Democracy

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़. (फोटो: पीटीआई)

असहमति या विरोध को एंटी नेशनल बताना लोकतंत्र के मूल विचार पर चोट: जस्टिस चंद्रचूड़

अहमदाबाद में हुए एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि असहमति पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल डर की भावना पैदा करता है जो क़ानून के शासन का उल्लंघन है.

New Delihi: An elderly protestor holds a picture of Mahatma Gandhi during a protest against the new Citizenship Act, outside the Jamia Millia Islamia University in New Delhi, Friday, Jan. 3, 2020. (PTI Photo) (PTI1 3 2020 000190B)

‘बापू! आज की सरकार जिन्ना को सच्चा और आपकी धारणाओं को मिथ्या क़रार देने पर आमादा है’

भारत जैसे समृद्ध देश में जहां सभी धर्मों के लोग सम्मान से रहते हैं और आपके द्वारा प्रेरित हमारा संविधान सबको बराबरी का हक़ देता हैं. यहां धर्म के आधार पर शरणार्थियों में विभेद हो रहा है और नागरिकता प्रदान करने में संकीर्ण दायरे से धार्मिक आधार को देखा जाने लगा है बापू! इस नए क़ानून के बाद आपके सहयात्रियों द्वारा गढ़ी गई संविधान की प्रस्तावना बेगानी सी लग रही है.

New Delhi: Former president Pranab Mukherjee (R) speaks as Chief Election Commissioner Sunil Arora looks on, during the first 'Sukumar Sen Memorial Lecture series', as part of tribute to India's first Chief Election Commissioner, at Pravasi Bhartiya Kendra in New Delhi, Thursday, Jan. 23, 2020. (PTI Photo/Kamal Kishore)(PTI1_23_2020_000211B)

आंदोलनों की लहर लोकतंत्र की जड़ों को और मज़बूत बनाएगी: प्रणब मुखर्जी

देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन की याद में आयोजित व्याख्यान के दौरान पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र समय की कसौटी पर हर बार खरा उतरा है.

Mumbai: Bollywood actor Saif Ali Khan attends the ‘GQ Men of the Year Awards’, in Mumbai, Thursday, September 27, 2018. (PTI Photo)(PTI9_28_2018_000049B)

देश के मौजूदा हालात देखकर लगता है कि हम सेकुलरिज़्म से दूर जा रहे हैं: सैफ़ अली ख़ान

अपनी हालिया फिल्म तानाजी को लेकर अभिनेता सैफ़ अली ख़ान ने कहा कि एक अभिनेता के रूप में फिल्म में उनका किरदार बहुत अच्छा है, लेकिन फिल्म में जो दिखाया गया है, वो इतिहास नहीं है. अंग्रेज़ों के आने से पहले ‘इंडिया’ का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का ‘हम देखेंगे’ मज़हब का नहीं अवामी इंक़लाब का तराना है…

जो लोग ‘हम देखेंगे’ को हिंदू विरोधी कह रहे हैं, वो ईश्वर की पूजा करने वाले ‘बुत-परस्त’ नहीं, सियासत को पूजने वाले ‘बुत-परस्त’ हैं.

मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय (फोटो: पीटीआई)

सीएबी के विरोध पर बोले मेघालय के राज्यपाल- लोकतंत्र न चाहने वाले विभाजनकारी उत्तर कोरिया जाएं

मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय ने कहा कि विवाद के मौजूदा माहौल में दो बातों को कभी नहीं भूलना चाहिए. पहली, देश को कभी धर्म के नाम पर विभाजित किया गया था. दूसरी, लोकतंत्र अनिवार्य रूप से विभाजनकारी है. अगर आप इसे नहीं चाहते तो उत्तर कोरिया चले जाइए.

Karnataka IAS S Senthil Photo twitter

कर्नाटक के आईएएस अधिकारी का इस्तीफ़ा, कहा- लोकतंत्र से समझौता किया जा रहा है

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ ज़िले के डिप्टी कमिश्नर शशिकांत सेंथिल ने कहा कि ऐसे समय में जब अभूतपूर्व तरीके से लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे से समझौता किया जा रहा है, ऐसे में उनका प्रशासनिक कर्मचारी के बतौर सरकार में बने रहना अनैतिक होगा.

Security personnel stands guard during restrictions, in Srinagar. PTI

विरोध करना कब से लोकतंत्र और देश विरोधी हो गया?

हॉन्ग कॉन्ग और कश्मीर दोनों ही इस समय इतिहास के एक जैसे दौर से गुजर रहे हैं; दोनों की स्वायत्तता के नाम पर की गई संधि खतरे में है और उनसे संधि करने वाले देशों की सरकार इन संधियों से मुकर रही हैं.

Indian Flag Flickr

आज़ादी के 72वें साल में लोकतंत्र पर भीड़तंत्र हावी हो गया

एक सोची-समझी साज़िश के तहत जनता को एक बिना सोच-समझ वाली भीड़ में बदल दिया गया है. अब ऐसी भीड़ देश के हर क़स्बे -गांव में घूम रही है, जो एक इशारे पर किसी को भी पीट-पीटकर मार डालने को तैयार है.

(फोटो: पीटीआई)

‘हमें आज़ादी तो मिल गई है पर पता नहीं कि उसका करना क्या है’

आज़ादी के 72 साल: हमारी हालत अब भी उस पक्षी जैसी है, जो लंबी कैद के बाद पिंजरे में से आज़ाद तो हो गया हो, पर उसे नहीं पता कि इस आज़ादी का करना क्या है. उसके पास पंख हैं पर ये सिर्फ उस सीमा में ही रहना चाहता है जो उसके लिए निर्धारित की गई है.

Indian tribal people sit at a relief camp in Dharbaguda in Chhattisgarh. File Photo Reuters

लोकतंत्र और आज़ादी के असल मायने आदिवासी समाज से सीखने होंगे

विश्व आदिवासी दिवस: आदिवासियों की अपनी बोलचाल की भाषा और आम चर्चा में लोकतंत्र या आज़ादी शब्द का कोई स्थान नहीं है. किसी आदिवासी से इन शब्दों के बारे में पूछें तो वो शायद चुप रहे, लेकिन इसके असली मायने का एहसास उन्हें स्वाभाविक रूप से है.

Indira Collage

आपातकाल: नसबंदी से मौत की ख़बरें न छापी जाएं

आपातकाल के 44 साल बाद इन सेंसर-आदेशों को पढ़ने पर उस डरावने माहौल का अंदाज़ा लगता है जिसमें पत्रकारों को काम करना पड़ा था, अख़बारों पर कैसा अंकुश था और कैसी-कैसी ख़बरें रोकी जाती थीं.

13th may thumbnail-min

द वायर बुलेटिन: एक महीने में टीवी चैनलों ने नरेंद्र मोदी को 722 घंटे दिखाया, जबकि राहुल गांधी को सिर्फ़ 251 ​घंटे

जम्मू कश्मीर के बांदीपोरा में तीन साल की बच्ची से बलात्कार के बाद विरोध प्रदर्शन समेत दिनभर की महत्वपूर्ण ख़बरों का अपडेट.

Kandhamaal: An elderly voter show her finger marked with indelible ink at Adabadi polling booth during the second phase of Lok Sabha elections in Kandhamaal, Thursday, April 18, 2019. PTI Photos

साल 2019 के लोकसभा चुनाव क्यों भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं

वीडियो: ये लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं, बता रहे हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद और द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन.

AKI ground report.00_32_17_16.Still002 (1)

नफ़रत की राजनीति और घुटनों पर झुका लोकतंत्र

असम में कथित तौर पर गोमांस बेचने के शक़ में भीड़ द्वारा एक मुस्लिम बुजुर्ग के साथ मारपीट किए जाने की घटना पर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी का नज़रिया.

हनुमानगढ़ी अयोध्या (फोटो साभार: फेसबुक/@HanumanGarhi.Ayodhya)

क्यों राम जन्मभूमि की रट लगाने वाली जमातें अयोध्या की हनुमानगढ़ी का नाम नहीं लेतीं?

अयोध्या की ऐतिहासिक हनुमानगढ़ी ने आज़ादी के पहले से ही अपनी व्यवस्था में लोकतंत्र और चुनाव का ऐसा अनूठा और देश का संभवतः पहला प्रयोग कर रखा है, जिसका ज़िक्र तक करना सांप्रदायिक घृणा की राजनीति करने वालों को रास नहीं आता.

The Wire Hindi

‘हम उस दौर में हैं, जहां मीडिया ख़ुद लोकतंत्र के लिए ख़तरा बन गया है’

द वायर हिंदी के दो साल पूरे होने पर हुए कार्यक्रम में दिए गए कार्यकारी संपादक बृजेश सिंह के वक्तव्य का संपादित अंश.

afzal

आज़ादी के सत्तर साल बाद भी एक बीमार देश राष्ट्रवाद की ऊर्जा की तलाश में भटक रहा है

कश्मीर, आतंकवादी, वामपंथी, जेएनयू और जेएनयू टाइप, राष्ट्रवाद, दुर्गा, सब कुछ घालमेल हो जाता है. देश जैसे एक विक्षिप्तता में बड़बड़ा रहा है. सन्निपात से उसे होश में लाना नामुमकिन हो रहा है.

Modi Ambani Rahul Gandhi PTI Reuters Twitter

क्यों देश की राजनीतिक और आर्थिक ताक़त कुछ परिवारों तक सिमटकर रह गई है

क्या अगले आम चुनाव में मोदी सरकार या महागठबंधन में से कोई नेता या दल अपने चुनावी घोषणा-पत्र में यह वादा कर सकता है कि वो देश की आम जनता को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा देने की संवैधानिक जवाबदारी निभाने के लिए 2019 से देश के अरबपतियों और अमीरों पर उचित टैक्स लगाने का काम करेगा?

राजस्थान विधानसभा भवन. (फोटो साभार: http://www.rajassembly.nic.in)

आरटीआई में खुलासा, राजस्थान में विधायकों के वेतन-भत्तों पर 90.79 करोड़ रुपये ख़र्च

पिछले पांच सालों में राजस्थान के विधायकों के वेतन-भत्तों पर 90.79 करोड़ रुपये ख़र्च किया गया है. वहीं पूर्व विधायकों को मिलने वाली पेंशन राशि लगभग तीन गुना बढ़ गया है.

(फोटो: रॉयटर्स)

जजों की नियुक्ति: एनजेएसी क़ानून को निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार याचिका ख़ारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाले एनजेएसी क़ानून, 2014 को असंवैधानिक और अमान्य घोषित किया था.

Media Bol Episde 77

मीडिया बोल, एपिसोड 77: संघ-भाजपा की अयोध्या और ‘ट्विटर डेमोक्रेसी’

मीडिया बोल की 77वीं कड़ी में उर्मिलेश संघ-भाजपा के मंदिर-मस्जिद, चुनाव और ‘ट्विटर डेमोक्रेसी’ पर वरिष्ठ पत्रकार क़ुर्बान अली, सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा बांगर और वरिष्ठ पत्रकार शैलेश से चर्चा कर रहे हैं.

मद्रास हाईकोर्ट. (फोटो साभार: फेसबुक/@Chennaiungalkaiyil)

प्रेस पर प्रतिबंध लगाने से भारत एक तानाशाह देश बन जाएगा: मद्रास उच्च न्यायालय

मानहानि के एक मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रेस द्वारा कुछ अवसरों पर गड़बड़ियां हो सकती हैं लेकिन लोकतंत्र के व्यापक हित को देखते हुए इन्हें नज़रअंदाज़ करने की ज़रूरत होती है.

Madhya Pradesh Vidhan Sabha 1

मध्य प्रदेश में विधायकों के वेतन-भत्तों पर साढ़े पांच साल में 149 करोड़ रुपये ख़र्च: आरटीआई

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक राज्य में हर एक विधायक की कमाई सूबे की अनुमानित प्रति व्यक्ति आय के मुक़ाबले क़रीब 18 गुना ज़्यादा थी.

People watch television sets displaying India's Finance Minister Arun Jaitley presenting the budget in parliament, at an electronic shop in the northern Indian city of Chandigarh February 28, 2015. Jaitley on Saturday announced a budget aimed at high growth, saying the pace of cutting the fiscal deficit would slow as he seeks to boost investment and ensure that ordinary people benefit. REUTERS/Ajay Verma (INDIA - Tags: BUSINESS)

न्यूज़ चैनल अब जनता के नहीं, सरकार के हथियार हैं

2019 का चुनाव जनता के अस्तित्व का चुनाव है. उसे अपने अस्तित्व के लिए लड़ना है. जिस तरह से मीडिया ने इन पांच सालों में जनता को बेदख़ल किया है, उसकी आवाज़ को कुचला है, उसे देखकर कोई भी समझ जाएगा कि 2019 का चुनाव मीडिया से जनता की बेदख़ली का आख़िरी धक्का होगा.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi addressing the Nation on the occasion of 72nd Independence Day, in Delhi on August 15, 2018.

देश में संविधान लागू है और क़ानून अपना काम कर रहा है

रोजगार नहीं है. उत्पादन घट गया है. किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नसीब नहीं हो रहा है. हेल्थ सर्विस चौपट हो चली है. शिक्षा-व्यवस्था डांवाडोल है. मुस्लिम ख़ामोश हो गया है. दलित चुपचाप है लेकिन आवाज़ नहीं उठनी चाहिए क्योंकि देश में क़ानून अपना काम कर रहा है.

Demonstrators from the Jat community sit on top of a truck as they block the Delhi-Haryana national highway during a protest at Sampla village in Haryana, India, February 22, 2016. REUTERS/Adnan Abidi

अब पराया लगता है यह देश

हम देश के एक छोटे से क़स्बे में पले-बढ़े लेकिन उस दौर में लोगों का दिलो-दिमाग राजनीति ने इतना छोटा नहीं था, जबकि देश का विभाजन हुए बहुत अरसा भी नहीं बीता था. नफ़रत की ऐसी आग नहीं लगी हुई थी, जैसी आज लगी है.

Anti national

जो आज दूसरों को ‘एंटी नेशनल’ बता रहे हैं, कभी वे भी ‘देशद्रोही’ हुआ करते थे

एंटी-नेशनल, भारत विरोधी जैसे शब्द आपातकाल के सत्ताधारियों की शब्दावली का हिस्सा थे. आज कोई और सत्ता में है और अपने आलोचकों को देश का दुश्मन बताते हुए इसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.

New Delhi: Prime Minister Narendra Modi addresses the media ahead of Parliament's monsoon session, in New Delhi on Wednesday, July 18, 2018. Parliamentary Affairs Minister Ananth Kumar, Union Minister for Development of North Eastern Region (DoNER) Jitendra Singh and Union MoS for Parliamentary Affairs Vijay Goel are also seen. (PTI Photo/ Kamal Singh)(PTI7_18_2018_000019B)

क्या सत्ता के सामने भारतीय मीडिया रेंगने लगा है?

संपादकों का काम सत्ता के प्रचार के अनुकूल कंटेट को बनाए रखने का है और हालात ऐसे हैं कि सत्तानुकूल प्रचार की एक होड़ मची हुई है. धीरे-धीरे हालात ये भी हो चले हैं कि विज्ञापन से ज़्यादा तारीफ़ न्यूज़ रिपोर्ट में दिखाई दे जाती है.

जेनएयू और कुलपति जगदीश कुमार (फोटो: ट्विटर)

जेएनयू: ‘जब कोर्ट से काम होना है तो कुलपति पद और प्रशासन को ध्वस्त कर देना चाहिए’

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब अदालत की दख़ल के बाद छात्र-छात्राओं की पीएचडी थीसिस जमा हुई है और उनका अगले सेमेस्टर में पंजीकरण हुआ है.

फिल्मकार सईद अख़्तर मिर्ज़ा, सामाजिक कार्यकर्ता रितु ​दीवान और फिल्मकार महेश भट्ट. (फोटो साभार: यूट्यूब)

लोकतंत्र और देशभक्ति जैसे शब्द अपना अर्थ खो चुके हैं: सईद अख़्तर मिर्ज़ा

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मकार सईद अख़्तर मिर्ज़ा की किताब के लोकार्पण के मौके पर फिल्मकार महेश भट्ट ने कहा कि हमारे देश की आत्मा सरकार से बहुत बड़ी है. यह देश सरकार नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

चीफ जस्टिस ही मास्टर ऑफ रोस्टर, इसमें कोई संदेह नहीं: सुप्रीम कोर्ट

चीफ जस्टिस द्वारा मामलों के आवंटन पर पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण की याचिका पर जवाब देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि सीजेआई की भूमिका समकक्षों के बीच प्रमुख की होती है, उन्हें विभिन्न पीठों को मामले को आवंटित करने का विशेषाधिकार होता है.

Modi Emergency Mumbai BJP Twitter 2

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘आपातकाल’ इतना प्रिय क्यों है?

राजनीतिक विमर्श में आपातकाल नरेंद्र मोदी का प्रिय विषय रहता है. यह और बात है कि मोदी आपातकाल के दौरान एक दिन के लिए भी जेल तो दूर, पुलिस थाने तक भी नहीं ले जाए गए थे. भूमिगत रहकर उन्होंने आपातकाल विरोधी संघर्ष में कोई हिस्सेदारी की हो, इसकी भी कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं मिलती.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi visiting the Terracota Warriors Museum, in Xi'an, Shaanxi, China on May 14, 2015.

क्या आपातकाल को दोहराने का ख़तरा अब भी बना हुआ है?

आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी. आज फिर वैसा ही नज़ारा दिख रहा है. सारे अहम फ़ैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते, सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है.

**FILE PHOTO** New Delhi: In this file photo dated January 22, 2018, Supreme Court judge Justice Jasti Chelameswar attends a book launch in New Delhi. The process for a possible elevation of Uttarakhand High Court Chief Justice K M Joseph as a Supreme Court judge might only get delayed as the apex court collegium, which had agreed in principle to reiterate his name to the Centre, will undergo a change due to the superannuation of Justice Jasti Chelameswar. (PTI Photo/Kamal Kishore)(PTI6_21_2018_000258B)

स्वतंत्र न्यायपालिका के बिना कोई भी लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता: जस्टिस चेलमेश्वर

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस जे. चेलमेश्वर सेवानिवृत्त. चार न्यायाधीशों की अपनी ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के संबंध में कहा कि मुझे बागी, काम बिगाड़ने वाला, वामपंथी और राष्ट्रद्रोही भी कहा गया लेकिन मैंने जनता के प्रति अपना दायित्व निभाया.

EP 263_Raw

​जन गण मन की बात, एपिसोड 263: लोकतंत्र में आम नागरिक और नेताओं के नखरे

जन गण मन की बात की 263वीं कड़ी में विनोद दुआ लोकतंत्र में आम नागरिकों की स्थिति और नेताओं के विलासितापूर्ण जीवन पर चर्चा कर रहे हैं.

Pranab Mukherjee Rss Featured

‘भारत की राष्ट्रीयता किसी एक भाषा या एक धर्म पर आधारित नहीं है’

7 जून 2018 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर मुख्यालय पर हुए समारोह में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दिया गया पूरा भाषण.

EP 252_Raw

जन गण मन की बात, एपिसोड 252: उपचुनाव परिणाम और हवा होती मोदी लहर

जन गण मन की बात की 252वीं कड़ी में विनोद दुआ उपचुनाव परिणाम और भाजपा की चुनावी बयानबाज़ी में आए बदलाव पर चर्चा कर रहे हैं.