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(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

देश की जेलों में बंद 27.37 फीसदी क़ैदी अशिक्षित, 21 प्रतिशत दसवीं पास: सरकारी डेटा

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की जेलों में बंद 41.55 फीसदी क़ैदियों ने दसवीं कक्षा से कम तक ही पढ़ाई की है. 6.31 फीसदी क़ैदी ग्रेजुएट और 1.68 प्रतिशत पोस्ट-ग्रेजुएट हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

देश की जेलों में बंद क़ैदियों में 65 प्रतिशत एससी, एसटी और ओबीसी: सरकार

गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने राज्यसभा में बताया कि ओबीसी, एससी और अन्य श्रेणियों के क़ैदियों की अधिकतम संख्या उत्तर प्रदेश की जेलों में है, जबकि मध्य प्रदेश की जेलों में एसटी समुदाय की है. इसके अलावा देशभर की जेलों में कुल क़ैदियों में 95.83 फ़ीसदी पुरुष और 4.16 फ़ीसदी महिलाएं हैं.

रांची सरना धर्म कोड की मांग को लेकर हुआ एक प्रदर्शन. (फोटो: पीटीआई)

सरना धर्म कोड: आदिवासियों को मिलेगी उनकी अपनी पहचान

आदिवासी स्वयं को किसी भी संगठित धर्म का हिस्सा नहीं मानते हैं इसलिए वे लंबे समय से अपने लिए अलग धर्म कोड की मांग करते रहे हैं. इस हफ़्ते झारखंड सरकार ने एक विशेष विधानसभा सत्र में ‘सरना आदिवासी धर्म कोड’ पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसे अब केंद्र के पास भेजा जाएगा.

(फोटो साभार: सि​टीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस/CPJ)

पुलिस की प्रताड़ना के ख़िलाफ़ बिहार चुनाव का बहिष्कार करेंगे कैमूर ज़िले 108 आदिवासी गांव

मामला बिहार के कैमूर ज़िले का है. इलाके को टाइगर रिज़र्व न घोषित किए जाने सहित कई अन्य मांगों को लेकर बीते सितंबर महीने में विरोध प्रदर्शन करने वाले हज़ारों आदिवासियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज और गोलीबारी की थी. इस संबंध में दिल्ली से गई एक चार सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट जारी की है.

(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों को सामुदायिक वन अधिकार दिए गए: छत्तीसगढ़ सरकार

सामुदायिक वन अधिकारों में लघु वनोपज का मालिक़ाना हक़, मछली और जल निकायों के उत्पादों के प्रयोग, कमज़ोर आदिवासी समूहों के निवास स्थान जैसे अधिकार शामिल हैं. राज्य सरकार का कहना है कि अब तक चार लाख से अधिक व्यक्तिगत और 46 हज़ार से अधिक सामुदायिक वन अधिकार पत्र जारी किए गए हैं.

बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा. (फाइल फोटो साभार: छत्तीसगढ़ टूरिज्म)

क्यों बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के रथ के लिए आदिवासी लकड़ी देने से इनकार कर रहे हैं

बस्तर में हर साल दशहरे के पर्व पर एक आठ पहियों का रथ निकलता है, जिसे ककालगुर गांव की लकड़ी से तैयार किया जाता है. इस बार यहां के ग्रामीणों ने सदियों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन करने से इनकार कर दिया है.

झारखंड के गुमला जिले के डुमरी ब्लॉक गांव में बने एक अंग्रेजी-कुरुख स्कूल के छात्र. (फोटो: जसिंता केरकेट्टा)

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था आदिवासियों को उनका अस्तित्व बचा पाने के रास्ते क्यों नहीं दिखा पाती

आधुनिक शिक्षा का पूरा ढांचा वर्चस्ववादी संस्कृति और मानसिकता से खड़ा किया गया है, जिसमें आदिवासी समाज कहीं फिट नहीं बैठता. उसकी पूरी जीवन शैली, जीवन दर्शन और दुनिया अलग है, जिसे वर्चस्ववादी नज़रिये से नहीं समझा जा सकता.

डोंगरिया कोंद आदिवासी समुदाय की महिलाएं. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

किसी वाचाल देश में आदिवासियों के कम बोलने का अर्थ क्या है

इस देश में कोई भी बोल-बोलकर कुछ भी बेच सकता है, कुछ भी खरीद सकता है. मसलन वो लोगों का ज़मीर खरीद लेता है, सपने बेच देता है. जो नहीं बोल पाता, उसे इस देश में मूर्ख समझा जाता है, शायद इसीलिए कम बोलने वाले, सच्चे, ईमानदार और प्रकृति के साथ चलने वाले किसी भी समुदाय को कमज़ोर समझा जाता है.

Tribal painting, though popular among most tribes in MP, is extremely well honed as an art among the Gond tribe of Mandala

क्या आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार उनकी ही संस्कृति के लिए ख़तरा है

विश्व आदिवासी दिवस: मूल निवासियों की पहचान उनकी अपनी विशेष भाषा और संस्कृति से होती है, लेकिन बीते कुछ समय से ये चलन-सा बनता नज़र आया है कि आदिवासी क्षेत्र के लोग मुख्यधारा की शिक्षा मिलते ही अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं.

बीरभूम में हूल उत्सव में आदिवासी समाज के लोग. (फाइल फोटो: पीटीआई)

विश्व आदिवासी दिवस: ये आदिवासियों के लिए ख़ुद से सवाल पूछने का समय है

किसी भी संगठित धर्म में गया आदिवासी अपनी मूल पहचान बचाए रखने के नाम पर प्रकृति से जुड़े उत्सवों में हिस्सा लेकर इस भ्रम में रहता है कि वह ज़मीन से जुड़ा हुआ है. लेकिन क्या वह कभी ये महसूस करता है कि अपनी संस्कृति, भाषा आदि को लेकर उसका नज़रिया कैसे कथित मुख्यधारा के नज़रिये जैसा हो जाता है?

(फोटो: रॉयटर्स)

केंद्र सरकार की कोविड-19 नीति में आदिवासियों की स्थिति क्या है?

कोरोना वायरस महामारी के चलते केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट रूप से दिखता है कि आदिवासियों और वन निवासियों के अधिकारों और उनकी ज़रूरतों की अनदेखी की गई है.

छत्तीसगढ़ के बीजापुर कलेक्ट्रेट पर विरोध प्रदर्शन करते आदिवासी. (फोटो: एएनआई)

छत्तीसगढ़: तेंदू पत्ता के नकद भुगतान के लिए 50 किमी पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे आदिवासी

मामला छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले का है. 18 ग्राम पंचायतों और 50 गांवों के हजारों आदिवासी कलेक्ट्रेट पहुंचे थे. आदिवासियों का कहना है कि तेंदू पत्ता प्रमुख आय स्रोतों में से एक है और बैंक से नकद लेने के लिए शहर में आना अक्सर उस राशि की तुलना में अधिक महंगा होता है.

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बोधघाट परियोजना: छत्तीसगढ़ सरकार के सवालों पर लेखक का जवाब

18 जून 2020 को द वायर द्वारा ‘बोधघाट पनबिजली परियोजना: जंगल उजाड़कर जंगल के कल्याण की बात’ शीर्षक से प्रकाशित लेख पर छत्तीसगढ़ शासन की ओर से सवाल उठाए गए थे. उनका जवाब.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi holding the second part of two day interaction with the Chief Ministers via video conferencing to discuss the situation post Unlock 1.0 and plan for tackling the COVID-19 pandemic, in New Delhi on June 17, 2020.

विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री ने 41 कोयला खदानों में खनन की नीलामी प्रक्रिया शुरू की

मोदी सरकार के इस क़दम से देश का कोयला क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खुल जाएगा. प्रधानमंत्री ने कहा कि नीलामी प्रक्रिया की शुरुआत होना देश के कोयला क्षेत्र को ‘दशकों के लॉकडाउन’ से बाहर निकालने जैसा है. हालांकि इन कोयला खदानों के समीप रहने वाले लोगों ने कहा है कि इससे उनका अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाएगा.

इंद्रावती नदी. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स\CC-BY-2.0)

बोधघाट पनबिजली परियोजना: जंगल उजाड़कर जंगल के कल्याण की बात

बीते दिनों केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दंतेवाड़ा के पास इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित पनबिजली परियोजना को पर्यावरणीय मंज़ूरी दी है. हालांकि इसके लिए चिह्नित ज़मीन पर वन्य प्रदेश और आदिवासियों की रिहाइश होने के चलते इसके उद्देश्य पर सवाल उठ रहे हैं.