Literature

फ़हमीदा रियाज़

फ़हमीदा रियाज़: ख़ामोश हुई महिला अधिकारों की हिमायती आवाज़

फ़हमीदा रियाज़ को पाकिस्तान के साहित्यिक हलकों में महिला अधिकारों की सबसे साहसी पैरोकार माना जाता था, जिन्होंने कलम चलाते वक्त किसी सरहद, किसी बंधन को नहीं माना.

फ़हमीदा रियाज़. (फोटो साभार: फेसबुक/@NanbendaGroup)

भारत में जन्मीं पाकिस्तानी कवियित्री और लेखक फ़हमीदा रियाज़ का निधन

पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल ज़िया-उल-हक़ के शासनकाल के दौरान नारीवादी संघर्ष की एक प्रमुख आवाज रहीं फ़हमीदा ने पाकिस्तान छोड़ दिया था और सात साल तक भारत में रही थीं.

साहित्यकार विष्णु खरे. (जन्म: 9 फरवरी 1940 - अवसान: 19 सितंबर 2018) (फोटो साभार: हिंदी कविता/यूट्यूब)

विष्णु खरे: एक सांस्कृतिक योद्धा जो आख़िर तक वैचारिक युद्ध लड़ता रहा

विष्णु खरे ने न सिर्फ एक नई तरह की भाषा और संवेदना से समकालीन हिंदी कविता को नया मिज़ाज़ दिया बल्कि उसे बदला भी. एक बड़े कवि की पहचान इस बात से भी होती है कि वह पहले से चली आ रही कविता को कितना बदलता है. और इस लिहाज़ से खरे अपनी पीढ़ी और समय के एक बड़े उदाहरण हैं.

Sarveshwar Dayal Saxena Photo Rajkamal Publication

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: मैं साधारण हूं और साधारण ही रहना चाहता हूं, आतंक बनकर छाना नहीं चाहता

जिस तरह केन नदी केदारनाथ अग्रवाल के संसार में बहती दिखती है ठीक वैसे ही कुआनो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के संसार में बह रही है. हम सभी के संसार में कोई न कोई भुला दी गई नदी बह रही है. सर्वेश्वर बस इसलिए अलग थे कि वह उस नदी और उसके पास लगने वाले फुटहिया बाज़ार को कभी भूले नहीं. वहां मुर्दा जलते और अधजले रह जाते. धोबी कपड़े धोते. औरतें छुपकर सिगरेट पीतीं.

ravindranath tayagi

रवीन्द्रनाथ त्यागी: ‘जिसने देखा नहीं मेरा कवि, उसने देखी नहीं मेरी सच्ची छवि’

पुण्यतिथि विशेष: बहुत कम ही लोग जानते हैं कि त्यागी जितने अच्छे व्यंग्यकार थे, उतने ही बड़े कवि भी थे. एक आलोचक की मानें तो उनके साहित्यिक जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यही थी कि उनके व्यंग्यकार की लोकप्रियता ने एक बार उनके कवि की गरदन दबोची, तो फिर जीवन भर नहीं छोड़ी.

लेखक वीएस नायपॉल. (फोटो साभार: फेसबुक)

नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वीएस नायपॉल का निधन

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक वीएस नायपॉल को 1990 में ‘नाइटहुड’ का सम्मान मिला था और 2001 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से उन्हें नवाज़ा गया था.

रामपद चौधरी. (फोटो साभार: द टेलीग्राफ)

राष्ट्रीय पुरस्कार से ​सम्मानित फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ के लेखक रामपद चौधरी का निधन

प्रख्यात बंगाली लेखक रामपद चौधरी फेफड़े और वृद्धावस्था से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे थे. उनकी रचना ‘बाड़ी बोदले जाए’ के लिए 1988 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

Kedarnath Agarwal

केदारनाथ अग्रवाल: खेतों को चाहने वाला क्या कोई और भी कवि है

केदारनाथ अग्रवाल का सौंदर्यबोध खेतों की धूल में गुंथकर बना है और इस तरह के सौंदर्यबोध के वह हिंदी के इकलौते कवि हैं.

srikant_verma

श्रीकांत वर्मा: क्या कहूं आज जो नहीं कही, दुख ही जीवन की कथा रही

श्रीकांत वर्मा के साहित्य में जीवन-मरण का स्मरण किसी प्रकार के रहस्यवाद से परे है. बात सीधी-सपाट है. आदमी अपने ‘रक्तचाप’ से मरता है, अपने ‘पाप’ से नहीं.

Manto Wikipedia

मंटो की कहानियां सभ्यता के गाल पर तमाचा मारती हैं

यह विडंबना है कि ज़िंदगी भर अपने लिखे हुए के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने वाला, मुफ़लिसी में जीने और समाज की नफ़रत झेलने वाला मंटो आज ख़ूब चर्चा में है. इसी मंटो ने लिखा था कि मैं ऐसे समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख़्स के किरदार को लॉन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल-धुलाकर आए.

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (जन्म 15 अप्रैल 1865 - 16 मार्च 1947, फोटो: विकिपीडिया)

आपको पता है, ‘हरिऔध’ का घर और स्मृतियां दोनों खंडहर हो गई हैं

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के पट्टीदारों ने उनकी विरासत को लंबे अरसे तक झगड़े में फंसाकर उन्हें जैसी ‘श्रद्धांजलि’ दी, वैसी किसी दुश्मन को भी न मिले.

Kedarnath Singh Final

‘कथाओं से भरे इस देश में… मैं भी एक कथा हूं’

हिंदी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है. वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में दिखते हैं.

Kedarnath Singh Youtube

केदारनाथ सिंह: वो कवि जो ‘तीसरे’ की खोज में पुलों से गुज़र गया

केदारनाथ सिंह की कविताओं में सबसे अधिक आया हुआ बिंब वह है जो ‘जोड़ता’ है. उन्हें वह हर चीज़ पसंद थी जो जोड़ती है. वो चाहे सड़क हो या पुल, शब्द हो या सड़क, जो लोगों को मिलाती है, उनकी आंखों में एक छवि बनकर तैरती रहती और फिर पिघलकर कविता में ढल जाती.

केदारनाथ सिंह. (फोटो साभार: भारतीय ज्ञानपीठ)

हिंदी के प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का निधन

उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले में हुआ जन्म. पेट में संक्रमण की वजह से केदारनाथ सिंह को नई दिल्ली स्थित एम्स में भर्ती कराया गया था.

Nirala Hindi Kavita

‘यह कवि अपराजेय निराला, जिसको मिला गरल का प्याला’

निराला के देखने का दायरा बहुत बड़ा था. ‘देखना’ वेदना से गुज़रना है. उन्होंने अपने शहर के रास्ते पर ‘गुरु हथौड़ा हाथ लिए’ पत्थर तोड़ती हुई औरत देखी. सभ्यता की वह राह देखी जहां से ‘जनता को पोथियों में बांधे हुए ऋषि-मुनि’ आराम से गुज़र गए. चुपके से प्रेम करने वाला ‘बम्हन लड़का’ और उसकी ‘कहारिन’ प्रेमिका देखी.

पुस्तक मेले में आसाराम का स्टॉल, फोटो: Special Arrangement

क्या नेशनल बुक ट्रस्ट ने पुस्तक मेले के बहाने धर्म के प्रचार-प्रसार का ठेका ले लिया है?

विश्व पुस्तक मेला अब महज़ किताबों की ख़रीद-बिक्री, लेखकों एवं पाठकों का मिलन स्थल ही नहीं रहा बल्कि धर्म के प्रचार का केंद्र भी बन गया है.

कवि अदम गोंडवी (22 अक्टूबर 1947 - 18 दिसंबर 2011). (फोटो साभार: ट्विटर)

‘जितने हरामखोर थे कुर्बो-जवार में, परधान बन के आ गए अगली कतार में’

पुण्यतिथि विशेष: अदम गोंडवी अपने पाठकों को गांवों की उन तंग गलियों में ले गए जहां जीवन उत्पीड़न का शिकार हो रहा था.

Vidrohi

‘ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था!’

पुण्यतिथि विशेष: विद्रोही अभी ज़िंदा हैं. सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लेंगे, सारे तानाशाह और ज़ुल्मी मर जाएंगे, उसके बाद विद्रोही मरेंगे आराम से, वसंत ऋतु में.

गजानन माधव मुक्तिबोध (13 नवंबर 1917 – 11 सितंबर 1964)

मुक्तिबोध: उम्र भर जी के भी न जीने का अंदाज़ आया

हरिशंकर परसाई ने मुक्तिबोध को याद करते हुए लिखा कि जैसे ज़िंदगी में मुक्तिबोध ने किसी से लाभ के लिए समझौता नहीं किया, वैसे मृत्यु से भी कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे.

फोटो साभार: ranjana-bisht.blogspot.in

कृष्णा सोबती: स्त्री मन की गांठ खोलने वाली कथाकार

‘मित्रो मरजानी’ के बाद सोबती पर पाठक फ़िदा हो उठे थे. ये इसलिए नहीं हुआ कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा पर निकल पड़ी थीं. ऐसा हुआ क्योंकि उनकी महिलाएं समाज में तो थीं, लेकिन उनका ज़िक्र करने से लोग डरते थे.

Hafiz Junaid Mohammad Ayub Pandith 1

आवारा भीड़ के ख़तरे

यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है. हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है. इसका उपयोग भी हो रहा है. आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है.

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अब सुनने में आता है कि हर पांच मिनट में एक भारतीय लेखक का जन्म हो रहा है: अनीता देसाई

तीन बार बुकर पुरस्कार के लिए नामित और 17 से ज़्यादा किताबों की लेखक अनीता देसाई को हाल ही में इंटरनेशनल लिटरेरी ग्रैंड प्राइज़ से सम्मानित किया गया है.