राष्ट्रवाद

रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व: संघ की संरचना और तौर-तरीकों की पड़ताल

पुस्तक समीक्षा: पढ़े-लिखे शहरियों और लेफ्ट-लिबरल तबकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर जो धारणा रही है वह यह है कि संघ बहुत ही पिछड़ा संगठन है. बद्री नारायण की किताब ‘रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व: हाउ द संघ इज़ रिशेपिंग इंडियन डेमोक्रेसी’ दिखाती है कि संघ ने इसके उलट बड़ी मेहनत से अपनी छवि तैयार की है.

भगत सिंह की हंसी के वारिस

भगत सिंह की पवित्र भूमि, उनका स्वर्ग भारत आज उन्हीं की परिभाषा के मुताबिक नर्क बना दिया गया है. उसे नर्क बना देने वाली ताकतें ही भारत की मालिक बन बैठी हैं. भगत के धर्म को मानने वाले क़ैद में हैं, उन्हीं की तरह. और भगत सिंह की तरह ही उनसे उनकी हंसी छीनी नहीं जा सकी है.

आज धूमिल जीवित होते तो देशद्रोही के ख़िताब से ज़रूर नवाज़े गए होते…

जन्मदिन विशेष: जिस धूमिल ने देश की व्यवस्था की कमज़ोरियों और नागरिकों से उसकी दूरी को इतना ‘नंगा’ किया, आज उस देश में धूमिल जैसे स्वर के लिए कितनी जगह बची है?

‘रिलीजियस नेशनलिज़्म’ देश की विभाजनकारी राजनीति की पड़ताल की एक कोशिश है

पुस्तक समीक्षा: विश्लेषकों की निगाह में भारत अधिनायकवाद के स्याह गर्त में जाता दिख रहा है और विभाजक राजनीति के लगातार वैधता हासिल करने को लेकर चिंता की लकीरें बढ़ रही हैं. प्रख्यात शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता राम पुनियानी की नई किताब इस बहस में एक नया आयाम जोड़ती है.

दिनकर: कोप से आकुल जनता का कवि

पिछले पांच-छह सालों में दिनकर का कीर्तन वैसे लोगों ने किया है, जिन्हें शायद वे अपनी चौखट न लांघने देते. उनकी ओजस्विता से इस भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिए कि वे हुंकारवादी राष्ट्रवाद के प्रवक्ता थे. वे राष्ट्रवादी थे, लेकिन ऐसा राष्ट्रवादी जो अपने राष्ट्र को नित नया हासिल करता था और कृतज्ञ होता था.

राम, रफाल और राष्ट्रवाद की अफीम

वीडियो: रफाल विमान की भारत में लैंडिंग हो चुकी है. हर अख़बार और न्यूज़ चैनल पर यही छाया हुआ है, वहीं दूसरी ओर देश में कोरोना और बाढ़ से हालात नाज़ुक बने हुए हैं. इस बारे में द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु, वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला और द वायर की सीनियर एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी की चर्चा.

सीबीएसई ने 11वीं कक्षा के पाठ्यक्रम से नागरिकता, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता के पाठ हटाए

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देशों के आधार पर ये फ़ैसला लिया गया है. मंत्रालय ने कहा है कि कोविड-19 संकट के बीच छात्रों पर से पढ़ाई का बोझ कम करने के लिए 9वीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक के पाठ्यक्रम को 30 प्रतिशत तक कम करने का निर्णय लिया गया है.

सरकार कह रही है कि यह राजनीति का समय नहीं, लेकिन वह ख़ुद क्या कर रही है

मुख्य विपक्षी दल के सवाल करने को उसकी क्षुद्रता बताया जा रहा है. 20 सैनिकों के मारे जाने के बाद कहा गया कि बिहार रेजीमेंट के जवानों ने शहादत दी, यह बिहार के लोगों के लिए गर्व की बात है. अन्य राज्यों के जवान भी मारे गए, उनका नाम अलग से क्यों नहीं? सिर्फ बिहार का नाम क्यों? क्या यह क्षुद्रता नहीं?

5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सवाल ही नहीं है: पूर्व आरबीआई गवर्नर सी. रंगराजन

गुजरात के अहमदाबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रंगराजन ने कहा कि विकसित देश की परिभाषा ऐसे देश से है जिसकी प्रति व्यक्ति आय 12,000 डॉलर सालाना हो. अगर हम नौ फीसदी की दर से विकास करे तब भी इसे हासिल करने में 22 साल लगेंगे.

दुर्गा पूजा में राम की जयकार के क्या मायने हैं?

दुर्गा अब राष्ट्रवाद की गुलाम बना ली गई हैं. फिर उनसे वही काम लिया जा रहा है, जो कभी डरपोक-कपटी देवताओं ने उनकी आड़ में महिषासुर पर वार करके लिया था. अब दुर्गा की आड़ में आक्रमण मुसलमानों पर किया जा रहा है और हम, जो खुद को दुर्गा का भक्त कहते हैं, यह होने दे रहे हैं.

हरियाणा: उमर खालिद पर गोली चलाने वाले शख़्स को शिवसेना ने दिया टिकट

13 अगस्त 2018 को छात्र नेता उमर खालिद पर दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के बाहर दो लोगों ने हमला किया था. इनमें से एक नवीन दलाल को शिवसेना ने बहादुरगढ़ विधानसभा सीट से टिकट दिया है.

गांधी की 150वीं जयंती पर राजद्रोह क़ानून को ख़त्म करना उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी

ब्रिटिश राज में बने राजद्रोह क़ानून को सरकारों द्वारा अक्सर आज़ाद अभिव्यक्ति रखने वालों या सत्ता के विरुद्ध बोलने वालों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया गया है.

अभी गांधी की बात करना क्यों ज़रूरी है?

आज हमारे सामने ऐसे नेता हैं जो केवल तीन काम करते हैं: वे भाषण देते हैं, उसके बाद भाषण देते हैं और फिर भाषण देते हैं. सार्वजनिक राजनीति से करनी और कथनी में केवल कथनी बची है. गांधी उस कथनी को करनी में तब्दील करने के लिए ज़रूरी हैं.

भगत सिंह को गांधी या नेहरू का विकल्प बताना भगत सिंह के साथ अन्याय करना है

ऐसा लगता है कि भगत सिंह के प्रति श्रद्धा वास्तव में गांधी-नेहरू से घृणा का दूसरा नाम है. जिनके वैचारिक पूर्वज ख़ुद को बचाते हुए अपने अनुयाइयों को भगत सिंह से दूर रहने की सलाह देते हुए दिन गुज़ारते रहे, उन्होंने अपनी कायर हिंसा को उचित ठहराने के लिए आज भगत सिंह को एक ढाल बना लिया है.