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पटियाला हाउस हमला: भाजपा विधायक बरी, नहीं हुई फुटेज रिकॉर्ड करने वालों से पूछताछ

साल 2016 में जेएनयू में हुई कथित नारेबाज़ी के मामले में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के इंतज़ार में भाकपा सदस्य अमीक जामेई अदालत के बाहर खड़े थे, तभी उन पर हमला हुआ था. भाजपा विधायक ओम प्रकाश शर्मा और दिल्ली के पूर्व विधायक तरविंदर सिंह मारवाह पर इसका आरोप लगा था.

तत्कालीन भाकपा सदस्य अमीक जामेई का कॉलर पकड़े हुए भाजपा विधायक ओम प्रकाश शर्मा. (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने बीते मंगलवार को भाजपा विधायक ओम प्रकाश शर्मा और दिल्ली के पूर्व विधायक तरविंदर सिंह मारवाह को उस मामले में बरी कर दिया, जिन पर फरवरी 2016 में पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर तत्कालीन भाकपा सदस्य अमीक जामेई पर हमला करने का आरोप लगाया गया था.

जामेई साल 2016 के जेएनयू में हुई कथित नारेबाजी के मामले में जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के इंतजार में अदालत के बाहर खड़े थे.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (एसीएमएम) रवींद्र कुमार पांडे ने कहा कि कथित हमले को कैप्चर करने वाले विभिन्न मीडिया घरानों से जब्त की गई सीडी/डीवीडी ‘कानून के अनुसार मान्य साबित नहीं हुई है, क्योंकि सीडी/डीवीडी में सामग्री को रिकॉर्ड और कवर करने वाले व्यक्ति की गवाह के तौर पर पूछताछ नहीं की गई थी’.

उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से इस संबंध में कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.

कोर्ट ने कहा कि इसी तरह घटना को कवर कर रहे फोटो पत्रकारों से भी बतौर गवाह पूछताछ नहीं की गई या उन्हें जांच में सहयोगी नहीं बनाया गया, और इस संबंध में कोई तार्किक स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया है.

अदालत ने कहा, ‘घटना का कोई अन्य चश्मदीद जांच में शामिल नहीं किया गया था या मुकदमे में पेश नहीं किया गया था और अभियोजन पक्ष या जांच एजेंसी द्वारा इसका कोई वैध स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.’

अदालत ने आगे कहा कि एकमात्र गवाह जामेई ने ‘विरोधाभासी बयान’ दिया है.

एसीएमएम पांडे ने अपने फैसले में लिखा, ‘आरोपी शर्मा और शिकायतकर्ता जामेई अलग-अलग राजनीतिक दलों और अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े हैं और 2013-2014 से एक-दूसरे को जानते थे.’

अदालत ने कहा कि जामेई ने अपनी प्रारंभिक शिकायत और अपराध करने में भूमिका के बारे में अपने नाम का खुलासा नहीं किया था. इसके बाद जब उन्हें गवाह के रूप में बुलाया गया था और 27.10.2020 तथा 03.02.2021 को उनसे पूछताछ की गई थी, तो उन्होंने ‘अपने शुरुआती बयान में सुधार किया था’.

अदालत ने कहा कि तीन फरवरी, 2021 को दर्ज किए गए अपने बयान में जामेई ने शर्मा पर यह कहने का आरोप लगाया था कि ‘अगर बंदूक होती तो गोली मार देता’, लेकिन 27 अक्टूबर, 2020 को दर्ज उनके बयान में यह बात नहीं कही गई थी.

कोर्ट ने कहा कि जामेई ने अपने अक्टूबर 2020 के बयान में कहा था कि शर्मा एक भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे और ‘जस्टिस फॉर रोहित वेमुला कैंपेन’ के लिए उन पर हमला किया था, धमकी दी थी, हालांकि पुलिस के सामने दर्ज शिकायत में ऐसा कोई विवरण नहीं था.

इसके अलावा प्रोफेसर आयशा किदवई के साथ कुछ पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार करने के आरोपों पर अदालत ने कहा, ‘शिकायतकर्ता द्वारा ऐसा कोई खुलासा नहीं किया गया था, जब उसने 15.02.2016 को अपनी लिखित शिकायत दी थी.’

इस प्रकार अदालत ने आरोपी को आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाने की सजा), 341 (गलत तरीके से रोक लगाने की सजा), 506 (आपराधिक धमकी के लिए सजा) और 34 (सामान्य इरादा) के तहत आरोपों से बरी कर दिया.