अधिक सरकारी निवेश की हिमायत करते हुए कहा, किसानों की आय नहीं बढ़ी, वे कृषि छोड़ना चाहते हैं.

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जिस सरकार ने नोटबंदी की, उसी को क़र्ज़ माफ़ी का ख़र्च भी उठाना चाहिए

अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग उथली राजनीति है तो नरेंद्र मोदी का देश भर में घूम-घूम कर चुनावी सभाओं में वादा करना उथली राजनीति नहीं थी?

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यह मिथक तोड़ना ज़रूरी है कि केवल रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं से कृषि उत्पादकता बढ़ती है

दुनिया में सैकड़ों उदाहरण उपलब्ध हैं जहां महंगी रासायनिक खाद व कीटनाशकों के बिना अच्छी कृषि उत्पादकता प्राप्त की गई है.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घाटे का सौदा है

वास्तव में किसानों से उपज खरीदने वालों से व्यापार में नैतिकता की अपेक्षा भर की जाती रही. सरकार ने यह कोशिश कभी नहीं की कि किसानों को उचित कीमतें मिलें.

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क्या खेती करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता?

खेती से जुड़े किसी भी काम को अकुशल श्रम माना जाता है. क्या मिट्टी की पहचान के साथ फसल तय करने में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं होता? बीज अंकुरित होगा या नहीं, यह जांचना गैर-तकनीकी काम है? कौन से उर्वरक-खाद डालना है, कब डालना है, क्या यह विशेषज्ञता का काम नहीं है?

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व्यवस्था ‘नत्था’ से किसानी छुड़ाकर मज़दूरी कराना चाहती है

‘पीपली लाइव’ किसान और मीडिया के चित्रण के जरिये भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और उसके दुष्परिणामों की गहरी पड़ताल करता है. सिनेमा का व्यंग्यात्मक रुख राज्य और समाज के रवैये की भी पोल खोलता है.