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(फाइल फोटो: पीटीआई)

विहिप ने अयोध्या को रणक्षेत्र बनाया तो ‘हिंदू’ हुई हिंदी पत्रकारिता

मुख्यधारा की पत्रकारिता तो शुरुआती दिनों से ही राम जन्मभूमि आंदोलन का अपने व्यावसायिक हितों के लिए इस्तेमाल करती और ख़ुद भी इस्तेमाल होती रही. 1990-92 में इनकी परस्पर निर्भरता इतनी बढ़ गई कि लोग हिन्दी पत्रकारिता को हिंदू पत्रकारिता कहने लगे.

Ravish Kumar Photo The Wire

ख़बरनवीस ख़ुद ख़बर बन जाए यह बिरले होता है

किसी एक पत्रकार को तब कितना अकेलापन लगता होगा जब उसके सारे हमपेशा ख़ुद को राष्ट्रनिर्माता या राष्ट्ररक्षक मान बैठे हों! रवीश कुमार इसी बढ़ते अकेलेपन के बीच उसी को अपनी शक्ति बनाकर काम करते रहे.

फोटो साभार: सूर्या समाचार/फेसबुक

पुण्य प्रसून वाजपेयी को मिला नोटिस जनता के जानने के अधिकार पर एक और गहरा वार है

आखिर क्या बात है कि खेती-किसानी हो, अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्से हों, विश्वविद्यालय हों या स्कूल, हिंदी अख़बारों या चैनलों से हमें न तो सही जानकारी मिलती है, न आलोचनात्मक विश्लेषण? क्यों सारे हिंदी जनसंचार माध्यम सरकार की जय-जयकार में जुट गए हैं?

Episode 52

मीडिया बोल, एपिसोड 52: हिंदी पत्रकारिता में ‘भक्तिकाल’

मीडिया बोल की 52वीं कड़ी में उर्मिलेश बीते हफ़्ते देश के प्रमुख हिंदी अख़बारों की सुर्खियों में आए मुद्दों पर दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनीत कुमार और वरिष्ठ पत्रकार और कवि मंगलेश डबराल से चर्चा कर रहे हैं.

हिंदी का पहला अख़बार ‘उदंत मार्तंड’ 30 मई, 1826 को प्रकाशित हुआ था. ‘समाचार सुधावर्षण’ हिंदी का पहला दैनिक अख़बार है. (फोटो साभार: ट्विटर)

आज की हिंदी पत्रकारिता को याद भी नहीं कि वह प्रतिरोध की शानदार परंपरा की वारिस है

हिंदी पत्रकारिता दिवस: कोबरापोस्ट के हालिया स्टिंग ‘आपरेशन-136’ से यह साबित होता कि अब इस पत्रकारिता को न तो देश व देशवासियों के भविष्य-निर्माण में कोई दिलचस्पी है, न ही उनके विरुद्ध किसी साज़िश का अंग बनने को लेकर कोई हिचक.

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रोहित सरदाना को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार देने वालों की बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है

जिस हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की उसी हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पत्रकारिता करने वाले रोहित सरदाना को उनके नाम पर पुरस्कृत करने का फ़ैसला किया गया है.

(जन्म 26 अक्टूबर 1890- अवसान: 25 मार्च 1931)

गोदी मीडिया के दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता को याद किया जाना चाहिए

गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता के ज़रिये ब्रिटिश शासन के साथ-साथ देसी सामंतों को भी निशाने पर लेते थे. उनका दफ़्तर क्रांतिकारियों की शरणस्थली था तो युवाओं के लिए पत्रकारिता का प्रशिक्षण केंद्र.

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी (24 दिसंबर 1892 ​​​​​​​​​​​​​​- 02 May 1985). (फोटो साभार: अमेजॉन इंडिया)

बनारसीदास चतुर्वेदी, जिन्हें हिंदी के लोगों ने भुला दिया

जयंती विशेष: हिंदी के लोग अब आम तौर पर लेखक और पत्रकार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को न याद करते हैं, न ही उनकी पत्रिका ‘विशाल भारत’ को. यहां तक कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भी उन्हें याद नहीं किया जाता.

अयोध्या. (फोटो साभार: ​टूरिज़्म आॅफ इंडिया)

अयोध्या एक शहर का नाम है जिसमें इंसान रहते हैं

यह वह अयोध्या नहीं है जिसको सार्वजनिक कल्पना में विहिप और भाजपा या दिल्ली के तथाकथित लिबरल्स व मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने स्थापित किया है. यह एक सामान्य शहर है.

अयोध्या. (फोटो साभार: विकिमीडिया)

अयोध्या विवाद: इस देश की राजनीति धर्मनिरपेक्ष विरासत और संकल्प भूल चुकी है

देश के वामपंथी और समाजवादी बौद्धिकों ने धर्मनिरपेक्षता की रक्षा का पूरा दारोमदार मंडलवादी और आंबेडकरवादी आंदोलनों पर डाल दिया लेकिन इन आंदोलनों ने देश को इतने भ्रष्ट नेता दिए कि उनके पास धर्मनिरपेक्षता की रक्षा का नैतिक बल ही नहीं बचा.

New Delhi: RSS chief Mohan Bhagwat releasing the1st and 2nd edition of "Dattopant Thegdi- Jiwan Darshan" during the Bhartiya Majdoor Shangh function in New Delhi on Sunday. PTI Photo by Vijay Verma (PTI8_30_2015_000183B)

वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं

अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.

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मीडिया बोल, एपिसोड 05: सांप्रदायिक हिंसा और मीडिया कवरेज

मीडिया बोल की पांचवीं कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, द हूट की संपादक सेवंती निनान और एनडीटीवी की वरिष्ठ संपादक निधि कुलपति के साथ बंगाल के बसीरहाट और बादुरिया की सांप्रदायिक हिंसा के मीडिया कवरेज पर चर्चा कर रहे हैं.

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मीडिया बोल, एपिसोड 04: हिंदी मीडिया आज इतना बेदम और ग़ैर-पेशेवर क्यों?

मीडिया बोल की चौथी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, एनडीटीवी के सीनियर एंकर रवीश कुमार और वरिष्ठ पत्रकार विद्या सुब्रह्मण्यम के साथ हिंदी मीडिया के ग़ैर-पेशेवर रवैये पर चर्चा कर रहे हैं.