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बजट में आदिवासियों की अनदेखी, बजटीय आवंटन आबादी के अनुपात में नहीं: आदिवासी अधिकार मंच

आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच ने कहा कि आम बजट में जनजातीय समुदाय की अनदेखी करते हुए उसके लिए कुल बजट की 8.6 प्रतिशत राशि के बजाय केवल 2.26 प्रतिशत राशि आवंटित की गई है.

(फोटी: पीटीआई)

नई दिल्ली: एक आदिवासी संगठन का कहना है कि वर्तमान बजट में आदिवासी समुदायों का वह ढाई लाख करोड़ रुपये सरकार ने लूट लिया है जो इस समुदाय का उसके पास बकाया था और बजट में सामाजिक सब्सिडी व अन्य खर्चों जैसे भोजन, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, कृषि, उर्वरक आदि में कटौती की गई है.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच ने कहा है कि बजट में आदिवासी समुदाय की अनदेखी करते हुए उसके लिए कुल बजट की 8.6 प्रतिशत राशि के बजाय केवल 2.26 प्रतिशत राशि आवंटित की गई है, जो कि उनकी जनसंख्या अनुपात के बराबर नहीं है.

मंच के अध्यक्ष एम. बाबूराव जितेंद्र चौधरी ने कहा कि एक बजट में आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को दूर करने की बात होनी चाहिए, लेकिन यह बजट भारत के उस शर्मनाक रिकॉर्ड को आगे बढ़ाता है जो भारत को दुनिया के सबसे असमानता भरे देशों में शुमार करता है. इस बजट में सरकार द्वारा स्वीकृत नियमों के तहत जो 2.5 लाख करोड़ रुपये आदिवासी समुदायों का सरकार पर बकाया था, उसे समुदाय से लूट लिया गया है.

मंच ने कहा कि प्रोटोकोल के मुताबिक, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए बजटीय आवंटन उनकी आबादी के अनुपात में होना चाहिए.

चौधरी ने यह भी आरोप लगाया कि बीते वर्षों में जो राशि बजट में जारी की गई थी, उसका इस्तेमाल नहीं किया गया था. पिछले साल के बजट में आवंटित 7,484 करोड़ रुपये में से 6,126 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए थे.

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब आदिवासी छात्र ऑनलाइन शिक्षा के चलते स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर हो गए, उस समय में पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप के 292 करोड़ रुपये नहीं दिए गए थे. आदिवासी बच्चों के लिए एकलव्य आवासीय विद्यालय स्थापित करने के लिए 400 करोड़ रुपये खर्च नहीं किए गए थे और मिड डे मील के 300 करोड़ रुपये खर्च नहीं किए गए थे.

उन्होंने बताया, ‘सरकार ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में आदिवासी विश्वविद्यालय खोलने का वादा किया था, लेकन सिर्फ दो करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसमें से केवल 47 लाख रुपये दिए गए. अब इस बजट में सिर्फ 1.5 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.’

साथ ही उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने लघु वनोपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिए धन आवंटित करने के लंबे-चौड़े दावे किए थे, लेकिन केवल 155 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसमें से सिर्फ 115 करोड़ रुपये खर्च किए गए. ऐसा तब हुआ जब आदिवासी समुदाय को कम कीमत में अपने उत्पाद बेचने पड़े, क्योंकि सरकार वनोपज खरीद नहीं रही थी.

मंच का कहना है कि बजट में सामाजिक सब्सिडी व अन्य खर्चों जैसे भोजन, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, कृषि, उर्वरक आदि में कटौती की गई है. खाद्य सब्सिडी में 80,000 करोड़ रुपये की कमी की गई है. वहीं, मनरेगा के बजट में पिछले साल हुए खर्च के मुकाबले 25,000 करोड़ रुपये की कमी की गई है.

चौधरी का कहना है कि हालांकि इस कटौती से ग्रामीण गरीबों का हर वर्ग बुरी तरह प्रभावित होगा, लेकिन आदिवासी समुदाय पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा.

उन्होंने कहा, ‘आदिवासियों में कुपोषण का स्तर सबसे अधिक भयावह है, विशेषकर महिलाओं और बच्चों में. खाद्य सब्सिडी में कटौती से भुखमरी बढ़ेगी और ऐसा तब होगा जब सरकार के गोदाम जरूरत से ज्यादा, 10 करोड़ टन अनाज से भरे हुए हैं.’

साथ ही उन्होंने बताया कि मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों में आदिवासियों की संख्या बीस फीसदी है.

मंच का यह भी कहना है कि कृषि और ग्रामीण विकास के आवंटन में कटौती भी आदिवासी समुदाय को बुरी तरह प्रभावित करेगी.

मंच ने कहा कि आदिवासी समुदाय के लिए गैस सिलेंडर की सब्सिडी में भारी कटौती की गई है, वित्तीय वर्ष 2020-21 में इसके लिए 1,064 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, जो कि इस बजट में घटाकर 172 करोड़ रुपये कर दिए गए हैं.

मंच ने आगे आरोप लगाया है कि अनुसूचित जनजाति घटक, जिसमें 41 विभागों और मंत्रालयों को पैसा आवंटित किया जाता है, उसे अन्य उद्देश्यों के पूर्ति में स्थानांतरित कर दिया है.