साहित्य

प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – अवसान: 08 अक्टूबर 1936) (फोटो साभार: रेख्ता डॉट ओआरजी)

प्रेमचंद के विचारों को उनके जन्म के सौ साल बाद याद करने की ज़रूरत क्यों है…

विशेष: प्रेमचंद अगर आज के हालात, ख़ासकर तथाकथित संस्कृति बचाने वालों को देखते, तो शायद अवसाद में चले जाते. उन्हें संस्कृति राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धि के लिए इस्तेमाल होने वाला महज़ साधन लगती थी और उनके अनुसार यही तथाकथित संस्कृति, सांप्रदायिकता को भी स्वार्थ पूरे करने के अवसर देती थी.

गिरीश कर्नाड. [जन्म- 1938- अवसान- 2019] (फोटो साभार: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस)

गिरीश कर्नाड: जिसने कल्पना और मिथकीय संसार के मोती के साथ वर्तमान को पिरोया

गिरीश कर्नाड के नाटकों में बेहद सुंदर संतुलन देखने को मिलता है, जहां वह भारत के तथाकथित स्वर्णिम अतीत या पौराणिक मिथक को कच्चे माल की तरह उपयोग तो करते हैं, पर उसके मूल में कोई समसामयिक समस्या या वर्तमान समाज के विरोधाभास ही निहित रहते हैं.

गुलज़ार देहलवी. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

कोरोना से ठीक होने के पांच दिन बाद उर्दू शायर गुलज़ार देहलवी का निधन

पुरानी दिल्ली के गली कश्मीरियां में 1926 में जन्मे गुलज़ार देहलवी भारत सरकार द्वारा 1975 में प्रकाशित पहली उर्दू विज्ञान पत्रिका ‘साइंस की दुनिया’ के संपादक भी रह चुके थे.

उर्दू लेखक मुज्तबा हुसैन. (फोटो साभार: mujtabahussain.com)

मशहूर उर्दू लेखक मुज्तबा हुसैन का निधन

व्यंग्य लेखन के लिए चर्चित मुज्तबा हुसैन ने दर्जनों किताबें लिखी थीं, जो विभिन्न राज्यों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं. उर्दू साहित्य में योगदान के लिए साल 2007 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. यह सम्मान पाने वाले वे पहले उर्दू व्यंग्यकार थे.

प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स

लॉकडाउन: अगर सच में कुछ जानना या पढ़ना है तो यह किताब बंद कर देने का समय है

इस लॉकडाउन को इतने भर के लिए दर्ज नहीं किया जा सकता कि लोगों ने किचन में क्या नया बनाना सीखा, कौन-सी नई फिल्म-वेब सीरीज़ देखीं या कितनी किताबें पढ़ीं. यह दौर भारतीय समाज के कई छिलके उतारकर दिखा रहा है, ज़रूरत है कि आपकी नज़र कहां है?

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‘शर्मिष्ठा सिर्फ़ सिंगल मदर का संघर्ष नहीं स्वाभिमानी औरत की कहानी भी है’

वीडियो: युवा कथाकार अणुशक्ति सिंह का पहला उपन्यास ‘शर्मिष्ठा’ बीते दिनों आया है. इस उपन्यास के मद्देनज़र उनसे मिथकीय और पौराणिक चरित्रों में स्त्री की मौजूदगी, सिंगल मांओं के संघर्ष, स्त्री-पुरुष के कथित वैध और अवैध प्रेम समेत विभिन्न विषयों पर फ़ैयाज़ अहमद वजीह की बातचीत.

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रेणु नहीं हैं, मेरे लिए यह अब भी अख़बारी अफ़वाह है: निर्मल वर्मा

आज उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मदिन है. ये मार्मिक संस्मरण कहानीकार निर्मल वर्मा ने उन्हें याद करते हुए लिखा था. इसे रेणु की पुस्तक ‘ऋणजल धनजल’ में शामिल किया गया है.

Mohammad Anas Qureshi, 20, who is a fruit vendor, poses for photo with the national flag of India in front of riot police during a protest against a new citizenship law in Delhi, India, December 19, 2019. Danish Siddiqui, Reuters

सीएए विरोधी जनांदोलन से पैदा हो रहे गीत और कविताएं प्रतिरोध की नई इबारत लिख रहे हैं

नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन के मद्देनज़र लिखी गईं कविताएं युवाओं के बीच कविता की लोकप्रियता के प्रति उम्मीद तो जगाती ही हैं, साथ ही इन्होंने युवाओं को सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों के प्रति भी सचेत किया है.

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पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार गिरिराज किशोर का निधन

गिरिराज किशोर द्वारा लिखा गया ‘पहला गिरमिटिया’ नामक उपन्यास महात्मा गांधी के अफ्रीका प्रवास पर आधारित था, जिसने इन्हें विशेष पहचान दिलाई.

कृष्ण बलदेव वैद (जन्म: 27 जुलाई 1927 - अवसान: 06 फरवरी  2020) [फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन]

साहित्य अकादमी सम्मानित साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद का निधन

अपनी रचनाओं में मौलिक भाषाई प्रयोगों के लिए चर्चित वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद का अमेरिका के न्यूयॉर्क में गुरुवार को निधन हो गया. हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाले वैद आधुनिक गद्य साहित्य के महत्वपूर्ण लेखकों में शुमार थे.

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गोवा: साहित्य अकादमी विजेता की किताब को अश्लील बताते हुए सरकार ने पाबंदी लगाई

गोवा कोंकणी अकादमी की एक समिति ने कोंकणी कवि निलबा खांडेकर की किताब ‘द वर्ड्स’ की कविता ‘गैंगरेप’ के दो शब्दों पर आपत्ति जताते हुए इसकी बिक्री और प्रसार पर रोक लगा दी है. इसी कविता के लिए खांडेकर को 2019 में साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया था.