भगत सिंह

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जिन क्रांतिकारियों के सहारे संघ गांधी पर निशाना साधता है, वे आरएसएस कैंप से नहीं आये थे

आरएसएस अगर आज़ादी की लड़ाई के बारे में बात करे तो वो क्या बताएगा? अगर वो सावरकर के बारे में बताएगा तो अंग्रेजों को लिखे गए सावरकर के माफ़ीनामे सामने आ जाते हैं.

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आज अगर लोहिया होते तो गैर-भाजपावाद का आह्वान करते

पुण्यतिथि विशेष: लोहिया ने नेहरू जैसे प्रधानमंत्री को यह कहकर निरुत्तर कर दिया था कि आम आदमी तीन आने रोज़ पर गुज़र करता है, जबकि प्रधानमंत्री पर रोज़ाना 25 हज़ार रुपये ख़र्च होते हैं.

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‘हम चाहते हैं भगत सिंह की न्यायिक हत्या के लिए ब्रितानी हुकूमत भारत और पाकिस्तान से माफी मांगे’

भगत सिंह को निर्दोष साबित करने के लिए पाकिस्तान के लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दाख़िल करने वाले भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष और वकील इम्तियाज़ राशिद क़ुरैशी से बातचीत.

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मै नास्तिक क्यों हूं?

मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा. जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बताई तो उसने कहा, ‘अपने अंतिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा. मैं इसे अपने लिए अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझता हूं. स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूंगा.’

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बटुकेश्वर दत्त: जिन्हें इस मृत्युपूजक देश ने भुला दिया क्योंकि वे आज़ादी के बाद भी ज़िंदा रहे

बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारी को आज़ादी के बाद ज़िंदगी की गाड़ी खींचने के लिए कभी एक सिगरेट कंपनी का एजेंट बनकर भटकना पड़ता है तो कभी डबलरोटी बनाने का काम करना पड़ता है.

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असें​बली में बम फेंकने के बाद अदालत में भगत ​सिंह का बयान

विशेष: साल 1929 में 8 अप्रैल को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका था. इसके बाद उन्होंने गिरफ़्तारी दी और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला. 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज लियोनॉर्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगत सिंह का ऐतिहासिक बयान…

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‘जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर संभालनी है, उन्हें अक़्ल का अंधा बनाया जा रहा है’

विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?

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सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज

धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं. न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सबको मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता.

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भगत सिंह और सावरकर: दो याचिकाएं जो हिंद और हिंदुत्व का अंतर बताती हैं

भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि उनके फांसी देने की जगह गोलियों से भून दिया जाए. सावरकर ने अपील की उन्हें छोड़ दिया जाए तो आजीवन क्रांति से किनारा कर लेंगे.