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पश्चिम बंगाल-केंद्र में खींचतान, आईपीएस अधिकारियों को डेपुटेशन पर भेजने से राज्य सरकार का इनकार

पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले और पार्टी के सुरक्षा में लापरवाही के आरोपों के बाद गृह मंत्रालय ने नड्डा की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार तीन अधिकारियों को केंद्र में डेपुटेशन के लिए तलब किया है. टीएमसी ने इससे इनकार करते हुए कहा है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आईपीएस या आईएएस अधिकारियों को अनुमति देना राज्य का काम है.

अमित शाह और ममता बनर्जी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

अमित शाह और ममता बनर्जी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

कोलकाता: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल में सेवारत भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के तीन अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर अपनी सेवा देने के लिए शनिवार को एकतरफा तरीके से तलब किया. अधिकारियों ने यह जानकारी दी.

उल्लेखनीय है कि यह कार्रवाई राज्य में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले और पार्टी द्वारा सुरक्षा में लापरवाही के आरोप लगाए जाने के कुछ दिन के भीतर हुई है. अधिकारियों ने बताया कि तीनों अधिकारी भाजपा अध्यक्ष की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर क्षेत्र के सिराकोल में बृहस्पतिवार को कथित टीएमसी कार्यकर्ताओं ने नड्डा के काफिले पर पत्थर फेंके, जब वह एक रैली को संबोधित करने के लिए वहां जा रहे थे.

भाजपा के सूत्रों ने दावा किया कि इसमें कैलाश विजयवर्गीय सहित कई भाजपा नेताओं को चोटें आई हैं.

तीनों आईपीएस अधिकारियों – भोलानाथ पांडे (पुलिस अधीक्षक, डायमंड हार्बर), प्रवीण त्रिपाठी (पुलिस उप महानिरीक्षक प्रेसिडेंसी रेंज) और राजीव मिश्रा (अतिरिक्त महानिदेशक, दक्षिण बंगाल)- को नौ और 10 दिसंबर को भाजपा अध्यक्ष नड्डा की राजनीतिक रूप से संवेदनशील पश्चिम बंगाल की यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

माना जा रहा है कि गृह मंत्रालय के इस कदम से पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी नीत सरकार और केंद्र की भाजपा नीत सरकार के बीच दो दिन पहले नड्डा के काफिले पर हुए हमले के पैदा हुई खींचतान और बढ़ेगी.

गृह मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि तीनों आईपीएस अधिकारी पश्चिम बंगाल कैडर के हैं और उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में सेवा के लिये बुलाया गया है.

इन अधिकारियों को उन चूकों की वजह से बुलाया गया है, जिनकी वजह से नड्डा के काफिले पर हमला हुआ. उन्होंने बताया कि यह फैसला अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों पर लागू होने वाली नियमावली के तहत लिया गया है.

अदालत में जा सकता है मामला

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी लोकसभा सांसद सौगात राय ने कहा, ‘केंद्र केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए नाम मांग सकता है. लेकिन यह तय करना राज्य का काम है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आईपीएस या आईएएस अधिकारियों को अनुमति दी जाए या नहीं. कोई अन्य विकल्प नहीं है. रिक्ति होने पर ऐसा होता है.’

उल्लेखनीय है कि सामान्य तौर पर अखिल भारतीय सेवा के किसी अधिकारी को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाने से पहले संबंधित राज्य की सहमति ली जाती है. हालांकि, केंद्र के पास किसी भी आईपीएस अधिकारी को बुलाने की शक्ति नहीं है.

आईपीएस कैडर नियम, 1954 के नियम 6 के तहत, भारत सरकार के साथ एक अधिकारी की प्रतिनियुक्ति पर केंद्र और राज्य के बीच असहमति के मामले में, केंद्र की इच्छा मान्य होती है.

‘एक कैडर अधिकारी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की सहमति के साथ, केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार या किसी कंपनी के अधीन सेवा के लिए प्रतिनियुक्त हो सकता है. बशर्ते कि किसी भी असहमति के मामले में, इस मामले का फैसला केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा और केंद्र सरकार के निर्णय को प्रभावी होंगे.’

हालांकि, देश के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए केंद्र मुश्किल से ही ऐसे आदेश का इस्तेमाल करता है. आम तौर पर केंद्र हर साल राज्यों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अधिकारियों की सूची के लिए लिखता है. अधिकारियों की इच्छा (राज्य पर बाध्यकारी नहीं) के आधार पर, राज्य सरकारें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए “प्रस्ताव सूची” भेजती हैं. इसके बाद भारत सरकार तय करती है कि प्रस्तावित सूची में से किस अधिकारी को कहां तैनात किया जाएगा. इस वर्ष केंद्र ने राज्यों को 2021 के लिए प्रस्तावित सूची के लिए 7 दिसंबर को लिखा था.

हाल के दिनों में अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को लेकर राज्य सरकारों और केंद्र के बीच कई बार झगड़े हुए हैं.

तमिलनाडु और केंद्र के बीच कुछ साल पहले राज्य कैडर अधिकारी अर्चना रामासुंदरम की प्रतिनियुक्ति पर झगड़ा हुआ था. 2014 में यूपीए सरकार ने रामासुंदरम को केंद्र में बुलाया था जहां उन्हें एडीजी के रूप में सीबीआई में शामिल होने की उम्मीद थी. जब राज्य सरकार ने उन्हें तीन महीने तक राहत नहीं दी, तो उन्होंने केंद्र को अपनी रिपोर्ट दी. राज्य सरकार ने उन्हें छुट्टी देने के बजाय केंद्र जाने के लिए निलंबित कर दिया था.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया और रामसुंदरम ने अपनी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को बरकरार रखा, लेकिन सीबीआई में सेवा करने का अवसर खो दिया. उन्हें आखिरकार सशस्त्र सीमा बल का महानिदेशक नियुक्त किया गया, जो अर्धसैनिक बल की पहली महिला प्रमुख थीं.

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी कुलदीप शर्मा ने भी इसी तरह केंद्र में जाने के लिए 2012 में लड़ाई लड़ी थी. हालांकि इन मामलों में अधिकारी केंद्र में जाने के इच्छुक थे और उनका नाम प्रस्तावित सूची में आ गया था जबकि पश्चिम बंगाल के मामले में ऐसा नहीं है.

सूत्रों का कहना है कि मामला अदालत में जा सकता है. एक आईपीएस अधिकारी ने कहा, ‘जबकि केंद्र को राज्य की सहमति के बिना भी अधिकारियों को भारत सरकार के पास बुलाने का अधिकार है, राज्य अदालत में यह तर्क दे सकता है कि केंद्र का निर्णय राज्य के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रस्त या दुर्भावनापूर्ण है.’

मुख्य सचिव और डीजीपी ने भी नहीं किया था दिल्ली तलब

इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नड्डा के काफिले पर हमले के संबंध में ही शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय और पुलिस महानिदेशक वीरेंद्र को राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिये 14 दिसंबर को पेश होने को कहा था.

हालांकि, कानून व्यवस्था को राज्य का विषय बताते हुए और अधिकारियों को तलब करने को राजनीति से प्रेरित बताते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें दिल्ली तलब करने से मना कर दिया था.

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने शनिवार को केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला को पत्र लिखकर कहा,  ‘हम आपको सूचित करना चाहते हैं कि संविधान की सातवीं अनूसूची के तहत कानून व्यवस्था राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है… ऐसे में आप कानून-व्यवस्था के संदर्भ में किसी भी तरह की चर्चा के लिए कैसे दोनों अधिकारियों को बुला सकते हैं?’

उन्होंने लिखा, ‘यह राजनीतिक उद्देश्य से और आपके मंत्री के इशारे पर उठाया गया कदम लगता है जो भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक व्यक्ति हैं, आपने वह पत्र जारी किया किया है. आप राजनीतिक बदले की भावना के तहत पश्चिम बंगाल के अधिकारियों पर दबाव डालना चाहते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि आप संघीय ढांचे में हस्तक्षेप कर रहे हैं.’

उन्होंने दावा किया कि नड्डा के काफिले में, ‘एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका और 59 अन्य मामलों में नामजद आरोपी था, जिसने सड़क के किनारे खड़े तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उकसाने वाले इशारे किए थे.’

बनर्जी ने कहा कि कानून-व्यवस्था के मामले में राज्य सरकार विधानसभा के प्रति जवाबदेह है लेकिन आपके या आपके गृह मंत्री के प्रति नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘भाजपा नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर आपने इस कार्य से कानून को हाशिये पर डाल दिया है.’

तृणमूल सांसद ने कहा कि परोक्ष रूप से पश्चिम बंगाल में आपातकाल लगाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि संसद का सत्र नहीं चल रहा है इसलिए उन्होंने पार्टी की ओर से केंद्र के कदम का कड़ाई से विरोध करने के लिए पत्र का सहारा लिया है.

अधिकारियों को लेकर पश्चिम बंगाल और केंद्र में पहले भी हो चुका है विवाद

फरवरी 2019 में सारधा चिटफंड घोटाले की जांच को लेकर सीबीआई कोलकाता में पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ के लिए पहुंची थी, लेकिन पुलिस ने यहां न सिर्फ सीबीआई को रोक दिया था बल्कि सीबीआई के पांच अफसरों को भी हिरासत में लेकर थाने चली गई थी. इसके बाद सीबीआई के खिलाफ ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं थीं.

फरवरी माह में ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया था. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह चिट फंड घोटाला मामले में जांच में सहयोग के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को दिशानिर्देश जारी करे.

फरवरी माह में पश्चिम बंगाल सरकार और सीबीआई के बीच मची इस खींचतान के दौरान ही कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) के एडीजी और इंस्पेक्टर जनरल पुलिस (आईजीपी) के पद पर स्थानांतरित कर दिया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)