राजनीति

चुनाव से पहले योजनाओं का ताबड़तोड़ लोकार्पण यूपी की डबल इंजन सरकार को कितना फ़ायदा पहुंचाएगा?

उत्तर प्रदेश का 2021-22 का बजट 5.5 लाख करोड़ रुपये का है. आंकड़े दिखाते हैं कि प्रदेश में चुनावी तैयारी के बीच भाजपा के तीन बड़े नेताओं- नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी और योगी आदित्यनाथ ने बीते डेढ़ महीने में ही इसके एक तिहाई हिस्से के बराबर की योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया है.

25 नवंबर 2021 को जेवर में नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. साथ में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (फोटो साभार: पीआईबी)

उत्तर प्रदेश में दिसंबर 2016 की सर्दियां अखिलेश यादव के लिए और दिसंबर 2021 की सर्दियां योगी आदित्यनाथ के लिए लगभग एक जैसी गुजरीं.

20 दिसंबर 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लखनऊ में कई परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण कर रहे थे. अगले दिन अखबारों की सुर्खियां थीं ‘5 घंटे के अंदर अखिलेश ने किया रिकॉर्ड तोड़ योजनाओं का उद्घाटन’.

तब प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, अखिलेश यादव ने 5 घंटे में 60 हज़ार करोड़ रुपये की परियोजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास कर डाला था. एक ही जगह से सैकड़ों परियोजनाओं के पत्थर चमका दिए गए और परियोजनाएं ‘शुरू’ हो गईं.

उस समय योगी आदित्यनाथ ने संभवत: ये नहीं सोचा होगा कि ठीक पांच साल बाद उसी दिन वह भी कुछ ऐसा ही कर रहे होंगे. 20 दिसंबर 2021 को योगी आदित्यनाथ मिर्ज़ापुर जिले में थे. उनके साथ केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और अपना दल की मुखिया और केंद्र सरकार में मंत्री अनुप्रिया पटेल भी थीं.

ठीक अखिलेश यादव की तरह ही योगी आदित्यनाथ भी चुनाव से ठीक पहले ‘शुरू’ होने वाली योजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास कर रहे थे.

योगी, गडकरी और अनुप्रिया पटेल की मौजूदगी में मिर्ज़ापुर में 3,037 करोड़ रुपये की लागत से 146 किलोमीटर की सड़कों और जौनपुर में 1,538 करोड़ रुपये की लागत से 86 किलोमीटर लंबी सड़कों के अलावा 348 अन्य परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया.

ठीक पांच साल के अंतर पर हुईं ये दो घटनाएं बताती हैं कि चुनावी आचार संहिता लगने से ठीक पहले सरकारी तंत्र सत्ताधारी पार्टी के लिए माहौल बनाने के उद्देश्य से एक्टिव रहता है और इतनी योजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास कर दिया जाता है कि आम जनता गिनती छोड़ सिर्फ़ ‘माहौल’ देख पाती है.

इन शिलान्यास और लोकार्पण के फ़ायदे नुकसान के बारे में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) के प्रोफेसर संजय कुमार कहते हैं, ‘चुनाव से ठीक पहले इस तरह के लोकार्पण और शिलान्यास से थोड़ा-बहुत माहौल ज़रूर बनता है, लेकिन सिर्फ़ इसी के आधार पर चुनाव नहीं जीते जा सकते. हालांकि, जो मतदाता माहौल देखकर वोट करते हैं उनको रिझाने के लिए लिए इस तरह के उद्घाटन कई बार काम कर जाते हैं. इसके बावजूद, यह ज़रूरी है कि सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ़ एकतरफ़ा माहौल न हो और उसका आधार मजबूत रहे.’

क्या सचमुच ‘फ़र्क़ साफ़ है’?

उत्तर प्रदेश का 2021-22 का बजट 5.5 लाख करोड़ रुपये का है. अगर भाजपा के तीन बड़े नेताओं नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी और योगी आदित्यनाथ के हाथों किए गए लोकार्पण/शिलान्यास का डेटा देखा जाए, तो इन तीन नेताओं ने प्रदेश के बजट के लगभग एक तिहाई के बराबर की योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण सिर्फ़ डेढ़ महीने में कर दिया है.

भाजपा अपने विज्ञापनों में सपा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए ‘फ़र्क़ साफ़ है’ का नारा दे रही है. लेकिन अखिलेश यादव के 5 घंटे में 60 हज़ार करोड़ रुपये के लोकार्पण/शिलान्यास हों या भाजपा सरकार की इस डबल इंजन सरकार के लोकार्पण/शिलान्यास, दोनों एक ही बात साबित करते हैं कि चुनाव से ठीक पहले नारियल फोड़ने की योजना हर पार्टी के लिए एक जैसी ही है.

उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा, पीएम नरेंद्र मोदी और विपक्ष के लिहाज से ‘करो या मरो’ वाला है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अगर भाजपा 2022 में यूपी का चुनाव हार जाती है, तो विपक्ष के लिए 2024 में कुछ उम्मीदें हो सकती हैं. वहीं, भाजपा हर हाल में ऐसी किसी भी आशंका/संभावना को जन्म ही नहीं देना चाहती है.

यही कारण है कि भाजपा के सबसे बड़े चेहरे नरेंद्र मोदी खुद एक महीने में सात बार उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं. गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा तमाम दूसरे केंद्रीय और राज्य कैबिनेट के मंत्री यूपी चुनाव से पहले जमकर पसीना बहा रहे हैं.

खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दिसंबर महीने के लगभग हर दिन अलग-अलग जिलों में दौरा कर चुके हैं. इन जिलों में सीएम योगी के दौरे के साथ ही करोड़ों रुपये की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया.

योगी के इन कार्यक्रमों में धार्मिक महत्व के क्षेत्र, विधानसभा के हिसाब से क्षेत्र और सीटों के गणित का भी भरपूर ध्यान रखा गया. अयोध्या, मथुरा, वाराणसी और इलाहाबाद में ही लगभग 35 हजार करोड़ रुपये की योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 20 दिसंबर, 2021 से 8 जनवरी, 2022 के बीच लगभग 40 जिलों में कार्यक्रम किए हैं. हमने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ट्विटर टाइम लाइन पर शिलान्यास और लोकार्पण से जुड़ी जानकारी इकट्ठा की.

उनके और पार्टी के ट्वीट्स से इकट्ठा हुए डेटा से यह पता चलता है कि इन कार्यक्रमों के दौरान सीएम योगी ने 29,856 करोड़ रुपये से ज़्यादा की लगभग 3,000 अलग-अलग परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया है. इसमें, सिंचाई परियोजनाएं, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, सड़क परियोजनाएं, विद्युत विभाग की परियोजनाएं, मेडिकल कॉलेज और कई अन्य तरह की परियोजनाएं शामिल हैं.

इस तरह आखिरी समय में होने वाले लोकार्पण और शिलान्यास पर यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड में पीएचडी स्कॉलर और राजनीतिक विश्लेषक कार्तिकेय बत्रा कहते हैं, ‘इस तरह के शिलान्यास या लोकार्पण से लोकल कैडर सक्रिय हो जाता है. उसे जनता के बीच जाने और गिनाने के लिए काम मिल जाते हैं. इसके अलावा अगर पीएम मोदी, सीएम योगी या इस कद के अन्य नेता आते हैं, तो आम जनता भी इवेंट से खुद को जोड़ती है. इसका फ़ायदा बेशक सत्ता पक्ष को मिलता है.’

यही कारण है कि योगी ने जिन जिलों का दौरा किया है, उनमें से ज़्यादातर जिले पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं. इससे इस बात को समझा जा सकता है कि सीएम योगी खुद पूर्वी यूपी को तरजीह दे रहे हैं.

हालांकि, इसे भाजपा की सोची-समझी रणनीति भी कहा जा सकता है, क्योंकि पश्चिमी यूपी की अपेक्षा, पूर्वी यूपी में ‘ब्रैंड योगी’ ज़्यादा कारगर साबित हो सकता है.

क्या कहती है जनता

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में 25 दिसंबर को अयोध्या-इलाहाबाद मार्ग के लिए बाइपास और अन्य कई परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया. शिलान्यास कार्यक्रम के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी पहुंचे.

इसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने गए स्थानीय निवासी सुरेंद्र सिंह कहते हैं, ‘बाइपास बनना काफ़ी फायदेमंद होगा. हालांकि, कई साल से हमें इसका इंतजार था. हमें तो काम से मतलब है, चाहे चुनाव के ठीक पहले हो या कभी भी.’ हालांकि, सुरेंद्र का यह भी मानना है कि अब किए जा रहे लोकार्पण और शिलान्यास पूरी तरह से चुनाव को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं.

मुख्यमंत्री योगी की सभाओं में जिन जिलों में किसी न किसी योजना का लोकार्पण या शिलान्यास किया गया है, उनमें विधानसभा सीटों की संख्या देखें तो यह 200 से ज़्यादा है.

गौरतलब है कि भाजपा ने न सिर्फ़ अपनी जीती हुई सीटों पर ध्यान दिया है, बल्कि गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले अमेठी-रायबरेली और समाजवादी पार्टी का गढ़ कहे जाने वाले आजमगढ़ में भी तमाम परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया है.

चुनावी समय में शिलान्यासों के बारे में उत्तर प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘ज़रूरी नहीं है कि जितनी योजनाओं का शिलान्यास हो रहा है, उन सब पर तुरंत काम शुरू हो जाए. कई बार शिलान्यास का काम प्रोजेक्ट के टेंडर से पहले भी हो जाता है. ऐसे में अगर सरकार बदल जाती है, तो पूरा प्रोजेक्ट रद्द हो सकता है या फिर उसे नए सिरे से शुरू किया जाता है.’

प्रोफ़ेसर संजय कुमार इस पर कहते हैं कि इस तरह के कार्यक्रमों से मतदाताओं में उत्साह पैदा होता है और परसेप्शन बनाने में मदद मिलती है. खासकर वो मतदाता जो किसी पार्टी के परंपरागत वोट नहीं होते, वे यह मानकर सत्ता पक्ष के लिए वोट कर देते हैं कि किसी और को वोट देकर वोट बर्बाद क्यों करना.

धर्म की राजनीति का ताप बचाए रखने की कोशिश

भाजपा हर हाल में अपनी ‘हिंदू’ छवि को और मजबूत करना चाहती है. इसी क्रम में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण किया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर इसी दिशा में संदेश देने की कोशिश की.

एक तरफ अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जारी है. दूसरी तरफ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अपने बयान से मथुरा के मुद्दे को भी हवा देकर चुनाव में सांप्रदायिकता का तड़का लगाने की कोशिश की.

पार्टी के प्रचार के साथ-साथ ही भाजपा की केंद्र और प्रदेश सरकार ने अपनी योजनाओं में भी अयोध्या, काशी, मथुरा और इलाहाबाद को भरपूर तरजीह देने की कोशिश की है.

13 दिसंबर, 2021 को वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ धाम का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, साथ में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उपमुख्यमंत्री. (फोटो साभार: पीआईबी)

भाजपा नेताओं के टाइमलाइन पर किए गए अलग-अलग ट्वीट्स से पता चलता है कि सिर्फ़ इन चार जिलों में केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से पिछले एक-डेढ़ महीने में लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण हुआ है. इसमें, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के अलावा कई नेशनल हाइवे परियोजनाएं भी शामिल हैं.

सीटों के लिहाज से देखें तो सिर्फ़ इन चार जिलो में ही विधानसभा की 30 सीटें आती हैं.

हाइवे पॉलिटिक्स पर भी भाजपा का जोर

चुनाव नजदीक आते देख भाजपा ने भी अपनी चुनावी गाड़ी को ‘एक्सप्रेस-वे’ पर दौड़ाना शुरू कर दिया है. मायावती के शासन में दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस-वे, अखिलेश यादव के शासन में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे के बाद योगी आदित्यनाथ के शासन में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का लोकार्पण कर दिया गया है. इसके अलावा, शाहजहांपुर से गंगा एक्सप्रेस-वे का भी शिलान्यास किया गया है.

इन योजनाओं के बारे में कार्तिकेय बत्रा कहते हैं, ‘हाइवे जैसी परियोजनाओं से मध्यम वर्ग खुद को जोड़ पाता है और इसी वर्ग के लोग सबसे बड़ा वोट होते हैं. इस तरह के इवेंट बिल्ड अप से माहौल बनाने की कोशिश की जाती है और कुछ हद तक कामयाबी भी मिलती है.’

एक्सप्रेस-वे के अलावा बीते एक-डेढ़ महीने में हाइवे और अन्य सड़कों पर भी खासा जोर दिया गया है. प्रधानमंत्री मोदी और योगी के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी दिल खोलकर लोकार्पण और शिलान्यास किया है.

20 दिसंबर से 7 जनवरी के बीच नितिन गडकरी के ट्वीट देखने पर पता चलता है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के 13 जिलों में  80 हाइवे का लोकार्पण और शिलान्यास किया है. इसमें भी धार्मिक शहरों को तरजीह दी गई है.

मथुरा में 10, इलाहाबाद में 4 और अयोध्या में 6 राष्ट्रीय राजमार्गों का लोकार्पण या शिलान्यास किया गया है. नितिन गडकरी ने लगभग 69,539 करोड़ रुपये से ज़्यादा की लागत से बनने वाले कुल 80 हाइवे और उनसे जुड़ी परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया है.

धड़ाधड़ हो रहे लोकार्पण और शिलान्यास पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, ‘योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने पहले दिन से आखिरी दिन तक काम किया है. 2017 में सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट में किसानों का 36 हजार करोड़ का कर्ज माफ किया है.’

वे आगे कहते हैं, ‘हमने हर पल, हर घंटे काम किया है. हमने हर काम की योजनाएं बनाई हैं, उन पर काम किया है, तब जाकर उनका लोकार्पण किया है. हमने अखिलेश यादव की तरह काम नहीं किया है. वह तो लखनऊ मेट्रो के ट्रायल रन का उद्घाटन करके चले गए थे. हमने काम शुरू किया तो उसे पूरा भी किया. हमने काम किया है इसलिए हमें निश्चित तौर पर उसका लाभ भी मिलेगा.’

चुनाव से ठीक पहले लोकार्पण और शिलान्यास से सवाल पर राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि कोविड महामारी की वजह से कई काम रुके हुए थे, जैसे-जैसे वो काम पूरे हुए उनका लोकार्पण कर दिया गया.

प्रधानमंत्री मोदी ने भी लगाया ज़ोर

दिसंबर महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खुद को चुनावी रंग में रंगना शुरू कर दिया. यूपी की अहमियत को देखते हुए मोदी ने सिर्फ़ दिसंबर महीने में यूपी के छह अलग-अलग जिलों का दौरा किया. अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मोदी एक ही महीने में दो बार पहुंचे.

चुनावी फ़िज़ा में विकास का रंग घोलते हुए मोदी ने कानपुर मेट्रो, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और सरयू नहर परियोजना जैसी बड़ी परियोजनाओं का लोकार्पण किया. वहीं, गंगा एक्सप्रेसे-वे और मेरठ में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी जैसी योजनाओं का शिलान्यास भी किया.

अपने इन सात दौरों को मिलाकर नरेंद्र मोदी ने लगभग 72,234 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का लोकार्पण या शिलान्यास किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रमों में भी पूर्वी यूपी ही हावी रहा. कुल सात कार्यक्रमों में से उनके पांच कार्यक्रम पूर्वी यूपी में ही हुए.

इसमें बलरामपुर में सरयू नहर परियोजना का लोकार्पण काफी अहम है, क्योंकि यह योजना कई दशकों से अधूरी पड़ी थी. इस परियोजना से 9 जिले लाभान्वित होंगे. ऐसे में भाजपा ने पूर्वांचल को साधने की दिशा में एक और मजबूत कदम उठाने की कोशिश की है.

मोदी और योगी के इन दौरों के बारे में प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री के कार्यक्रम से देशभर में माहौल बनाया जा सकता है, लेकिन हो सकता है कि कुछ ग्रामीण इलाकों में इसका असर न हो. इसी गैप को भरने के लिए योगी आदित्यनाथ खुद जिले-जिले में जाकर कार्यक्रम कर रहे हैं. इस तरह स्थानीय स्तर के कार्यक्रमों और उनके लोकार्पण या शिलान्यास में मुख्यमंत्री या किसी बड़े मंत्री के मौजूद रहने से जनता को सत्ता पक्ष पर भरोसा करने में आसानी होती है.’

राज्य के बजट के एक तिहाई के बराबर का लोकार्पण/शिलान्यास सिर्फ़ डेढ़ महीने में

पिछले डेढ़ महीने के डेटा का हिसाब लगाने पर पता चलता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ही कुल 1.7 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया है.

यह आंकड़ा हैरान करने वाला इसलिए भी है, क्योंकि यह यूपी के बजट के लगभग एक तिहाई के बराबर है.

बेशक, इन योजनाओं में केंद्र सरकार का पैसा भी लगा है. लेकिन उद्घाटन और शिलान्यास की यह रफ़्तार बताती है कि सत्ता पक्ष चुनाव से ठीक पहले अपने पक्ष में माहौल खड़ा करने की कोशिश कैसे करता है.

यहां यह स्पष्ट करना भी ज़रूरी है कि इस डेटा में केंद्र सरकार की किसान सम्मान निधि, मुफ़्त राशन योजना, यूपी की लैपटॉप/टैबलेट वितरण योजना, मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना समेत उन कई योजनाओं को शामिल नहीं किया गया है, जिनमें व्यक्तियों या परिवारों को सीधे तौर पर फ़ायदे दिए जा रहे हैं. इन योजनाओं की राशि जोड़ने पर यह राशि और भी ज़्यादा हो सकती है.

ये योजनाएं, उनके लोकार्पण और शिलान्यास के साथ-साथ कार्यक्रम तय करने की रणनीति यह बताती है कि पिछले डेढ़ महीने में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र और राज्य सरकार चुनावी मोड में है.

चुनावी तैयारी में खुद को झोंक देने में लगे योगी आदित्यनाथ 8 जनवरी, 2022 को चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस से कुछ घंटे पहले तक योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास कर रहे थे. योगी ने इसी दिन लखनऊ के पीजीआई में 600 करोड़ की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया.

इसके अलावा, युवक एवं महिला मंगल दलों को प्रोत्साहन के रूप में खेल सामग्री भी बांटी गई. जनवरी महीने के आठ दिनों में भी योगी आदित्यनाथ ने जमकर उद्घाटन किए और पूरी कोशिश की कि चुनावी आचार संहिता से पहले कोई कोर कसर न रह जाए.

शिलान्यास और लोकार्पण की इस राजनीति की विरोध करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, ‘चुनाव के समय भाजपा सिर्फ़ लोगों को लुभाने के लिए इस तरह के इवेंट कर रही है.’

वे कहते हैं, ‘भाजपा ने अपनी किसी योजना का लोकार्पण नहीं किया, सिर्फ़ पुरानी योजनाओं का फीता काटा है. जिन योजनाओं का शिलान्यास भाजपा शासन में हुआ है, उसमें चार के बाद पांचवीं ईंट नहीं लगी. यही हाल जेवर एयरपोर्ट का है. इन्हें सिर्फ़ हेडलाइन मैनेज करना आता है. आने वाला चुनाव बेरोजगारी, महिला सुरक्षा और गरीबी के मुद्दे पर लड़ा जाएगा.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)