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एनआईए ने स्टेन स्वामी की ज़मानत याचिका का विरोध किया, दो संगठनों को माओवादी बताया

विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त 83 वर्ष के फादर स्टेन स्वामी को एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार किया गया था. उनकी ज़मानत का विरोध करते हुए जिस पीसीयूएल को ‘माओवादी’ बताया गया, उसकी स्थापना समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने की थी और भाजपा के रविशंकर प्रसाद और अरुण जेटली इससे जुड़े रहे हैं.

फादर स्टेन स्वामी. (फोटो: पीटीआई)

फादर स्टेन स्वामी. (फोटो: पीटीआई)

मुंबईः एल्गार परिषद मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने 30 साल पुरानी मानवाधिकार संस्था पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) को प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का अगुआ संगठन बताया है.

एनआईए ने गिरफ्तार किए गए मानवाधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी की जमानत याचिका का विरोध करते हुए यह दावा किया है.

एनआईए ने इसी तरह के दावे झारखंड की आदिवासी अधिकार संगठन विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन को लेकर किए हैं.

स्वामी को पिछले साल अक्टूबर में गिरफ्तार किया गया था. वह 83 वर्ष के हैं और पार्किंसंस बीमारी के अलावा उम्र संबंधी कई अन्य बीमारियों से जूझ रहे हैं.

स्वामी उन 16 शिक्षाविदों, वकील और कार्यकर्ताओं में से एक हैं, जिन्हें एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया है.

इस मामले में पहले दौर की गिरफ्तारियां जून 2018 में हुई थीं. उस समय पुणे पुलिस इस मामले को देख रही थी लेकिन बाद में एनआईए ने महाराष्ट्र में भाजपा सरकार के गिरने के बाद पिछले साल जनवरी में एनआईए ने इस मामले की जिम्मेदारी ली.

स्वामी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान विशेष सरकारी अभियोजक प्रकाश शेट्टी ने अदालत के समक्ष कहा कि वह (स्टेन) वास्तव में आदिवासी समुदाय के लिए आवाज उठाने की आड़ में माओवादियों के एजेंडा को साध रहे थे.

बता दें कि आदिवासी अधिकारों की पैरवी करने वाले स्टेन स्वामी अपने सार्वजनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा झारखड़ के जनजातीय क्षेत्र में काम करते गुजार चुके हैं.

शेट्टी ने कहा कि स्वामी अपने सामाजिक कार्य की आड़ में सीपीआई (माओवादी) के एजेंडा को पूरा कर रहे थे.


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शेट्टी ने द हिंदू को बताया, ‘भयानक सच्चाई यह है कि सामाजिक कार्यों के नाम पर फादर स्टेन स्वामी और सह आरोपी सीपीआई (माओवादी) के उद्देश्यों को हासिल करने की दिशा में काम कर रहे हैं.’

बता दें कि यह कोई पहली बार नहीं है कि किसी मानवाधिकार संगठन को माओवादी संगठन के तौर पर चिह्नित किया जा रहा है.

एनआईए ने अपनी चार्जशीट में इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर्स (आईएपीएल) का नाम लिया, जिसके दो सदस्य गिरफ्तार किए गए सुरेंद्र गाडलिंग और सुधा भारद्वाज इन संगठनों में से एक का हिस्सा हैं.

पुणे के एक सांस्कृतिक समूह कबीर कला मंच का नाम भी माओवादी एजेंडा को पूरा करने के तौर पर लिया जा रहा है. इनमें से किसी भी संगठन के पास केंद्र सरकार की ओर से जारी की गई अधिसूचना नहीं है, जिसमें इन्हें यूएपीए के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी प्रतिबंधित संगठन का अगुआ मोर्चा कहने से प्रशासन को किसी शख्स या संगठन को निशाना बनाने या उन्हें गैरकानूनी के रूप में चिह्नित करने का अधिकार नहीं मिल जाता.

विशेषज्ञों का कहना है कि कानून में कमियां हैं और ये कमियां इनका दुरुपयोग करने की मंशा से ही हैं.

बॉम्बे हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मिहिर देसाई और पीयूसीएल की महाराष्ट्र इकाई के संयोजक ने एनआईए द्वारा संगठन की प्रतिष्ठा धूमिल करने के प्रयासों को हास्यास्पद बताया.

देसाई ने द वायर  को बताया, ‘इन्होंने पूर्व में भी हास्यास्पद और गैर जिम्मेदाराना बयान दिए हैं. ये हर मानवाधिकार संगठन के पीछे पड़े हैं और अब ये पीसीयूएल को निशाना बना रहे हैं.’

देसाई ने कहा, ‘पीसीयूएल आपातकाल का प्रत्यक्ष परिणाम था. समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने इसकी स्थापना की थी. भाजपा के रविशंकर प्रसाद और अरुण जेटली सहित कई वकील पीसीयूएल से जुड़े रहे.’

स्टेन स्वामी ने चार साल पहले अपने एक निंबध में कहा था कि विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन एनजीओ नहीं है बल्कि लोगों का आंदोलन हैं, जो झारखंड के अलग राज्य बनने के पहले दशक के दौरान अस्तित्व में आया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)