Literature

(फोटो साभार: Composition 8, Vassily Kandinsky (1923)/विकीमीडिया कॉमन्स)

यह साल हम सबने किस तरह काटा है…

बदसूरत से बदसूरत समय में जीवन में आस्था नहीं छोड़नी चाहिए. बदसूरती और नाइंसाफ़ी का दस्तावेज़ीकरण भी कितना ज़रूरी है. क्या हमारे दौर का भी दर्ज हो रहा है?

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मंगलेश डबराल का जाना और पहाड़ों पर कविता की लालटेन बुझ जाना

वीडियो: हिंदी की बिंदी में आज हम जिस कवि को याद कर रहे हैं, वे हैं मंगलेश डबराल, जिन्होंने हाल ही में इस दुनिया को अलविदा कह दिया है.

मंगलेश डबराल. (फोटो साभार: फेसबुक/@mangalesh.dabral.7)

मंगलेश डबराल: मैं चाहता हूं कि स्पर्श बचा रहे…

स्मृति शेष: मंगलेश डबराल उस यातना को जानते थे जो मनुष्य ने मनुष्य को दी है. दुनिया की अलग-अलग भाषाओं से किए गए उनके अनुवाद इस बात के साक्षी हैं. इसीलिए वे उस संघर्ष की कठिनाई से भी परिचित थे जो इस यातना की संस्कृति को ख़त्म करने का है.

रघुवीर सहाय (फोटो साभार: विकीपीडिया)

रघुवीर सहाय: अकड़ और अश्लीलता से मुक़ाबला

राज्य का रुतबा इंसान से बड़ा हो, यह रघुवीर सहाय को बर्दाश्त नहीं. वह इंसान से उसकी आज़ादी की इच्छा छीन लेता है. हर व्यक्ति को आज़ादी का एहसास हो और वैसे मौके ज़्यादा से ज़्यादा पैदा कर सके, जिनमें वह खुद को ख़ुदमुख़्तार देख सके, उसे किसी सत्ता के अधीन और निरुपाय होने का बोध न रहे, यह हर मानवीय उपक्रम और साहित्य का भी दायित्व है.

केदारनाथ सिंह. (फोटो साभार: दूरदर्शन/यू ट्यूब)

केदारनाथ सिंह: दुनिया से मिलने को निकला एक कवि

कविता का पूरा अर्थ हासिल कर पाना और संप्रेषणीयता का प्रश्न, हर कवि को इन दो कसौटियों पर अनिवार्यतः कसा जाता था. केदारनाथ सिंह की कविता, हर खरी कविता की तरह इन दोनों के प्रलोभन से बचती थी.

सुदामा पांडे 'धूमिल' (जन्म: 09 नवंबर 1936 - अवसान: 10 फरवरी 1975) (फोटो साभार: 4.bp.blogspot.com)

आज धूमिल जीवित होते तो देशद्रोही के ख़िताब से ज़रूर नवाज़े गए होते…

जन्मदिन विशेष: जिस धूमिल ने देश की व्यवस्था की कमज़ोरियों और नागरिकों से उसकी दूरी को इतना ‘नंगा’ किया, आज उस देश में धूमिल जैसे स्वर के लिए कितनी जगह बची है?

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सौ साल बाद भी महिला लेखन की चुनौतियां क्या हैं

वीडियो: जब कभी कोई पुरुष कलम उठाता है तो मान लिया जाता है कि उस कलम से जो भी लिखेगा, वह साहित्य समाज का दर्पण कहलाएगा, लेकिन जब कोई महिला कलम उठाती है, तब ऐसा नहीं होता. महिला लेखन की चुनौतियों पर प्रकाशक मीरा जौहरी और कथाकार गीताश्री से दामिनी यादव की बातचीत.

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साहिर लुधियानवी की याद, गौहर रज़ा के साथ

वीडियो: मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्यतिथि पर जाने-माने वैज्ञानिक, कलमकार, फिल्म निर्माता गौहर रज़ा से दामिनी यादव की बातचीत.

इस्मत चुग़ताई. [जन्म- 21 अगस्त 1915-अवसान 24 अक्टूबर 1991] (फोटो साभार: पेंगुइन इंडिया)

इस्मत चुग़ताई: परंपराओं से सवाल करने वाली ‘बोल्ड’ लेखक

इस्मत कहा करती थीं, ‘मैं रशीद जहां के किसी भी बात को बेझिझक, खुले अंदाज़ में बोलने की नकल करना चाहती थी. वो कहती थीं कि तुम जैसा भी अनुभव करो, उसके लिए शर्मिंदगी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है, और उस अनुभव को ज़ाहिर करने में तो और भी नहीं है क्योंकि हमारे दिल हमारे होंठों से ज़्यादा पाक़ हैं…’

प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – अवसान: 08 अक्टूबर 1936) (फोटो साभार: रेख्ता डॉट ओआरजी/विकीमीडिया/John Hoyland, Lebanon, 2007)

राष्ट्रवाद और डंडावाद

प्रेमचंद महात्मा गांधी की आंदोलन पद्धति के मुरीद थे. सशस्त्र आतंक के ज़रिये क्रांति या मुक्ति के नारे प्रेमचंद का खून गर्म नहीं कर पाते क्योंकि वे हिंसा के इस गुण या अवगुण को पहचानते थे कि वह कभी भी शुभ परिणाम नहीं दे सकती.

रामधारी सिंह दिनकर. (जन्म: 23 सितंबर 1908, अवसान: 24 अप्रैल 1974)

दिनकर: कोप से आकुल जनता का कवि

पिछले पांच-छह सालों में दिनकर का कीर्तन वैसे लोगों ने किया है, जिन्हें शायद वे अपनी चौखट न लांघने देते. उनकी ओजस्विता से इस भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिए कि वे हुंकारवादी राष्ट्रवाद के प्रवक्ता थे. वे राष्ट्रवादी थे, लेकिन ऐसा राष्ट्रवादी जो अपने राष्ट्र को नित नया हासिल करता था और कृतज्ञ होता था.

कपिला वात्स्यायन. (फोटो साभार: ट्विटर)

प्रख्यात कलाविद् कपिला वात्स्यायन का निधन

पद्म विभूषण से सम्मानित देश की प्रख्यात कलाविद् एवं राज्यसभा की पूर्व मनोनीत सदस्य कपिला वात्स्यायन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की संस्थापक सदस्य और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की आजीवन ट्रस्टी भी थीं.

प्रेमचंद.

साहित्यिक कुपाठ के निशाने पर प्रेमचंद

जून महीने के आख़िरी हफ्ते में मासिक पत्रिका हंस के संपादक संजय सहाय ने कहा कि प्रेमचंद यथास्थितिवादी, प्रतिगामी थे और उनकी 25-30 कहानियों को छोड़कर अधिकतर कहानियां ‘कूड़ा’ हैं.

(फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

कुठांव: मुस्लिम समाज में जातिवाद को उघाड़ता उपन्यास

अब्दुल बिस्मिल्लाह ने मुस्लिम समाज में मौजूद जातिवाद को कुठांव यानी मर्मस्थल की मानिंद माना है. उनके अनुसार यह एक ऐसा नाज़ुक विषय है अमूमन जिसका अस्तित्व ही अवास्तविक माना जाता है और जिसके बारे में बात करना पूरे मुस्लिम समाज के लिए एक पीड़ादायक विषय है.