नॉर्थ ईस्ट

नॉर्थ ईस्ट डायरीः सीबीआई अदालत ने मणिपुरी छात्र की मौत की दोबारा जांच के आदेश दिए

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में मणिपुर, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम के प्रमुख समाचार.

प्रतीकात्मक तस्वीर. (साभार: Joe Gratz/Flickr CC0 1.0)

इम्फाल/गुवाहाटी/शिलॉन्ग//ईटानगर/आइजॉलः सीबीआई की विशेष अदालत ने मणिपुर के छात्र प्रवीश चनम की मौत की दोबारा सीबआई जांच के आदेश दिए हैं. प्रवीश की सितंबर 2017 में नोएडा में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में सीबीआई द्वारा दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती देते हुए चनम के परिवार को याचिका दायर करने की अनुमति देते हुए अदालत ने कहा कि जांचकर्ता एजेंसी (सीबीआई) ने मामले में कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की थी.

सीबीआई के विशेष जज शिवांक सिंह ने आदेश में कहा, ‘यह कहा जा सकता है कि जो दर्शाया गया, मामला उससे कहीं अधिक है. एक तरह से भ्रामक क्लोजर रिपोर्ट के जरिये अदालत को गुमराह या धोखा देने की मंशा अब स्पष्ट हो गई है इसलिए मामले में आगे की जांच किए जाने की जरूरत है. इसी के अनुरूप विरोध याचिका को मंजूरी दी जाती है और सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज किया जाता है. सीबीआई को मामले की जांच करने के निर्देश दिए जाते हैं.’

अदालत ने शुरुआत में मामले की जांच कर रही उत्तर प्रदेश पुलिस को भी जांच में खामियों को लेकर फटकार लगाई.

अदालत ने कहा, ‘यह भी पता चला है कि यूपी पुलिस की जांच में कई खामियां थीं. अदालत को दुख है कि इन चूक और खामियों की वजह से मृतक के परिवार और माता-पिता को अपने बच्चे का शव देखने और उसका अंतिम संस्कार करने का भी मौका नहीं मिला.’

अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी को मामले की जांच कर रहे दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं.

बता दें कि मणिपुर के 22 साल के प्रवीश एक म्यूजिक कंसर्ट में भाग लेने नोएडा आए थे लेकिन नौ सितंबर 2017 में उसका शव बरामद किया गया. शव मिलने के चार दिन बाद स्थानीय पुलिस ने बिना परिवार का इंतजार किए ऑटोप्सी के बाद शव का अंतिम संस्कार कर दिया जबकि पीड़ित के दोस्तों द्वारा पहले ही उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी.

असम: प्रदर्शनकारी छात्रों ने महिला शिक्षक को घुटने पर बैठाकर माफी मंगवाई, जांच के आदेश

असम के तिनसुकिया के फिलोबरी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में एक महिला शिक्षक को घुटने टेककर बैठने के लिए मजबूर करने की घटना सामने आई है, जिसके बाद असम सरकार ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं.

द सेंटिनल की रिपोर्ट के मुताबिक, फीस बढ़ोतरी का विरोध कर रहे छात्रों ने दोनों पक्षों के बीच विवाद के बाद एक महिला शिक्षक को आंदोलनकारी छात्रों के समक्ष घुटने के बल बैठने और उनसे माफी मांगने के लिए मजबूर किया.

यह घटना उस वक्त हुई जब फिलोबरी सीनियर सेकेंड्री स्कूल के छात्र फीस बढ़ाए जाने को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे.

11 अक्टूबर को छात्रों ने प्रदर्शन के दौरान सड़क भी ब्लॉक कर दी थी. स्कूल के शिक्षकों ने छात्रों को समझाकर आंदोलन को खत्म करने और सड़क जाम को हटवाने की कोशिश की थी, जिसके बाद छात्रों और शिक्षकों के बीच तनातनी हो गई थी. इस बीच छात्रों ने एक महिला शिक्षक को घेर लिया और फिर उन्हें घुटने पर बैठकर माफी मांगने के लिए मजबूर किया.

इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद इसकी खासी आलोचना हुई. तिनसुकिया जिला प्रशासन ने तुरंत घटना की जांच के आदेश दिए और तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा.

वहीं, ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) ने माफी मांगते हुए बताया है कि यूनियन ने घटना के दौरान मौजूद एक सदस्य को निष्कासित कर दिया है.

एक वीडियो संदेश में आसू के महासचिव शंकर ज्योति बरुआ ने कहा, ‘आसू विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं था. हालांकि, हमारा एक सदस्य इस प्रदर्शन में शामिल था और इसलिए हमने उसे तुरंत निष्कासित कर दिया है. हम घटना के लिए माफी मांगते हैं. आसू शिक्षकों के किसी भी तरह के अपमान का समर्थन नहीं करता है.’

ऑल असम कांग्रेस समिति (एआईसीसी) ने भी घटना की निंदा करते हुए असम सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह घटना पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हुई.

एआईसीसी ने असम सरकार से मामले की जांच करने असम की शिक्षक के अपमान की इस घटना को बढ़ावा देने, इसमें सक्रिय रूप से भाग लेने या मौन रूप से शामिल होने वालों को दंडित करने को कहा है.

मेघालयः सिख संगठन ने पंजाबी लेन से संबंधित मामले में राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की

शिलॉन्ग में पंजाबी लेन. (फाइल फोटोः पीटीआई)

दिल्ली के एक सिख संगठन ने गुरुवार को पंजाबी लेन या थेम लीयू मावलोंग इलाके से गैर-सरकारी कर्मचारियों को स्थानांतरित किए जाने के प्रयास को लेकर मेघालय सरकार पर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्रवाई करने का आरोप लगाया और पंजाबी लेन के ‘अवैध निवासियों’ को हटाने से रोकने के लिए राज्यपाल सत्यपाल मलिक से हस्तक्षेप की मांग की.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (डीएसडीएमसी) के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि उन्होंने बीते हफ्ते पंजाबी लेन से अवैध निवासियों को हटाने के फैसले पर चर्चा की और राज्यपाल मलिक ने हमें आश्वासन दिया कि बिना उचित प्रक्रिया के किसो को भी स्थानांतरित नहीं किया जाएगा.

राज्य मंत्रिमंडल ने पिछले सप्ताह एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा इस क्षेत्र के अवैध निवासियों को स्थानांतरित करने की सिफारिश का समर्थन किया, जिसकी शुरुआत सरकारी कर्मचारियों को शहर में उनके आधिकारिक आवासों में स्थानांतरित करने से हुई थी.

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के प्रतिनिधिमंडल ने राजभवन में राज्यपाल से मुलाकात की और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उल्लेख किया गया कि उनके हस्तक्षेप के बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं होगा.

समिति के अध्यक्ष एमएस सिरसा ने ज्ञापन में कहा कि इलाके से गैर-सरकारी कर्मचारियों का प्रस्तावित स्थानांतरण राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इस कदम से सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है.

ज्ञापन में कहा गया, ‘हमें उम्मीद है कि आप पेश की गई जानकारी के आधार पर हस्तक्षेप करेंगे और लंबे समय से बसे लोगों/हरिजन समुदाय को तत्काल समाधान उपलब्ध कराएंगे.’

बता दें कि मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा कैबिनेट ने सात अक्टूबर को शिलॉन्ग के थेम इव मावलोंग इलाके के सिख लेन से सिखों को अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी.

यह फैसला उपमुख्यमंत्री प्रेस्टन तिनसॉन्ग की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों पर आधारित है.

क्षेत्र में स्थानीय खासी और सिख समुदाय के बीच हुई मई 2018 में हुई हिंसक झड़प के बाद दशकों पुराने भूमि विवाद का समाधान खोजने के लिए जून 2018 में एक समिति का गठन किया गया था.

सरकार का दावा है कि यह विवादित जमीन शहरी मामलों के विभाग से जुड़ी है. वहीं, सिखों का कहना है कि यह जमीन उन्हें 1850 में खासी हिल्स के प्रमुखों में से एक हिमा माइलीम ने उपहार में दी थी. आज माइलीम खासी हिल्स स्वायत्त जिला परिषद के तहत 54 पारंपरिक प्रशासनिक क्षेत्रों में से एक है और पंजाबी लेन इसका हिस्सा है.

कैबिनेट के सात अक्टूबर के फैसले के मुताबिक, शहरी मामलों का विभाग एक हफ्ते के भीतर माइलीम के प्रमुख से जमीन का कब्जा ले लेगा.

अरुणाचल प्रदेशः चीन ने उपराष्ट्रपति के अरुणाचल दौरे पर आपत्ति जताई

चीन ने  भारत के उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू के अरुणाचल प्रदेश के हालिया दौरे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वह इस दौरे के पूरी तरह खिलाफ है क्योंकि बीजिंग ने अरुणाचल प्रदेश को कभी राज्य को मान्यता नहीं दी.

बता दें कि नायडू ने नौ अक्टूबर को अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था और राज्य विधानसभा के एक विशेष सत्र को संबोधित किया था.

उन्होंने इस दौरान कहा था कि पूर्वोत्तर में स्पष्ट बदलाव क्षेत्र में विकास के पुनरुत्थान का स्पष्ट साक्ष्य है जिसकी दशकों तक अनदेखी की जाती रही.

चीन अपनी स्थिति दिखाने के लिए भारतीय नेताओं के अरुणाचल प्रदेश दौरे पर नियमित तौर पर आपत्ति व्यक्त करता रहा है.

भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारतीय नेता इस राज्य का समय-समय पर उसी तरह दौरा करते हैं जिस तरह कि वे देश के अन्य हिस्सों का दौरा करते हैं.

नायडू के दौरे के बारे में चीन की आधिकारिक मीडिया द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजान ने कहा कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश को कभी मान्यता नहीं दी है.

उन्होंने कहा, ‘सीमा मुद्दे पर चीन की स्थिति अडिग और स्पष्ट है. चीन सरकार ने कभी भी भारतीय पक्ष द्वारा एकतरफा और अवैध रूप से स्थापित तथाकथित अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं दी है एवं यह भारतीय नेता के संबंधित क्षेत्र के दौरे का कड़ा विरोध करता है.’

लिजान ने कहा, ‘हम भारतीय पक्ष से चीन की प्रमुख चिंताओं का ईमानदारी से सम्मान करने और ऐसी किसी कार्रवाई से बचने का आग्रह करते हैं जिससे सीमा मुद्दा और जटिल तथा विस्तारित हो एवं जो आपसी विश्वास और द्विपक्षीय संबंधों को कमतर करे.’

प्रवक्ता ने कहा, ‘इसके बजाय इसे चीन-भारत सीमा क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने के लिए वास्तविक ठोस कार्रवाई करनी चाहिए तथा द्विपक्षीय संबंधों को वापस पटरी पर लाने में मदद करनी चाहिए.’

भारत कहता रहा है कि द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति के लिए पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से संबंधित मुद्दों का समाधान आवश्यक है.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की यह टिप्पणी पूर्वी लद्दाख में 17 महीने से भारत और चीन के बीच चले आ रहे गतिरोध को दूर करने में विफल रहने के कुछ दिन बाद आई है.

भारतीय सेना ने सोमवार को कहा कि रविवार को हुई 13वें दौर की सैन्य वार्ता में उसके द्वारा दी गई सकारात्मक सलाह पर चीनी पक्ष सहमत नहीं हुआ और न ही वह उम्मीद दिखाने वाला कोई प्रस्ताव दे सका.

मिज़ोरमः उपचुनाव में त्रिपुरा के ब्रू मतदाताओं को वोट नहीं डालने देंगे- संगठन

मिजोरम के एक प्रभावशाली नागरिक समाज संगठन का कहना है कि वह अक्टूबर मिजोरम में तुइरियल विधानसभा सीट पर 30 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव के लिए त्रिपुरा में रह रहे ब्रू समुदाय के मतदाताओं को वोट नहीं डालने देंगे.

संगठन ने कहा कि अगर त्रिपुरा में रह रहे ब्रू समुदाय के मतदाताओं के लिए विशेष मतदान केंद्रों का प्रबंध किया जाता है तो वह इसमें बाधा उत्पन्न करेंगे.

तुइरियाल विधानसभा सीट पर 663 ब्रू मतदाता हैं, जिन्हें मिजोरम से भागने के बाद त्रिपुरा के राहत शिविरों में शरण लेने के लिए मजबूर हैं.

बता दें कि 1997 में ब्रू आतंकियों द्वारा मिजोरम के एक फॉरेस्ट गार्ड की हत्या के बाद भड़के जातीय तनाव के डर से हजारों की संख्या में ब्रू लोग त्रिपुरा चले गए थे.

सेंट्रल यंग मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) के अध्यक्ष वनलालरुता ने बताया कि वह पिछले साल जनवरी में हुए समझौते के बाद त्रिपुरा में बसे ब्रू समुदाय के मतदाताओं के नाम मिजोरम की मतदाता सूची से हटाने की मांग कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि ब्रू मतदाता अब मिजोरम से जुड़े हुए नहीं है क्योंकि उन्होंने प्रत्यर्पण के दौरान राज्य लौटने से इनकार कर दिया था.

बता दें कि ब्रू लोगों को उनके गृहराज्य भेजने के प्रयास असफल होने के बाद सरकार ने उन्हें 6िपुरा में ही दोबारा बसाने की व्यवस्था की थी.

उन्होंने कहा, ‘हम आगामी उपचुनाव में ब्रू मतदाताओं के लिए विशेष मतदान केंद्रों की व्यवस्था करने के कदमों की कड़ी निंदा करते हैं. हालांकि, अगर वे मिजोरम में अपने मतदान केंद्रों पर वोटिंग करते हैं तो हमें इससे कोई दिक्कत नहीं है.’

उन्होंने कहा कि अगर ब्रू समुदाय के मतदाताओं के लिए विशेष मतदान केंद्रों की व्यवस्था की जाती है तो संगठन इसमें बाधा उत्पन्न करेगा.

हाल ही में राज्य के राजनीतिक दलों ने चुनव आयोग से तुइरियाल उपचुनाव से पहले राज्य की मतदाता सूची से ब्रू मतदाताओं के नाम हटाने का आग्रह किया था.

इस बीच राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी पी. जवाहर ने ब्रू मतदाता मुद्दे और चुनाव की तैयारियों को लेकर बुधवार को एनजीओ के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी.

मालूम हो कि केंद्र सरकार, मिजोरम और त्रिपुरा की सरकारों और ब्रू संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच पिछले साल 16 जनवरी को हुए समझौते के मुताबिक वापसी के दौरान मिजोरम नहीं लौटे 35,000 से अधिक विस्थापित ब्रू आदिवासियों को त्रिपुरा में बसाया जाएगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)