दुनिया

यूक्रेन संकट: ‘युद्ध को वे दिव्य कहते हैं जिन्होंने, युद्ध की ज्वाला कभी जानी नहीं है’

आज के मनुष्य ने मछलियों की तरह जल में तैरना और पक्षियों की तरह आसमान में उड़ना भले सीख लिया है, मनुष्य की तरह धरती पर चलना उसे अभी सीखना है. मनुष्य की तरह धरती पर चलना न सीख पाने के ही कारण उसकी बार-बार की जाने वाली शांति की क़वायदें भी युद्ध की क़वायदों में बदल जाती हैं.

25 फरवरी 2022 को कीव में हमले में ध्वस्त हुई एक रिहायशी इमारत के बाहर एक बच्चा. (फोटो: रॉयटर्स)

दुनिया को ‘वॉर एंड पीस’ (युद्ध और शांति) जैसा बेमिसाल उपन्यास दे गए रूस के महान साहित्यकार लियो तोल्स्तोय, जिन्हें भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आध्यात्मिक गुरू भी कहा जाता है, अपने देश को ही नहीं, सारी दुनिया को अपने पड़ोसी से झगड़ने व हिंसा का सहारा लेने से मना कर गए हैं.

उनका संदेश है: किसी और को पीड़ा देने से अच्छा है खुद पीड़ित हो जाओ और बिना किसी प्रतिरोध के हिंसा का सामना करो. लेकिन विडंबना देखिए कि दुनिया तो दुनिया, खुद उनके देश ने ही उनकी अनसुनी करके पड़ोसी यूक्रेन पर धावा बोल दिया और एटमी धमकी देकर विश्व शांति को खतरे में डाल दिया, जिसे देखकर अच्युतानंद मिश्र की यह कविता सार्थक लगने लगी है:

हर बार मंच से
घोषणा की जाती है
युद्ध शांति के लिए है
और शांति युद्ध के लिए

मंच के नीचे से
भीड़ से
चिल्लाता है
बूढ़ा तोल्स्तोय
युद्ध और शांति
आदमी के लिए हैं.

ऐसे में स्वाभाविक ही है कि अकबकाई हुई दुनिया न सिर्फ ‘वॉर ऐंड पीस’ बल्कि अनेक अन्य चिंतकों व सर्जकों के युद्ध व शांति संबंधी चिंतनों व सर्जनाओं का पुनरावलोकन कर उनमें उजाले की ऐसी किरणें तलाशे, जिनकी बिना पर इस विभीषिका के अंधेरों के पार जाया जा सके.

यूं यह पुरावलोकन स्वाभाविक न हो तो भी जरूरी है क्योंकि पिछले दो तीन दशकों में सर्वथा एकध्रुवीय बना दी गई हमारी दुनिया में जो शक्तियां विश्वशांति का अलम लिए फिरती थीं, रूस-यूक्रेन भिड़ंत के बाद उन्होंने यह साबित करने में कतई देर नहीं लगाई है कि अभी भी उनके वे स्वार्थ ही उनकी पहली प्राथमिकता हैं, जो शांति से नहीं बल्कि युद्धों व टकरावों से ही सधते हैं.

वे तोल्स्तोय के इन शब्दों में भी अपना विश्वास असंदिग्ध नहीं रख पा रहीं कि एक इंसान का दूसरे के लिए सबसे बड़ा उपहार शांति है. फिर वे यही क्यों समझने लगीं कि तोल्स्तोय ने क्यों रूसी सेना में भर्ती होकर 1855 के क्रीमियाई युद्ध में भाग लेने के अगले ही वर्ष सेना छोड़ दी थी, युद्धों की निरर्थकता प्रमाणित करने वाले उक्त उपन्यास की रचना में प्रवृत्त हो गए और मन की शांति तलाशने लगे थे? फिर क्यों उन्होंने उसके लिए अपनी धन-संपत्ति त्याग दी थी.

तोल्स्तोय के आध्यात्मिक शिष्य गांधी के देश की बात करें, तो उसने महाभारतकाल से अब तक अनेक विध्वसंक युद्ध लड़े या उनमें भाग लेने को अभिशप्त रहा है. लेकिन उसके कई न्यूज चैनल व अखबार रूस-यूक्रेन युद्ध की खबरें कुछ इस अंदाज में प्रसारित-प्रचारित कर रहे हैं जैसे वह कोई त्रासदी नहीं बल्कि उत्सव हो.

इन चैनलों व अखबारों ने 1990 के खाड़ी युद्ध के वक्त भी ऐसा ही किया था और हाल के अफगानिस्तान युद्ध के वक्त भी. फिलहाल, वे कतई नहीं समझना चाहतेे कि तोल्स्तोय के देश की तरह गांधी के इस देश में भी युद्ध और शांति संबंधी कुछ कम चिंतन नहीं हुए हैं.

इन चिंतनों में भरपूर वैविध्य रहा है, लेकिन युद्ध को आंखों के ऐसे उत्सव में कभी नहीं बदला गया कि वह काम्य लगने लगे. इसे यूं समझ सकते हैं कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने यह घोषणा करते हुए भी कि

‘शांति नहीं तब तक जब तक
सुख-भाग न सबका सम हो.
नहीं किसी को बहुत अधिक हो
नहीं किसी को कम हो.
स्वत्व मांगने से न मिले
संघात पाप हो जाएं.

बोलो धर्मराज शोषित वे
जिएं या कि मिट जाएं?
न्यायोचित अधिकार मांगने
से न मिले तो लड़ के
तेजस्वी छीनते समर को
जीत या कि खुद मर के.

किसने कहा पाप है समुचित
स्वत्व-प्राप्तिहित लड़ना?
उठा न्याय का खड्ग समर में
अभय मारना-मरना?’

अपनी ओर से यही व्यवस्था दी कि ‘युद्ध को वे दिव्य कहते हैं जिन्होंने/युद्ध की ज्वाला कभी जानी नहीं है.’

अलबत्ता, युद्ध छेड़ या जबरन थोप दिए जाने की स्थिति में वे कायरता प्रदर्शित करने अथवा तटस्थता बरतने की हिमायत कतई नहीं करते. इसके उलट उन्होंने इन दोनों को ही अपराध बताया और लिखा है: समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध/जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध.

लेकिन जैसे तोल्स्तोय का देश आज उनके संदेश की अवज्ञा कर यूक्रेन पर कहर बरपा रहा है, दिनकर का देश उनके द्वारा तटस्थता को अपराध बताए जाने के बावजूद उसे गले लगाए हुए है.

जैसे इस युद्ध के बारे में बात करते हुए दुनिया की दूसरी शक्तियों के स्वार्थ उनके गले में अटक जा रहे हैं, गांधी के देश के लिए भी दुनिया में जहां कहीं भी किसी देश को गुलामी में जकड़ा गया हो या उसकी आजादी पर हमला किया जा रहा हो, उसके संघर्ष को हर तरह के समर्थन व सहयोग की अपनी पुरानी प्रतिबद्धता से न्याय करना मुश्किल हो रहा है.

उसे लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस की निंदा के प्रस्ताव पर चीन व संयुक्त अरब अमीरात के साथ तटस्थ रहने भर से उसकी यह प्रतिबद्धता पूरी हो जाएगी.

और तो और, उसे यूक्रेन में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी के काम में ही हलकान होकर रह जाना पड़ रहा है. इसलिए वह इन दोनों देशों या दुनिया को अपने राष्ट्रपिता की यह सीख भी साफ-साफ शब्दों में नहीं बता पा रहा कि आंख के बदले आंख का रास्ता पूरे विश्व को अंधा बना सकता है. इसलिए शांति का शांति को छोड़कर कोई विकल्प नहीं हो सकता क्योंकि कोई भी युद्ध कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका अंत वार्ताओं की मेज पर ही होता है और आज तक किसी ऐसे युद्ध की परिकल्पना नहीं की गई है, जो युद्धों की सारी संभावनाओं को हमेशा के लिए खत्म करके अंतिम सिद्ध हो सके.

निर्गुट आंदोलन के संस्थापक इस देश ने दरअसल, पिछले दशकों में दुनिया की गुटीय राजनीति के पाजामे में अपने पैर फंसाकर खुद को इस तरह उलझा लिया है कि दबे हुए स्वर में सबका मुंह निहारकर कोई बात कहता भी है तो ऐसे रणनीतिक व कूटनीतिक शब्दों की चाशनी में लपेटकर और कर्मकांड के तौर पर कि उसमें कोई नैतिक आभा नहीं रह जाती.

गांधी के देश का हाल ऐसा बेहाल है तो क्या आश्चर्य कि समूची दुनिया में भय की सभ्यता का ही विकास होता दिखता है, जिसमें एक कवि के अनुसार चांद भी किसी पुरानी दीवार के प्लास्टर की तरह झड़ने को अभिशप्त है.

सवाल है कि इस सभ्यता को बर्तोल्त ब्रेख्त की यह बात क्योंकर समझायी जाए:

युद्ध जो आ रहा है
पहला युद्ध नहीं है
पिछला युद्ध
जब खत्म हुआ
तब कुछ विजेता बने
और कुछ विजित

विजितों के बीच
आम आदमी भूखों मरा
विजेताओं के बीच भी
मरा वह भूखा ही

अभी तो वह दिनकर कुमार की इतनी-सी बात भी नहीं समझती कि:

तर्कों के बिना ही
हो सकता है आक्रमण
युद्ध की आचार संहिता
पढ़ने के बावजूद
निहत्थे योद्धा की
हो सकती है हत्या…

सिर्फ धुएं से ही
आग की खबर मिल जाती है
गिद्ध
मृतकों की सूचना दे देते हैं…

असमय ही विधवा बनने वाली
स्त्रियों के चेहरे पर
राष्ट्रीय अलंकरण के बदले में
मुस्कान नहीं लौटाई जा सकती
गर्भ में पल रहा शिशु भी
अदृश्य युद्ध का एक
पक्ष होता है…

जबकि शांति कामनाओं का हाल निर्मला गर्ग के शब्दों में यह है:

मैं शांति चाहती थी
मैंने ईश्वर की कल्पना की
ईश्वर की खातिर
लड़े मैंने
बेहिसाब युद्ध.

कोई पूछे क्यों है ऐसा तो एक दार्शनिक किस्म का जवाब यह है कि हमारे पांच हजार साल के ज्ञात इतिहास में चौदह हजार छह सौ युद्ध हुए. किसने कराए ये सारे युद्ध? अगर कहें अमेरिका ने तो जब अमेरिका नहीं था, तब भी युद्ध होते थे. किन्हीं दूसरी शक्तियों का नाम लें तो जब वे नहीं थीं, तब भी युद्ध होते थे. फिर? जवाब के लिए बहुत बड़ा ज्ञाता होने की जरूरत नहीं है.

डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन कह गए हैं कि आज के मनुष्य ने मछलियों की तरह जल में तैरना और पक्षियों की तरह आसमान में उड़ना भले सीख लिया है, मनुष्य की तरह धरती पर चलना उसे अभी सीखना है. मनुष्य की तरह धरती पर चलना न सीख पाने के ही कारण उसकी बार-बार की जाने वाली शांति की कवायदें भी युद्ध की कवायदों में बदल जाती हैं.

शांति-शांति की रट लगाते हुए वह जो भी राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय व्यवस्था बनाता है, वही कुछ समय बाद उसके खिलाफ काम करने और युद्ध को खेल या खेल को युद्ध बनाने लग जाती और उसके औजारों को हथियारों में बदलने और उनका उद्योग चलाने लग जाती हैं. यह स्थिति कैसे बदले? बेहतर दुनिया के सारे पैरोकारों को इस पर मिलकर विचार करना होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)