मुख्य न्यायाधीश

जजों की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए कोर्ट ने केंद्र को दी समयसीमा, कहा- अदालतों की स्थिति ख़राब

सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने के लिए समयसीमा पर ज़ोर देते हुए ऐसे उच्च न्यायालयों को लेकर चिंता व्यक्त की, जहां न्यायाधीशों के 40-50 प्रतिशत पद रिक्त हैं. कोर्ट ने कहा कि अगर कॉलेजियम अपनी सिफ़ारिशों को सर्वसम्मति से दोहराता है तो केंद्र को तीन-चार सप्ताह के भीतर न्यायाधीशों की नियुक्ति कर देनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कॉलेजियम के भेजे नामों को मंज़ूरी देने की समयसीमा बताने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वे एक तर्कसंगत समयसीमा बताए जिसके अंदर वे शीर्ष अदालत के कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति के लिए की गई सिफ़ारिशों पर कार्रवाई कर सकता है. कोर्ट ने यह भी पूछा कि उसके कॉलेजियम द्वारा भेजे गए दस नाम, जो सरकार के पास डेढ़ साल से लंबित हैं, को कब तक मंज़ूरी मिलने की उम्मीद की जा सकती है.

महिला वकीलों को नियमित भेदभाव और लैंगिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है: जस्टिस गीता मित्तल

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल ने कहा महिलाओं के सामने एक बैरियर है, जो हमेशा उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है. इस बैरियर के नीचे तो वे प्रमोशन पा जाती हैं, लेकिन इसके उस पार उन्हें प्रमोशन नहीं मिलता है. उन्होंने कहा कि भारत में हाईकोर्ट के मौजूदा 673 जजों में से सिर्फ़ 73 महिलाएं हैं. देश के 28 हाईकोर्ट में से सिर्फ़ वह एकमात्र मुख्य न्यायाधीश हैं.

लोकतंत्र बचा सकने वाली अकेली संस्था ही इसका गला घोंटने में मदद कर रही है

भारत में अक्सर न्यायिक आज़ादी के रास्ते में कार्यपालिका और कभी-कभी विधायिका द्वारा बाधा डालने की संभावनाएं देखी जाती हैं, लेकिन जब न्यायपालिका के भीतर के लोग ही अन्य शाखाओं के सामने झुक जाते हैं, तो स्थिति बिल्कुल अलग हो जाती है.

जस्टिस अरुण मिश्रा के न्यायिक परंपराओं की अनदेखी की वजह उनका रूढ़िवादी नज़रिया है

जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा प्रार्थनास्थलों पर सरकार की नीति, अश्लीलता और लैंगिक न्याय को लेकर दिए गए फ़ैसले क़ानूनी पहलुओं से ज़्यादा उनके निजी मूल्यों पर आधारित नज़र आते हैं.

जस्टिस अरुण मिश्रा के सुप्रीम कोर्ट के सबसे प्रभावशाली जज बनने की कहानी

भारत के राजनीतिक तौर पर सर्वाधिक संवेदनशील मामलों को अनिवार्य रूप से जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ को ही भेजा जाता था और देश के सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम जज इसकी वजह जानने के लिए इतिहास में पहली बार मीडिया के सामने आए थे.

मुकदमे से पहले अनिवार्य मध्यस्थता वाले कानून के लिए यह उपयुक्त समय है: सीजेआई

सीजेआई एसए बोबडे ने कहा कि वैश्विक समुदाय के एक अभिन्न सदस्य तथा व्यापार और निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण होने के नाते भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में किस तरह से शामिल होता है इसका सीमा पार अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्य और निवेश के प्रवाह पर महत्वपूर्ण प्रभाव होता है.

विश्वविद्यालयों को किसी उत्पादन इकाई की तरह काम नहीं करना चाहिए: सीजेआई बोबडे

सीजेआई शरद अरविंद बोबडे ने राष्ट्रसंत तुकादोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के 107वें दीक्षांत समारोह में कहा कि नागरिकता सिर्फ लोगों के अधिकारों के बारे में ही नहीं बल्कि समाज के प्रति उनके कर्तव्यों के बारे में भी है.

सीजेआई बोबडे अयोध्या, निजता के अधिकार सहित ऐतिहासिक फैसलों में रहे शामिल

जस्टिस बोबडे रविवार को सेवानिवृत्त हुए जस्टिस रंजन गोगोई का स्थान लेंगे. मुख्य न्यायाधीश के रूप में बोबडे का कार्यकाल करीब 17 महीने का होगा और वह 23 अप्रैल 2021 को सेवानिवृत्त होंगे.

जस्टिस एसए बोबडे ने भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली

एसए बोबडे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रह चुके हैं. वह कई महत्वपूर्ण पीठों का हिस्सा रहे हैं. इसके अलावा मुंबई में महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और नागपुर में महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वह चांसलर भी हैं.

आरटीआई के तहत मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आने से जुड़े मामले का घटनाक्रम

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने एकमत होकर ये फैसला दिया और साल 2010 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें कोर्ट ने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई एक्ट के दायरे में है.

मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का चौतरफा स्वागत

आरटीआई कार्यकर्ताओं ने शीर्ष न्यायालय के इस फैसले की सराहना की और साथ ही कहा कि ‘कानून से ऊपर कोई नहीं है.’

जज कानून से ऊपर नहीं हैं, न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए: जस्टिस चंद्रचूड़

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि ऐसा करने से नियुक्ति प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बढ़ेगा और फैसले लेने में न्यायपालिका एवं सरकार के सभी स्तरों पर उच्च स्तर की पारदर्शिता और जवाबदेही तय हो सकेगी.

आरटीआई के दायरे में आया सीजेआई कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया

दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2010 में अपने फैसले में शीर्ष अदालत की इस दलील को खारिज कर दिया था कि सीजेआई कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाए जाने से न्यायिक स्वतंत्रता बाधित होगी.

कॉलेजियम में पर्याप्त पारदर्शिता, इसकी चर्चाओं का खुलासा करने की जरूरत नहीं: भावी सीजेआई बोबडे

देश के अगले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने यह भी कहा कि सरकार जजों की नियुक्ति में देरी नहीं कर रही है. उन्होंने कहा कि किसी मामले की सुनवाई से हटने के संबंध में जज को कोई कारण बताने की जरूरत नहीं है.