Indian freedom struggle

भारत सरकार के प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल. (फोटो: ट्विटर/@sanjeevsanyal)

भगत सिंह को बचाने का गांधी ने कोई प्रयास नहीं किया था: प्रधान आर्थिक सलाहकार

गुजरात यूनिवर्सिटी में ‘द रिवाल्यूशनरीज: ए रिटेलिंग ऑफ इंडियाज हिस्ट्री’ पर भाषण देते हुए भारत सरकार के प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने कहा कि अगर प्रथम विश्व युद्ध के लिए वे भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना में भेजने को तैयार थे तब उन्हें उसी तरह का काम करने को लेकर भगत सिंह से दिक्कत क्यों थी?

क्रांतिकारी राजनारायण मिश्रा.

क्रांतिकारी राजनारायण: जिन्होंने कहा था कि पूंजीपति कहीं हों उन्हें मिटाने में कसर न रखें

आज़ादी की लड़ाई के सिपाही राजनारायण मिश्र ने कहा था कि हमें दस आदमी ही चाहिए, जो त्यागी हों और देश की ख़ातिर अपनी जान की बाज़ी लगा सकें. कई सौ आदमी नहीं चाहिए जो लंबी-चौड़ी हांकते हों और अवसरवादी हों.

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जब बंगाल में ऐसी धोतियां फैशन में थीं जिनके किनारों पर ‘खुदीराम बोस’ लिखा रहता था

शहादत दिवस पर विशेष: सामान्य युवा इतना भले ही जानते हैं कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ने देश को सरदार भगत सिंह जैसा शहीद-ए-आज़म दिया, लेकिन सबसे कम उम्र के शहीद के बारे में कम ही लोग जानते हैं.

चंद्रशेखर आज़ाद. (फोटो साभार: www.hindgrapha.com)

आज़ाद के शहीद हो जाने के बाद भी उनकी मां को उनके लौट आने का विश्वास था

शहादत दिवस पर विशेष: चंद्रशेखर आज़ाद की मां ने मन्नत मानकर दो उंगलियों में धागा बांध रखा था. कहती थीं कि आज़ाद के आने के बाद ही धागा खोलेंगी.

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बापू ने अयोध्या में कहा था, हिंसा कायरता का लक्षण और तलवारें कमज़ोरों का हथियार हैं

साल 1921 में गांधीजी ने फ़ैज़ाबाद में निकले जुलूस में देखा कि ख़िलाफ़त आंदोलन के अनुयायी हाथों में नंगी तलवारें लिए उनके स्वागत में खड़े हैं. जिसकी उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आलोचना की थी.

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी (24 दिसंबर 1892 ​​​​​​​​​​​​​​- 02 May 1985). (फोटो साभार: अमेजॉन इंडिया)

बनारसीदास चतुर्वेदी, जिन्हें हिंदी के लोगों ने भुला दिया

जयंती विशेष: हिंदी के लोग अब आम तौर पर लेखक और पत्रकार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को न याद करते हैं, न ही उनकी पत्रिका ‘विशाल भारत’ को. यहां तक कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भी उन्हें याद नहीं किया जाता.

शहीद अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल और रौशन सिंह. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

वतन पे मरने वालों के परिवारों का क्या यही बाक़ी निशां होगा?

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां, रामप्रसाद बिस्मिल और रौशन सिंह के शहादत दिवस (19 दिसंबर) पर उनकी मांओं और परिवार के दुर्दशा की कहानी.

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बिपन चंद्र: जो मानते थे कि सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता पर कब्ज़ा करने से हर हाल में रोकना चाहिए

पुण्यतिथि विशेष: इतिहासकार बिपन चंद्र का कहना था कि राजनीतिक सत्ता पर काबिज होते ही सांप्रदायिक दल लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों का गला घोंटने का प्रयास करेंगे.