मनरेगा

(फोटो: पीटीआई)

केरल में पहली बार पंचायत चुनाव में मनरेगा कामगारों ने सैकड़ों की संख्या में बाज़ी मारी

आधिकारिक डेटा के अनुसार, राज्य के पंचायत चुनाव में 15,961 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है, जिसमें 2,007 मनरेगा मज़दूर हैं. इनमें से 1,863 महिलाएं हैं.

बस्सीपट्टी में चुनाव को लेकर चौक-चौराहे पर होने वाली बहसों में पलायन कोई मुद्दा नहीं है. (सभी फोटो: हेमंत कुमार पांडेय)

बिहार चुनाव: पलायन से प्रभावित गांव में न सरकार से नाराज़गी है, न ही कोई उम्मीद

ग्राउंड रिपोर्ट: आजीविका की तलाश में राज्य से पलायन की जिस बात को बिहार में चुनावी मुद्दा बताया जा रहा है, उसे मधुबनी ज़िले के बस्सीपट्टी गांव के लोग अपनी नियति मानकर स्वीकार कर चुके हैं.

अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रचार करते संजय साहनी. (सभी फोटो: उमेश कुमार राय)

बिहार: सियासी चेहरों के बीच चुनावी मैदान में उतरा एक मनरेगा मज़दूर

ग्राउंड रिपोर्ट: मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के रत्नौली गांव के रहने वाले 33 वर्षीय संजय साहनी कुढ़नी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार हैं. सातवीं तक पढ़े संजय लंबे समय तक प्रवासी कामगार के बतौर दिल्ली में रहे हैं और अब मनरेगा के तहत मज़दूरी करते हुए आसपास के गांवों में मनरेगा के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए जाने जाते हैं.

Migrant workers, who work in textile looms, are seen outside a loom after it was shut due to the 21-day nationwide lockdown to slow the spread of the coronavirus disease, in Bhiwandi on the outskirts of Mumbai, India, April 1, 2020. Photo: Reuters/Francis Mascarenhas/Files

अप्रैल से लेकर अब तक 83 लाख से अधिक नए मनरेगा कार्ड जारी, सात सालों में सर्वाधिक बढ़ोतरी: रिपोर्ट

वित्त वर्ष 2020-21 में एक अप्रैल से तीन सितंबर तक 83.02 लाख नए मनरेगा कार्ड जारी किए गए हैं, जो वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में 28.32 फीसदी अधिक है. 2019-20 में सिर्फ़ 64.70 लाख नए मनरेगा कार्ड जारी किए गए थे.

(फोटो: पीटीआई)

कोविड संकट: मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी आठ साल के निम्नतम स्तर पर

मनरेगा पोर्टल पर 24 अगस्त तक तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2013-2014 के बाद से मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी सबसे निचले स्तर पर आ गई है.

Kokrajhar Assam

असम: ग़रीबी और काम न मिलने से परेशान प्रवासी मज़दूर ने अपनी नवजात बच्ची को बेचा

मामला कोकराझार ज़िले का है. लॉकडाउन के दौरान गुजरात लौटे एक मज़दूर ने आर्थिक तंगी और काम न मिलने से परेशान होकर अपनी 15 दिन की बच्ची को 45 हज़ार रुपये में बेच दिया. पुलिस ने मज़दूर और बच्ची खरीदने वाली महिलाओं को गिरफ़्तार कर लिया है.

(फोटो साभार: indiarailinfo)

बांदा: लॉकडाउन में मुंबई से लौटे मज़दूर ने कथित तौर पर काम न मिलने से की आत्महत्या

उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले के इंगुआ गांव का मामला. मृतक के भाई ने बताया कि मुंबई से लौटने के बाद गांव में उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा था, जिस वजह से वह आर्थिक रूप से परेशान थे.

New Delhi: People buy clothes from a roadside garment shop at Lajpat Nagar Central Market after authorities eased restrictions, during the ongoing COVID-19 nationwide lockdown, in New Delhi, Tuesday, June 2, 2020. (PTI Photo/Manvender Vashist)(PTI02-06-2020_000237B)

लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार के नरेंद्र मोदी के दावे में दम नहीं है

अगले छह महीनों में विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था में अधिक तेज़ी से होने वाले जिस सुधार को लेकर प्रधानमंत्री इतने आश्वस्त हैं, वह भारी-भरकम सरकारी ख़र्च के बिना असंभव लगता है. अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान पहुंचाया जा चुका है कि सुधार की कोई कार्य योजना पेश करने से पहले गंभीरता से इसका अध्ययन करना ज़रूरी है.

Bihar Mushar Story

बिहार: कोरोना संकट में बढ़ गई हैं मुसहर समाज की मुश्किलें

लॉकडाउन के समय काम न होने से निम्न आर्थिक वर्ग के लोगों के पास न पैसा है न ही कमाई का अन्य कोई साधन. बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िले के बासमनपुर पंचायत के मुसहर टोले का हाल भी यही है. यहां के रहवासियों का कहना है कि रोजी-रोटी नहीं है और अब भुखमरी जैसे हालात बन रहे हैं.

(फोटो साभार: UN Women/Gaganjit Singh/Flickr CC BY-NC-ND 2.0)

2019-20 में 5.47 करोड़ परिवारों ने मनरेगा के तहत काम मांगा, पिछले नौ सालों में सर्वाधिक

मनरेगा के तहत काम मांगने वालों बढ़ती संख्या ये दर्शाता है कि ग्राम पंचायत ज़्यादा से ज़्यादा बेरोज़गारों को काम दे रहे हैं.

निर्मला सीतारमण. (फोटो: पीटीआई)

कोरोना राहत पैकेज: क्या वित्तमंत्री ने मनरेगा मज़दूरों के साथ धोखा किया है?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते कोरोना राहत पैकेज की घोषणा करते हुए मनरेगा मज़दूरी में वृद्धि की बात कही. हालांकि यह एक रूटीन वार्षिक कवायद थी, जिसे पहले ही ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया था.

(फोटो: रॉयटर्स)

कोरोना से निपटने के सरकार के कदम ग़रीब-विरोधी हैं

सरकार द्वारा ग़रीबों की मदद के नाम पर स्वास्थ्य संबंधी मामूली घोषणाएं की गई हैं. हमें नहीं पता अगर कोई ग़रीब कोरोना से संक्रमित हुआ तो उसे उचित स्वास्थ्य सुविधा मिल सकेगी. अगर अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आई तो बेड और वेंटिलिटर जैसी सुविधाएं मिलेंगी?

Ghaziabad: Migrant labourers made to sit under a flyover on the Hapur Road at a safe social distance by the district administration, during complete lockdown in the view coronavirus pandemic, in Ghaziabad, Thursday, March 26, 2020. (PTI Photo/Arun Sharma)

कोरोना लॉकडाउन: ग़रीब और कमज़ोर तबके की मदद के लिए क्या उपाय किया जा सकते हैं

देशभर में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन से उत्पन्न आर्थिक स्थितियां उन लोगों को बुरी तरह प्रभावित करेंगी, जो इस महामारी से तो शायद बच जाएंगे, लेकिन रोज़मर्रा की आवश्यक ज़रूरतों का पूरा न होना उनके लिए अलग मुश्किलें खड़ी करेगा.

People waiting to buy medicine during the 21-day nationwide lockdown, in Kolkata, on March 26, 2020. (Photo: Reuters)

60 से अधिक उम्र के केंद्रीय स्वास्थ्य योजना के लाभार्थियों के घर पर दवाएं पहुंचाने का आदेश

कोरोना वायरस के मद्देनज़र देश में लागू लॉकडाउन के चलते ज़रूरी दवाओं की भी घर पर आपूर्ति की अनुमति दी गई है. सरकारी आदेश के अनुसार, ऐसी दवाएं जिन्हें लोगों के घरों तक पहुंचाया जाएगा, उन्हें किसी योग्य डॉक्टर के पर्चे के बिना नहीं ख़रीदा जा सकेगा.

केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की मुरैना लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार नरेंद्र सिंह तोमर. (फोटो साभार: फेसबुक)

सरकार मनरेगा को हमेशा चलाए रखने की पक्षधर नहीं: ग्रामीण विकास मंत्री

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सदन में कहा कि मनरेगा गरीबों के लिए है और मोदी सरकार का लक्ष्य गरीबी को ख़त्म करना है. गरीबी दूर करने के लिए सरकार प्रयास कर रही है.