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कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख की टिप्पणी पर भारत ने कहा- ज़मीनी हक़ीक़त नहीं

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैचलेट ने कहा था कि जम्मू कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक सभाओं और संचार सेवाओं पर पाबंदी लगाए जाने का सिलसिला जारी है, जबकि सैकड़ों लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का प्रयोग करने के लिए हिरासत में हैं. साथ ही पत्रकारों को लगातार बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ता है.

(फोटो: रॉयटर्स)

संयुक्त राष्ट्र/जिनेवा: भारत ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख द्वारा की गई अनुचित टिप्पणियों पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी टिप्पणियां जमीनी हकीकत को नहीं दर्शाती हैं और मानवाधिकारों को बनाए रखने में किसी भी कमी को निष्पक्ष तरीके से संबोधित किया जाना चाहिए तथा देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.

विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) रीनत संधू ने कहा, ‘हमने उच्चायुक्त द्वारा मौखिक अपडेट में भारत के संदर्भों का संज्ञान लिया है और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर पर उनकी अनुचित टिप्पणी पर अपनी निराशा व्यक्त करते हैं, जो जमीनी हकीकत को नहीं दर्शाता है.’

संधू ने मंगलवार को मानवाधिकार परिषद के 48वें सत्र में उच्चायुक्त के मौखिक रूप से अपडेटेड स्थिति पर सामान्य बहस के तहत भारत की टिप्पणी में यह कहा.

संधू ने कहा कि वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और उसके संरक्षण के लिए भारत का दृष्टिकोण एक बहुलवादी और समावेशी समाज और जीवंत लोकतंत्र के रूप में हमारे अपने अनुभव पर आधारित हैं.

उन्होंने कहा कि भारत का मानना है कि मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण को देशों के बीच संवाद, परामर्श और सहयोग के माध्यम से तथा तकनीकी सहायता तथा क्षमता निर्माण के प्रावधान के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, संधू ने कहा कि भारत का संविधान बुनियादी मानवाधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में सुनिश्चित करता है.

उन्होंने कहा, ‘हमारी संसद, स्वतंत्र न्यायपालिका, जीवंत मीडिया और नागरिक समाज हमारे लोगों द्वारा मानवाधिकारों का पूरा इस्तेमाल सुनिश्चित करते हैं.’

अफगानिस्तान पर संधू ने कहा कि देश में स्थिति गंभीर चिंता की बनी हुई है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा प्रस्ताव 2593 को अफगानिस्तान के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दृष्टिकोण का मार्गदर्शन करना चाहिए.

अगस्त में भारत की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव पारित किया था जिसमें महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों को बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया गया था जो अफगानिस्तान छोड़ने के इच्छुक लोगों के लिए सुरक्षित मार्ग की अनुमति देता है और मानवीय सहायता के लिए निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करता है.

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शांति और सम्मान से जीने की इच्छा रखने वाले अफगानिस्तान के लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए.

भारत की वैश्विक संस्था की अध्यक्षता में 30 अगस्त को अपनाए गए यूएनएसी के प्रस्ताव में अफगानिस्तान में मानवाधिकारों को बनाए रखने की आवश्यकता के बारे में बात की गई, मांग की गई कि अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए नहीं किया जाना चाहिए और संकट को हल करने के लिए बातचीत के जरिए राजनीतिक समाधान निकाला जाना चाहिए.

मालूम हो कि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैचलेट ने भारत में गैर-कानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम (यूएपीए) के इस्तेमाल और जम्मू कश्मीर में ‘बार-बार’ अस्थायी रूप से संचार सेवाओं पर पाबंदी लगाए जाने को सोमवार को ‘चिंताजनक’ बताया था.

उन्होंने कहा था, ‘जम्मू कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक सभाओं और संचार सेवाओं पर बार-बार पाबंदी लगाए जाने का सिलसिला जारी है, जबकि सैकड़ों लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिए हिरासत में हैं. साथ ही पत्रकारों को लगातार बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ता है.’

बैचलेट ने कहा था, ‘पूरे भारत में गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम का उपयोग चिंताजनक है. जम्मू कश्मीर में ऐसे सबसे अधिक मामले सामने आए हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)