US racism

जॉर्ज फ्लॉयड (दाएं) और दिल्ली हिंसा के दौरान घायल युवक. (साभार: ट्विटर/वीडियोग्रैब)

भारत में आम नागरिकों के साथ होने वाले पुलिसिया अत्याचार सामूहिक आक्रोश की वजह क्यों नहीं हैं?

पुलिस की बर्बरता से हम सभी को फ़र्क़ पड़ना चाहिए, भले ही निजी तौर पर हमारे साथ ऐसा न हुआ हो. ये हमारी व्यवस्था का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसे बदलना चाहिए और पूरी ताक़त से मिलकर ज़ाहिर की गई जनभावना ही ऐसा कर सकती है.

Protesters hold placards as they rally against the death in Minneapolis police custody of George Floyd, in the Manhattan borough of New York City, U.S., June 2, 2020. REUTERS/Jeenah Moon

अमेरिका में चल रहा विरोध प्रदर्शन भारतवासियों के लिए आईना है और चुनौती भी

जब विरोध होता है तो व्यवस्था की ओर से उपदेश दिया जाता है कि संवाद की स्थितियां बनानी चाहिए. यह बोझ भी प्रदर्शनकारियों पर ही डाल दिया जाता है कि वे संवाद कायम करें. क्या शोषण तर्क और संवाद के सहारे चलता है? विरोध से अराजकता फैलने का आरोप लगाते समय लोग भूल जाते हैं कि जो विरोध करने को बाध्य हुए हैं, उनके जीवन में अराजकता के अलावा शायद ही कुछ है.

जॉर्ड फ्लॉयड की तस्वीर लेकर उनकी हत्या के खिलाफ विरोध प्रदर्शन. (फोटो: रॉयटर्स)

अमेरिका: अश्वेत की हत्या का आरोपी पुलिसकर्मी गिरफ़्तार, हिंसक प्रदर्शनों में एक की मौत

बीती 25 मई को अमेरिका के मिनीपोलिस अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड के गले को श्वेत पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन द्वारा आठ मिनट तक घुटने से दबाने के कारण मौत हो गई थी. फ्लॉयड की मौत के विरोध में अमेरिका के कई शहरों लॉकडाउन के बीच हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.

lynching memorial

चित्रकथा: अमेरिका के नस्लीय इतिहास के बर्बर चेहरे से रूबरू कराता पहला स्मारक

अमेरिका में सदियों से चले आ रहे अश्वेत उत्पीड़न और नस्लीय हिंसा के शिकार हज़ारों अश्वेत पीड़ितों की याद में देश का पहला स्मारक ‘द नेशनल मेमोरियल फॉर पीस एंड जस्टिस’ अलबामा के मॉन्टगोमेरी में पिछले हफ्ते खोला गया.