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क्या शैक्षणिक संस्थानों के पिछले दरवाज़े धार्मिक शिक्षा के लिए खोले जा रहे हैं

वर्तमान में जिस तरह से धार्मिक शिक्षा के लिए रास्ता सुगम किया जा रहा है, ऐसे में यह भी याद रखना चाहिए कि जैसे-जैसे यह शिक्षा आम होती जाएगी, वह वैज्ञानिक चिंतन के विकास को बाधित करेगी. नागरिकों को यह बताना ज़रूरी है कि धार्मिक चेतना और वैज्ञानिक चेतना समानांतर धाराएं हैं और आपस में नहीं मिलतीं.

विश्वविद्यालयों में घटता आलोचनात्मक चिंतन का दायरा

विश्वविद्यालय परिसर को ऐसा होना ही चाहिए जहां भय न हो, आत्मविश्वास हो, ज्ञान की मुक्ति हो और जहां विवेक की धारा कभी सूखने न पाए. तमाम सीमाओं के बावजूद भारतीय विश्वविद्यालय कुछ हद तक ऐसा माहौल बनाने में सफल हुए थे. पर पिछले पांच-सात वर्षों से कभी सुधार, तो कभी ‘देशभक्ति’ के नाम पर ‘विश्वविद्यालय के विचार’ का हनन लगातार जारी है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के बीए के पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की लघुकथा ‘द्रौपदी’ हटाई गई

दिल्ली यूनिवर्सिटी शैक्षणिक परिषद ने मंगलवार को 12 घंटे चली बैठक में सदस्यों की असहमति को ख़ारिज करते हुए 2022-23 सत्र से राष्ट्रीय शिक्षा नीति और चार साल के स्नातक के क्रियान्वयन को मंज़ूरी दे दी.  शैक्षणिक परिषद के सदस्य ने बताया कि दो दलित लेखकों बामा और सुकीरथरिणी को भी सिलेबस से हटाया गया है.

New Delhi: Petroleum & Natural Gas Minister Dharmendra Pradhan speaks during a cabinet briefing, in New Delhi, Wednesday, Sept 12, 2018. (PTI Photo/Shahbaz Khan) (PTI9_12_2018_000092B)

करीब 15 करोड़ बच्चे एवं युवा देश की औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर: शिक्षा मंत्री

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि क़रीब 25 करोड़ आबादी साक्षरता की बुनियादी परिभाषा के नीचे है. सरकारी, निजी एवं धर्मार्थ स्कूलों, आंगनवाड़ी, उच्च शिक्षण संस्थानों एवं कौशल से जुड़ी पूरी व्यवस्था में 3 से 22 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों एवं युवाओं की संख्या 35 करोड़ है, जबकि देश में इस आयु वर्ग की आबादी 50 करोड़ है. 

विश्वविद्यालयों में बढ़ता सरकारी हस्तक्षेप किसी बेहतरी का संकेत नहीं है

विश्वविद्यालय में यह तर्क नहीं चल सकता कि चूंकि पैसा सरकार (जो असल में जनता का होता है) देती है, इसलिए विश्वविद्यालयों को सरकार की तरफ़दारी करनी ही होगी. बेहतर समाज के निर्माण के लिए ज़रूरी है कि विश्वविद्यालय की रोज़मर्रा के कामकाज में कम से कम सरकारी दख़ल हो.

देश के लगभग आधे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नियमित वाइस चांसलर नहीं

दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू और बीएचयू समेत देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से बीस में नियमित वाइस चांसलर नहीं हैं. अधिकारियों के अनुसार नियुक्तियों में विलंब पीएमओ की ओर से हुई देरी के चलते ऐसा हो रहा है. बताया गया कि क़ानूनन पीएमओ की कोई भूमिका नहीं है पर इन दिनों फाइलें अनधिकृत तौर पर वहां भेजी जाती हैं.

नई शिक्षा नीति बाज़ार के रास्ते के बचे रोड़े हटाने की कवायद भर है

अगर सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर गंभीर है, तो उसे इस पर संसद में बहस चलानी चाहिए. किसी बड़ी नीति में बदलाव के लिए हर तरह के विचारों पर जनता के सामने चर्चा हो. इस तरह देश की विधायिका को उसके अधिकार से वंचित रख शिक्षा नीति बदलना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है.

तमिलनाडु में लागू नहीं होने देंगे तीन भाषा फॉर्मूलाः पलानीस्वामी

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर निराशा जताते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने कहा कि राज्य में कई दशकों से दो भाषा नीति का पालन किया जा रहा है, इसमें कोई बदलाव नहीं होगा. उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दोबारा विचार करने का भी आग्रह किया.

क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सूरत बदलने में कारगर होगी नई शिक्षा नीति?

वीडियो: बीते दिनों केंद्रीय कैबिनेट ने देश की नई शिक्षा नीति को मंज़ूरी दी है. 34 साल बाद देश की शिक्षा नीति में हुए इस बदलाव को मिली-जुली प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. इस बारे में विभिन्न विशेषज्ञों से सृष्टि श्रीवास्तव की बातचीत.

सत्ता के मन में उपजे हिंदी प्रेम के पीछे राजनीति है, न कि भाषा के प्रति लगाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पहले मसौदे में हिंदी थोपने की कथित कोशिश पर मचे हंगामे को देखते हुए एक बात साफ है कि इस हो-हल्ले का हिंदी से कोई वास्ता नहीं है. हिंदी थोपने या ख़ारिज करने की इच्छा का संबंध हिंदी राष्ट्रवाद, धर्म, जाति और अंग्रेज़ी से एक असहज जुड़ाव जैसी बातों से हो सकता है, मगर इसका संबंध उस भाषा से कतई नहीं है, जिसका नाम हिंदी है.