Sukhdev

भगत सिंह

क्रांति के लिए ख़ूनी लड़ाइयां ज़रूरी नहीं, क्रांति यानी अन्याय आधारित व्यवस्था में आमूल बदलाव

विशेष: साल 1929 में 8 अप्रैल को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था. बम फेंकने के बाद उन्होंने गिरफ़्तारी दी और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला. 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज लियोनॉर्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगत सिंह का ऐतिहासिक बयान…

शादमान चौक का नाम भगत सिंह चौक करने की मांग करने उनके प्रशंसक (फोटो साभार: ट्विटर/नायला इनायत)

पाकिस्तान ने शादमान चौक का नाम बदलकर भगत सिंह चौक किया

शादमान चौक पर 23 मार्च 1931 को अंग्रेजी हुकूमत ने क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ाया था. उस दौरान यह चौक एक जेल का हिस्सा था.

भगवती चरण वोहरा. (जन्म: 04 जुलाई 1904 - अवसान: 28 मई 1930, फोटो साभार: शहीद कोश)

भगवतीचरण वोहरा: जिनके त्याग के आगे भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नज़र आता था

शहादत दिवस पर विशेष: क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा के निधन पर भगत सिंह के शब्द थे, ‘हमारे तुच्छ बलिदान उस श्रृंखला की कड़ी मात्र होंगे, जिसका सौंदर्य कॉमरेड भगवतीचरण वोहरा के आत्मत्याग से निखर उठा है.’

राजगुरु. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

इस बात का कोई सबूत नहीं कि राजगुरु आरएसएस के स्वयंसेवक थे: परिजन

राजगुरु के परिजनों का कहना है कि वह समस्त देश के क्रांतिकारी थे और उनका नाम किसी ख़ास संगठन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.

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भगत सिंह और सावरकर: दो याचिकाएं जो हिंद और हिंदुत्व का अंतर बताती हैं

भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि उनके फांसी देने की जगह गोलियों से भून दिया जाए. सावरकर ने अपील की उन्हें छोड़ दिया जाए तो आजीवन क्रांति से किनारा कर लेंगे.

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संसद में उठी सरदार भगत सिंह को शहीद घोषित करने की मांग

राज्यसभा में सदस्य ने कहा, भारत को आज़ाद हुए करीब 70 साल हो रहे हैं, लेकिन सरदार भगत सिंह को अब तक शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है.

शहीद अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल और रौशन सिंह. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

वतन पे मरने वालों के परिवारों का क्या यही बाक़ी निशां होगा?

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां, रामप्रसाद बिस्मिल और रौशन सिंह के शहादत दिवस (19 दिसंबर) पर उनकी मांओं और परिवार के दुर्दशा की कहानी.