मणिपुर विधानसभा चुनाव

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इरोम शर्मिला की हार हम सबकी हार है

जब तक इरोम अनशन कर रही थीं, वे मणिपुरी जनता के लिए ‘आइकॉन’ थीं, संघर्ष का प्रतीक थीं, मणिपुर क्या, देश भर के लोग उन्हें ‘हीरो’ मानते थे, पर नायक तो वोट नहीं मांगते! ये कुछ उस तरह था कि भगवान ज़मीन पर आ जाएं, शादी करके आम ज़िंदगी बिताना चाहें या अपने लिए चुनाव में वोट मांगें. उनके ऐसा करते ही उनके भक्त घबरा जाते हैं.

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गोवा और मणिपुर में राज्यपालों का फैसला सही

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का मानना है कि गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के बजाय भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना संविधान सम्मत है. राज्यपाल अपने विवेक से किसी भी पार्टी को न्यौता दे सकता है.

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इरोम को इसलिए 90 वोट मिले क्योंकि मणिपुर में अब आफ्सपा मुद्दा नहीं रहा!

आफ्स्पा के ख़िलाफ़ जब इरोम की लड़ाई शुरू हुई तब मणिपुर के हालात अलग तरह के थे. 16 साल पहले का मणिपुर अब काफी बदल चुका है.

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वीडियो: मणिपुर की ‘आयरन लेडी’ इरोम शर्मिला के सफ़र पर एक नज़र

16 साल तक आफ्सपा के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर रहीं इरोम चानू शर्मिला अब इस क़ानून से लड़ने के लिए चुनाव के मैदान में हैं

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मणिपुर: जहां आठ लाशें विधानसभा चुनाव में मुद्दा हैं

मणिपुर के चूराचांदपुर के जिला अस्पताल के मुर्दाघर में पिछले करीब 550 दिनों से आठ लाशें दफनाए जाने का इंतजार कर रही हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा है.

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वीडियो : मिलिए मणिपुर में चुनाव लड़ने वाली पहली मुस्लिम महिला नजिमा बीबी से

नजिमा के चुनाव लड़ने के ख़िलाफ़ स्थानीय धर्मगुरु फ़तवा जारी कर चुके हैं. वे इरोम शर्मिला की पार्टी ‘पीपुल्स रीसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस’ के टिकट पर इम्फाल घाटी की वाबगई सीट से चुनाव लड़ रही हैं.