राजनीति

यूपी: भाजपा को वोट दे चुके कोरांव के इस यादव-बहुल गांव को अब सपा से उम्मीद है

ग्राउंड रिपोर्ट: इलाहाबाद की कोरांव विधानसभा में आने वाले सलैया कलां गांव में मेजा ऊर्जा निगम प्राइवेट लिमिटेड का थर्मल प्लांट बनाने के लिए विस्थापित किए गए लोगों को बसाया गया था. बिजली, पानी और साफ़-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे इस गांव के रहवासियों का कहना है कि भाजपा ने उन्हें निराश किया है और अब वे सपा से उनकी समस्याएं दूर करने की आशा कर रहे हैं.

सलैया कलां गांव के रहवासी. (सभी फोटो: अजॉय आशीर्वाद महाप्रशस्त)

इलाहाबाद: संजय यादव मार्च 2014 में सलैया कलां गांव के निवासियों पर हुई पुलिस की क्रूर कार्रवाई को याद करते हैं. संजय इस इलाके में प्रस्तावित मेजा ऊर्जा निगम प्राइवेट लिमिटेड (एमयूएनपीएल) की स्थापना के खिलाफ हुए आंदोलन का हिस्सा थे. संजय का आरोप है कि नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) और उत्तर प्रदेश राजकीय विद्युत निगम लिमिटेड (यूपीआरवीएनएल) के इस संयुक्त उद्यम- एमयूएनपीएल ने बिना उचित मुआवजे के क्षेत्र में रहने वाले सैकड़ों लोगों को विस्थापित किया.

संजय बताते हैं, ‘हमारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन दो सालों से चल रहा था. लेकिन एक दिन पुलिस और पीएसी ने आकर प्रदर्शनकारियों को इतनी बुरी तरह से पीटा कि उनकी हिम्मत ही टूट गई. उस समय अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार थी. हम सिर्फ बेहतर मुआवजा चाहते थे, लेकिन हमारा सब चला गया.’

उन्होंने यह भी जोड़ा कि इससे पहले इस तरह की हिंसा नहीं की गई थी.

बाद में राज्य सरकार ने कहा कि सुरक्षाकर्मियों को बल प्रयोग करने के लिए मजबूर होना पड़ा था क्योंकि कुछ प्रदर्शनकारियों ने कुछ सुरक्षाकर्मियों और थर्मल प्लांट के लिए एश डाइक बनाने पहुंचे एमयूएनपीएल के कर्मचारियों पर पथराव किया.

वह आंदोलन तो खत्म हो गया, लेकिन यादव-बहुल सलैया कलां गांव सपा के खिलाफ हो गया और साल 2014 से यह भाजपा को वोट दे रहा है. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा पर अपनी उम्मीदें केंद्रित करते हुए ओबीसी बहुल गांवों के समूह ने किसी राजनीतिक दल के लिए तय की गई उनकी जातिगत प्राथमिकताएं दरकिनार कर दीं.

हालांकि अब संजय का कहना है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में उनका गांव सपा का समर्थन करेगा क्योंकि राज्य की भाजपा सरकार बदतर ही साबित हुई.

मेजा ऊर्जा निगम प्राइवेट लिमिटेड का थर्मल प्लांट.

सलैया कलां इलाहाबाद की कोरांव विधानसभा सीट का हिस्सा है, जो आदिवासियों के लिए आरक्षित है. यहां 27 फरवरी को मतदान होना है.

चुनावी मैदान में सभी दलों ने मजबूत कोल आदिवासी उम्मीदवारों को उतारा है. भारी अलोकप्रियता से जूझ रहे भाजपा विधायक राजमणि कोल फिर से चुनाव में उतरे हैं, जबकि सपा उम्मीदवार और पूर्व विधायक राम देव ‘निडर’ उन्हें चुनौती दे रहे हैं. कांग्रेस ने भी एक पूर्व विधायक राम कृपाल को मैदान में उतारा है, जिनका प्रचार अभियान चर्चा में रहा है.

लेकिन संजय जैसे कई लोगों के लिए मुकाबला भाजपा और सपा के बीच है. संजय द वायर  से कहते हैं, ‘अखिलेश को शायद अपनी गलतियों का एहसास हुआ है और उन्होंने इन्हें सुधारने के लिए संकेत दिए हैं. वह शिक्षा, रोजगार, किसानों की भलाई की बात कर रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा ने केवल हमारी हालत और खराब ही की है.’

संजय बताते हैं, ‘हमारा मूल गांव पंवार का पुरा था. सलैया कलां हमारा नया गांव है जिसे थर्मल प्लांट ने हमें मुआवजे के तौर पर दिया था. आइए, देखिए यहां कि क्या समस्याएं हैं.’

उन्होंने 40 गुणा 48 वर्गमीटर का एक बिना प्लास्टर हुआ घर दिखाया, एक खराब हैंडपंप, पानी की एक खाली टंकी, जर्जर हालत वाला एक सामुदायिक हॉल, बिजली का एक खराब खंभा, और बिना किसी सीवेज व्यवस्था के फैली गंदगी.

संजय के दोस्त मनमोहन यादव बताते हैं, ‘पिछले गांव में हमारे पास इससे कहीं बड़े घर थे. वहां सभी सुविधाएं थीं, पेड़-पौधे थे. यहां के उलट हमें वहां जमीन से निकला पीने का पानी मिलता था. एनटीपीसी ने हमें बहुत कुछ देने का वादा किया था लेकिन पिछले पांच सालों में हुआ कुछ भी नहीं. जो कुछ भी आप आज देख रहे हैं, वह न्यूनतम है जो हमें प्लांट वालों ने दिया है.’

सलैया कलां गांव का एक घर.

इस गांव में बुनियादी सुविधाओं तक पहुंचना भी एक दैनिक संघर्ष है. संजय आगे बताते हैं, ‘सलैया कलां का पूरा इलाका पथरीला है. पानी आपको 400 फीट की गहराई पर ही मिलेगा. ऐसे में हैंडपंप सूख गया है. प्लांट ने हमारे लिए पानी की टंकी बना दी है, लेकिन जब से हम यहां आए हैं, एक भी दिन सप्लाई नहीं हुई. ज्यादातर समय गांववाले पैसे इकट्ठा करके प्राइवेट टैंकर से पानी खरीदते हैं.’

सलैया कलां के रहवासी बताते हैं कि पंवार का पुरा में लगभग 300 परिवार थे, जिनमें से प्रत्येक के पास दो से पांच एकड़ कृषि भूमि हुआ करती थी. मनमोहन कहते हैं, ‘यह सब थर्मल प्लांट द्वारा अधिग्रहित कर ली गई. अब हम भूमिहीन और बेरोजगार हैं.’

उन्होंने आगे बताया कि प्लांट ने सभी रहवासियों को प्रति बीघा (1 बीघा यानी 0.6 एकड़) 90,000 रुपये दिए थे, लेकिन ग्रामीणों के विस्थापित होने के बाद से उनकी कोई स्थायी आय न होने के चलते यह सब खर्च हो गया.

संजय कहते हैं, ‘प्लांट ने वादा किया था कि वह हर परिवार के एक व्यक्ति को पॉलिटेक्निक कोर्स करवाएगा, जिसके बाद उसे प्लांट में ही नौकरी दी जाएगी. लेकिन कोर्स पूरा करने के बाद कुछ ही लोगों को नौकरी मिली है… लेकिन ये नौकरियां भी अनुबंध के आधार पर हैं जहां  लगभग 8,000 रुपये महीने दिया जाता है.’

संजय, (बीच में) मनमोहन (बाएं) और एक अन्य ग्रामीण के साथ.

मनमोहन कहते हैं, ‘कोई भूमिहीन व्यक्ति 8,000 रुपये में कैसे रह सकता है, जब सब कुछ इतना महंगा हो गया है?’

इन्हीं परिस्थितियों ने ग्रामीणों को भाजपा को लेकर उनकी चुनावी प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचने को मजबूर कर दिया है.

सलैया कलां में कुछ कुर्मी जाति के लोग भी हैं, इन्हीं में से एक संदीप पटेल कहते हैं, ‘भाजपा ने सलैया कलां और अन्य सभी पुनर्वासित गांव, जो कमोबेश एक ही हाल में हैं, की स्थिति सुधारने का वादा किया था. पर कुछ नहीं हुआ. योगी जी को केवल हिंदू-मुस्लिम मुद्दों की चिंता है, जबकि हमारे विधायक अपने पांच साल के कार्यकाल में एक भी बार यहां आए तक नहीं. वो कोरांव में अपनी कोठी से निकलते ही नहीं हैं!’

सरकार की ‘मुफ्त राशन’ योजना के बारे में किए एक सवाल के जवाब में संदीप ने कहा, ‘हम पांच लोगों का परिवार हैं. क्या मुफ्त राशन से हमारा गुजारा हो सकता है, आप ही बताओ. यह ठीक से पांच दिन भी नहीं चलता.’

सलैया कलां गांव का सामुदायिक हॉल,

संजय कहते हैं, ‘हमारे बच्चों को स्कूल के लिए दो किलोमीटर का जाना पड़ता है. अगर कोई बीमार पड़ता है, तो हम निजी क्लीनिकों के ही भरोसे हैं क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर दवा की सप्लाई ही नहीं है. इतना ही नहीं उस केंद्र में एक भी डॉक्टर नहीं है. ये सब हमारी बड़ी समस्याएं हैं.’

सलैया कलां के निवासियों का मानना है कि खेती की कोई जमीन न होने के कारण स्थायी रोजगार पाना ही इस संकट से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है. संजय की मां लीलावती कहती हैं, ‘सरकार दावा करती थी कि थर्मल प्लांट क्षेत्र का विकास करेगा, लेकिन इसने हमें और बदहाली में धकेल दिया है.’

संजय की बहन रानी, जिन्हें हायर सेकेंडरी के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, कहती हैं, ‘विकास ऐसा हो जो खुशहाली लाए, इसका उल्टा नहीं.’

वो पूछती हैं, ‘अखिलेश यादव कम से कम शिक्षा और नौकरियों के बारे में बात तो कर रहे हैं, तो उन्हें मौका क्यों नहीं देना चाहिए?’

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